जूझ कर अपने अतीत से, कल से,
किसी अनाम सुबह की आशा में,
निकला था वह कुछ सोच कर,
अपने चमकते हुए भविष्य की तलाश में।

 

फिर ठिठक कर रुक गया,
शायद याद आ गया होगा काँटा कोई,
उभर गया होगा जो अतीत से,
चुभन होगी जिसकी दिल की गहराई में।

 

रुक कर फिर चल दिया, कुछ सोच कर,
अपने बिखेरे हुए इरादे समेट कर,
शायद कुछ पा जाने की आस में,
अतीत और भविष्य दोनों, जीता रहा वर्तमान में।

 

सिर्फ़ चलना ही काफ़ी नहीं है, जीवन में। 

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें