ठीक किसी पदार्थ के अतृप्त अणुओं की तरह
सतत अस्थिर और अशांत,
कौन हैं हम ?
इस पृथ्वी पर 
निरंतर भाग रहे हैं  
धरती के इस छोर से उस छोर तक  
अपनी-अपनी तृष्णाओं को लाद कर
तृप्त करने ख़ुद को ।
 
अनबुझे हुए से, 
अतृप्त, अशांत धरती पर बिखरे हुए हैं
किसी पदार्थ के अणुओं सा
कौन हैं हम?
इंसान या फिर अतृप्त अणु।
 
विडम्बना यह है कि –
तृप्त अणुओं को तो किया जा सकता है
पर इंसानों का क्या? 

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