अभिशप्त -सी लेटी हुई है
असहाय बरसाती नदी।
बगूलों को शीश पर
लपेटे नज़र आती नदी॥

रेत के लम्बे सफ़र में
हाँफने लगी है धूप ।
हुआ दुर्लभ दो बूँद जल
तृषित छटपटाती नदी॥

रूठकर बैठा है मौसम
मेघ परदेसी हुए ।
थक गई हर रोज़ इक
यहाँ भेजकर पाती नदी॥

गए पखेरू छोड़ करके
नीड़ अपने तीर के।
बीते दिनों की याद कर
रह - रह अकुलाती नदी॥

जब बरसते मेघ छमछम
सभी किनारे तोड़कर।
बस्तियों को लील करके
बहुत कहर ढाती नदी॥

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