बनारस 01 - बनारस के घाट

06-08-2020

बनारस 01 - बनारस के घाट

डॉ. मनीष कुमार मिश्रा

बनारस के घाटों का सौंदर्य
घटना नहीं जानता
यद्यपि यहाँ घटता है वह सब
जो शायद घटा ही न हो कहीं।


घटनाओं का चौपाल
और चौधरी भी
ये निःशब्द घाट हैं
ये मौन आख्यानों के
पितामह हैं।


ये घाट किसी को
निघर्घट नहीं मानते
सब कोअपनाते हैं
सम भाव से
ये घाट
भावों में रचे, बसे और जमे हैं।


ये बनारस के घाट ही हैं
जो प्रथम प्रणाम
निवेदित करते हैं
माँ गंगा को
दिन रात अहर्निश।


इन घाटों का तट
तृष्णाओं की तृषिता है
तने हुए तन का
अंतिम पड़ाव तो
भरे हुए मन का
सम्मोहन केंद्र।


ये बनारस के घाट
चेतना के द्वार हैं
हम सभी के लिये
हम सब के हैं।

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

शोध निबन्ध
साहित्यिक आलेख
सामाजिक आलेख
कविता
कविता - क्षणिका
कहानी
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में