अर्थ का अनर्थ

सुभाष चन्द्र लखेड़ा

आज सुबह फिर मुझे फ़ेसबुक पर एक फ्रेंडशिप की रिक्वेस्ट आयी और मैंने उसे कन्फ़र्म कर दिया। मुझे अब सच कहूँ तो अपने ऐसे बहुत से मित्रों के नाम याद भी नहीं जिन्हें मैं फ़ेसबुक पर अपना मित्र कन्फ़र्म कर चुका हूँ। इनमें से मुझे अपने पूर्व परिचित और नाते-रिश्तेदारों के अलावा कुछ ऐसे लोगों के नाम ज़रूर याद हो गए हैं जो नियमित रूप से मेरी पोस्ट पढ़ते हैं और उन्हें लाईक करते हैं। फलक (फ़ेसबुक लघु कथाएँ) ब्लॉग पर ऐसी संख्या सर्वाधिक है। जो ब्लॉग सदस्य रचना को पढ़ने के बाद अपने कमेंट्स निरंतर देते हैं, वे ज़रूर मेरे यादों के संग्रहालय में बस जाते हैं। बहरहाल, फ़ेसबुक ने दुनिया को छोटा तो बनाया है लेकिन इसकी वज़ह से दो शब्द अब अपना अर्थ पूरी तरह से खो चुके हैं - मित्र और कन्फ़र्म। फ़ेसबुक की वज़ह से यूँ वे आपके मित्र हैं लेकिन आप उनके बारे में कुछ नहीं जानते। आपने ख़ुद उनकी फ्रेंड रिक्वेस्ट को कन्फ़र्म किया लेकिन इस कन्फ़र्म का अर्थ वह नहीं है जो आज तक प्रचलन में था। ख़ैर, यह सब लिखने की ज़रूरत इसलिए पड़ी कि कल मेरे ऐसे ही एक फ़ेसबुक फ्रेंड का जन्मदिन था। हमने तत्काल उन्हें बिन पैसों के फूलों के गुलदस्ते के चित्र के साथ जन्मदिन की बधाई और ढेरों शुभकामनाएँ देते हुए लिख दिया - "ये दिन आये बार-बार।" आज पता चला कि कल उनके पिता जी का देहांत हो गया था और वे दिन भर दिल्ली के निगम बोध-घाट पर अपने स्वर्गीय पिता जी के क्रियाकर्म में व्यस्त थे। सोचता हूँ इतने मित्र भी नहीं होने चाहियें जिनके सुख-दुःख में आप शरीक न हो सकें।

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