फ़ादर की डेथ का एकमात्र कारण वही निकला जिसका आरोप फ़ादर बराबर लगाते थे। और मदर पूरी ढिठाई के साथ झूठ पर झूठ बोलकर उन्हें ही झूठा, शक्की स्वभाव का अनकल्चर्ड आदमी कहकर उनकी इंसल्ट करती थीं। जो सच अब यह स्वीकार करने की हिम्मत कर पाई हैं, यदि यह उसी समय कर लेतीं, प्यार से फ़ादर से माफ़ी माँग लेतीं तो वह निश्चित ही माफ़ कर देते। वह कितने दयालु, कितने लिबरल थे। कितनी बार रिक्वेस्ट करते थे कि प्लीज़ सच बता दो मैं कुछ नहीं कहूँगा। ग़लतियाँ इंसान से हो ही जाती हैं। हम दोनों एक अच्छे कपल की तरह अपने बच्चों के साथ रहेंगे। 

लेकिन मदर ने जो एक बार झूठ को सही कहने की रट लगाई थी तो सच स्वीकार करने से पहले तक लगाती ही रहीं। इनका जो सच है उससे भले ही फ़ादर की यह बात ना सच हो कि जस्टिन और मैं उनके बच्चे नहीं हैं, लेकिन इस बात के सच होने की पूरी संभावना है कि अपने जिस तीसरे चाइल्ड को अबॉर्ट करा दिया था वह फ़ादर का नहीं था। इसीलिए फ़ादर ने ज़िद करके अबॉर्ट कराया था। और मदर की हरकतों के कारण ही परेशान होकर उन्होंने अंधाधुंध शराब पीनी शुरू कर दी थी। एक तरह से वह शराब के ज़रिए ख़ुद को ख़त्म करने पर तुले हुए थे।

बेचारे हम सब को कितना प्यार करते थे, मदर को भी। लेकिन जब से वह हॉस्पिटल में किसी के साथ जुड़ीं तब से सब कुछ बदलता चला गया। इस तरह की बातें छुपी नहीं रहतीं तो फ़ादर से कैसे छिप जातीं। उन तक पहुँच ही गईं। जिसे मदर बार-बार झूठ बताती रहीं। अंततः फ़ादर उनके इस झूठ की बलि चढ़ गए। ऐसी बातें परमाणु विखंडन से भी कहीं तेज़ एक से दो, दो से चार, चार से आठ से भी ज़्यादा तेज़ी से लोगों तक पहुँचती हैं। जस्टिन तक भी पहुँचीं। फ़ादर से तो हम बराबर सुनते ही रहते थे। उनके ना रहने पर आए लोगों में ही वह व्यक्ति भी था जिसकी वाइफ़ मदर के साथ हॉस्पिटल में है। उसकी वाइफ़ उससे सब कुछ बताती थी। इस कपल ने फ़ादर की दर्दनाक मौत पर ग़ुस्से में जस्टिन को साफ़-साफ़ सच बता दिया था।

वह दोनों को पनिश कराना चाहते थे। पता नहीं उसकी मंशा पूरी हुई कि नहीं लेकिन जस्टिन सच को माँ से ही जानना चाहता था। उसे झटका लगा था कि फ़ादर की जिन बातों को वह झूठ समझता था, एक ड्रिंकर का बेतुका अनर्गल प्रलाप समझता था। वास्तव में वही सच था, सच्चा था। मदर पर लगाए गए उनके एक-एक आरोप सही थे। मदर से उसने बहुत ही अग्रेसिव होकर बात की थी। मदर उस कपल से झगड़ने को तैयार हो गई थीं, जिसने जस्टिन को सब कुछ बताया था।

लेकिन जब जस्टिन ने तमाम बातें साफ़-साफ़ कह दी थीं तो मदर के पास बचने का कोई रास्ता नहीं बचा था। तब वह खीझकर आउट ऑफ़ कंट्रोल हो गईं थीं. शॉक्ड इसलिए हुईं थीं कि उनका जो बेटा उनकी ही बातों को सच, सही मानता था वह उसी के सामने कंप्लीटली एक्सपोज़ हो गई थीं। उनका एक-एक सच झूठ निकला था।

जस्टिन लोगों के सामने अपनी इंसल्ट बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था। इसलिए मदर से बराबर भिड़ गया था। उन मदर से जो अपने झूठ को भी सच साबित करने के लिए फ़ादर के सामने भी एक स्टेप भी कम रखने को तैयार नहीं होती थीं। तो उसके सामने कैसे कमज़ोर पड़तीं। जस्टिन तो दूसरे हॉस्पिटल में जाने, या नौकरी छोड़ देनेे, उस आदमी से संबंध ख़त्म करने के लिये कह रहा था तो वह यह कैसे बर्दाश्त कर लेतीं।

जस्टिन भले ही अपनी जगह सही था, लेकिन सच यह भी तो है कि जो संबंध इतने सालों से बने हुए हों वह एक मिनट में, एक दिन में कैसे ख़त्म हो जाएँगे। मदर जस्टिन से इसलिए भी नफ़रत करने लगी थीं, क्योंकि जब फ़ादर के ना रहने पर चौथे दिन वह आदमी दुख प्रकट करने के लिए घर आ गया तो हॉस्पिटल के उस फॉर्मेसिस्ट को जस्टिन ने दरवाज़े से ही बुरी तरह इंसल्ट कर के भगा दिया था।

उस व्यक्ति की इंसल्ट से मदर इस क़दर नाराज़ हुई थीं कि जस्टिन से साफ़ कह दिया कि, "मैं अपनी लाइफ़ अपनी तरह से जीने की हक़दार हूँ। तुम मेरे बेटे हो, तुम्हें मैंने यह अधिकार नहीं दिया कि तुम यह डिसाइड करो कि मैं क्या करूँ, क्या ना करूँ, ओके यंग ब्लड।" जस्टिन भी उखड़ गया था। उसने तब वह बातें भी कहीं जो एक बेटे को माँ से किसी भी हालत में नहीं कहनी चाहिए थीं। मदर ने तब यही कहा था। 

उन्होंने जो बातें बताईं उसे सुनकर मुझे भी लगा था कि जस्टिन को वह बातें नहीं कहनी चाहिए थीं। मदर ने भले ही बड़ी ग़लती की है। फिर सोचा जब इतने दिनों बाद सुनकर, एक लड़की होकर, मदर की बातों से दिमाग़ फट रहा है। ख़ून उबल रहा है तो वह तो लड़का है। एक मर्द है, उससे तो मदर से बहस तब हुई थी जब लोहा बिल्कुल गर्म था। जब फ़ादर के लिए की गई लास्ट प्रेेयर की गूँज भी शांत नहीं हुई थी।

मैंने मदर से उस समय बहुत सोच समझकर कहा, मॉम इतना सब कुछ हो चुका है, अब तो डैडी भी नहीं रहे। यह पूरे यक़ीन के साथ पूछ रही हूँ कि आप जो सच होगा वही कहेंगी। हमारे बीच यहाँ प्रभु यीशु भी मौजूद हैं। केवल इतना बता दीजिए कि क्या आप उस इंसान को छोड़ नहीं सकतीं जिसके कारण फ़ादर नहीं रहे। घर में हमेशा उस आदमी के कारण फ़साद होता रहा। तुम्हारा बेटा तुम्हें हमेशा के लिए छोड़कर चला गया। मैं अपना कहूँ तो अब कितने दिन आपके साथ रह पाऊँगी बता नहीं सकती। मेरी इन बातों का मदर ने कुछ जवाब नहीं दिया। चुप रहीं। मैंने दो बार रिपीट किया तो भी नहीं बोलीं। फिर ज़्यादा प्रेशर डाला तो बोलीं।

"मैंने बहुत कोशिश की माय चाइल्ड, लेकिन मैं विवश हूँ। मुझे ऐसा लगता है कि जैसे वह मुझ में ही समाया हुआ है। इसलिए मैं समझती हूँ कि मैं कुछ भी कर लूँ, उससे अलग नहीं हो सकती।" मदर की इस बात ने मेरे ग़ुस्से को और बढ़ाया। जिससे मैंने उनसे वह प्रश्न पूछ लिया जो निश्चित ही उनके लिए जीवन का सबसे कड़वा प्रश्न था, सबसे कठिन भी, जिसका जवाब सिर्फ़ उन जैसी विकट हिम्मतवाली या एक्सट्रीम बोल्ड लेडी ही दे सकती है। ऐसी लेडी जिसके लिए अपने सुख से बढ़कर और कुछ नहीं है। हस्बैंड भी नहीं, बच्चे भी नहीं। उनकी बातों से मैं ख़ुद को इमोशनली बहुत हर्ट फ़ील कर रही थी, तो मुझे कड़वा प्रश्न पूछने में कोई प्रॉब्लम नहीं हुई थी।

मैंने विदाउट हेज़िटेशन पूछ लिया, मॉम जब उस आदमी से तुम्हारे इतने सालों से रिलेशन हैं तो एक बात मैं प्रभु यीशु के सामने इस यक़ीन के साथ पूछ रही हूँ कि जैसे अभी तक आप इतनी बोल्डनेस के साथ जीसस के सामने सच बोल रही हैं, वैसे ही सच ही बताएँगी। मेरी इस बात पर वह मेरी तरफ़ देखती हुई बेहद शिकायती लहजे में बोलीं, "अब बाक़ी ही क्या बचा है जो छुपाऊँगी। सब पीछे पड़ जाएँ तो कुछ छुपता नहीं है, जो पूछना है पूछो।" उनकी बातों को मैंने कड़वे घूँट की तरह पिया और कहा, बहुत सी भले ही ना हों लेकिन एक बात है जिसे आप चाहेंगी तभी पता चल सकेगा।

इस पर वह प्रश्न भरी आँखों से मुझे देखने लगीं, तो मैंने पूछा मॉम अब डैड तो रहे नहीं, इसलिए सच बताने से कोई प्रॉब्लम भी होने वाली नहीं है। यह बात कितनी सच है कि जस्टिन और मैं उनके नहीं तुम्हारे उस फॉर्मेसिस्ट फ़्रेंड के बच्चे हैं। मेरा यह पूछना था कि वह चीख पड़ीं थीं, "एमी" मैं चुप नहीं हुई, डरी नहीं, तो वह बोलीं, "अब तुम भी इस तरह से क्वेश्चन कर रही हो। पहले तुम्हारे डैड फिर जस्टिन और अब तुम। मैंने सोचा था कि जस्टिन के बाद इस प्रश्न से हमेशा के लिए पीछा छूट जाएगा।" उनकी बात को मैंने ध्यान से सुना, फिर उन्हें पूरी इंपॉर्टेंस देते हुए कहा आपने डैड या उनके बाद जस्टिन को सच बता दिया होता। सही जवाब दे दिया होता तो यह प्रश्न फिर कभी आपके सामने आता ही नहीं। जब-तक उत्तर नहीं बताएँगी तब-तक तो यह प्रश्न बना ही रहेगा। मैं अपनी बात पर अडिग हूँ।

उन पर प्रेशर डालती रही तो उन्होंने आख़िर वह सच बताया जिसे डैड, जस्टिन नहीं जान पाए। जिसके कारण डैड जीवन से हाथ धो बैठे। जिसे सुनकर मुझे पसीना आ गया। मॉम ने खीझते हुए कहा कि, "जस्टिन और तुम डैड के ही बच्चे हो। जो उनका नहीं था उसे उन्होंने इस दुनिया में आने ही नहीं दिया। मुझे मजबूर कर दिया अबॉर्ट कराने के लिए। टाइम ज़्यादा हो चुका था, इसके बावजूद अगेंस्ट द लॉ जाकर कराया। मेरी लाइफ़ ख़तरे में पड़ी, मगर उन्हें अपनी ज़िद की पड़ी थी। उसे पूरी करके ही माने।" मैंने कहा मॉम जब आपने उनकी पहली ज़िद कि उस आदमी से कोई संबंध नहीं रखने की नहीं मानी, जिसे मान लेने से अब तक जो कुछ हुआ वह होता ही नहीं तो एबॉर्शन की बात इतनी आसानी से कैसे मान ली।

मॉम ने जैसे पहले ही अंदाज़ा लगा लिया था कि मैं यह प्रश्न करूँगी, इसलिए वह जवाब देने के लिए ख़ुद को एकदम तैयार किए हुए थीं, तुरंत ही कहा, "वह बेबी जन्म लेता तो यह कितना बड़ा तमाशा करते दुनिया के सामने, कैसे मुझे बेइज़्ज़त करते इसका अंदाज़ा तुम भी लगा सकती हो। मुझे पूरा यक़ीन था कि वह डीएनए चेक करा कर ही मानते। ऐसे में मेरी, बच्चे की और उस आदमी की जो इंसल्ट होती वह मैं बर्दाश्त नहीं कर सकती थी। तुम दोनों भी परेशान होते।"

मुझे बड़ी ग़ुस्सा आया। सोचा अपने स्वार्थ के लिए अबॉर्ट कराया और ज़िम्मेदार फ़ादर को बता रही हैं। हो तो यह भी सकता है कि वह आदमी भी ना चाहता रहा हो कि उसकी संतान ऐसी जगह जन्म ले, जहाँ वह जब चाहे तब जा भी नहीं सके। उसे गोद में भी ना ले सके। संतान उसकी होगी और नाम दूसरे का होगा।

इसलिए मैंने सोचा यह बात भी इसी समय क्लीयर कर लूँ कि वह आदमी क्या चाहता था। उसने अबॉर्शन के लिए हाँ कही थी या भरपूर विरोध किया था। पूछने पर मुझे सीधा जवाब नहीं मिल रहा था। फ़ादर को ही कटघरे में खड़ा किया जा रहा था। बहुत कुरेदने, प्रभु यीशु का वास्ता देने पर सच सामने आया, कि वह आदमी भी नहीं चाहता था कि बच्चा जन्म ले। वह शुरू से ही मना करता रहा। उसका कहना था कि उसके तीन बच्चे पहले ही हो गए हैं, एक और बच्चे को वह अभी इस तरह से दूसरे घर में नहीं चाहेगा। 

सच जानने के बाद फ़ादर के प्रति सम्मान, उनके प्रति मेरा इमोशनल अटैचमेंट बहुत बढ़ गया। मॉम के प्रति इमोशनल अटैचमेंट कम होना शुरू हो गया था। मैंने जब देखा कि मॉम सारी बातें कह देना चाहती हैं। कुछ इस तरह लग रहा था जैसे कि वह चाहती हैं कि इस टॉपिक पर जितनी बातें करनी हैं, जो कुछ मुझे कहना, सुनना है, वह सब मैं इसी समय कर लूँ। इसके बाद फिर कभी इस टॉपिक पर बात नहीं करनी है। 

तो मैंने भी सोचा कि यही अच्छा है, रोज़-रोज़ बहस से क्या फ़ायदा। यह उस आदमी को इतना चाहती हैं तो बेहतर तो यह था कि फ़ादर से अलग हो जातीं। डायवोर्स लेकर उसी के साथ रहतीं। दो नावों पर सवारी करने की कोशिश से आख़िर क्या मिला? मेरे फ़ादर, एक जेंटलमैन की, एक ग्रेट फ़ादर की जान ज़रूर चली गई। जस्टिन जैसे भाई से मैं हाथ धो बैठी। यह सब मैंने मॉम से पूछा तो उनका बड़ा अजीब उत्तर मिला।

"एक्चुअली मेरे लिए यह पॉसिबल नहीं था। क्योंकि वह व्यक्ति इस बात के लिए तैयार नहीं था कि मुझसे वह शादी करे या मेरे साथ अलग रहे। वह अपनी फ़ैमिली को नहीं छोड़ना चाहता था।" मैंने कहा, आश्चर्य है, जो व्यक्ति अपनी फ़ैमिली को फ़र्स्ट प्रिफ़ेरेंस देता है, उसके बाद कुछ सोचता है, ऐसे व्यक्ति के लिए आपने अपनी फ़ैमिली की लाइफ़ को नष्ट कर दिया। अपने हस्बैंड को बेमौत मर जाने दिया। सालों-साल वह व्यक्ति पूरे मन से आपको पाने के लिए परेशान रहा। इतना ज़्यादा कि अपने वजूद को बचाए रखने के लिए उसे ख़ुद को शराब में डुबो देना पड़ता था। और अंततः इन्हीं बातों ने उनकी जान ले ली।


मैंने तब बहुत ही ठंडे स्वर में कहा, मॉम आपको यह नहीं लगता कि उस व्यक्ति ने आपको अपना मन बहलाने का एक टूल बना कर रखा हुआ है। जब-तक घर में है, तब-तक फ़ैमिली है, बीवी है। जब आठ-दस घंटे बाहर है, ऑफ़िस में है, तो इतने समय के लिए भी एंजॉयमेंट का कुछ अरेंजमेंट होना चाहिए। तो उसने इतने समय के लिए आपको अपना एंजॉयमेंट टूल बना लिया। क्या आपको ऐसा नहीं लगता? मॉम ने तपाक से उत्तर दिया, "अपनी बात को अपोज़िट एंगल से देखो, यही बात तो वह भी कह सकता है।" मैंने कहा अपोज़िट एंगल से बात तब कही जा सकती है जब आप भी उसी की तरह अपने हस्बैंड को, फ़ैमिली को छोड़ने के लिए तैयार ना होतीं।

जैसे वह संबंध घर के बाहर तक रखना चाहता है, वैसे ही आप भी करतीं। मगर आप तो... बीच में ही मदर बोलीं, "मैंने पहले ही कहा कि मैं फ़ैमिली को लेकर, तुम्हारे फ़ादर को लेकर भी अवेयर थी। मगर फ़ैमिली को लेकर मैं उतनी कट्टर नहीं हूँ जितना कि वह थे। तुम्हारे फ़ादर का विहेवियर जिस तरह इस मैटर को लेकर हार्डकोर होता जा रहा था उससे मुझे अलग होने के लिए ज़्यादा कोशिश नहीं करनी पड़ती।"

मैंने कुछ देर और बातें करने के बाद पूछा। मॉम मैं नहीं समझ पा रही हूँ कि मुझे पूछना चाहिए कि नहीं, लेकिन पूछ रही हूँ कि आप आख़िर फ़ादर से ऐसा क्या चाहती थीं जो वह आपको नहीं दे पाते थे, और वह सब आपको उस आदमी से मिलता है नहीं, बल्कि इतना और ऐसा मिलता है कि आप इस कंडीशन में भी उसे छोड़ने को छोड़िए, छोड़ने के बारे में सोच भी नहीं पा रही हैं। बल्कि उसे हस्बैंड से भी ऊपर रखा हुआ है। मॉम चुप रहीं। कई बार पूछने पर कहा, "मैं बहुत क्लीयर कुछ नहीं कह सकती, लेकिन पता नहीं क्यों मुझे ऐसा लगता है कि मैं जिस पीस, सैटिस्फ़ैक्शन को चाहती हूँ, वह उसके पास पहुँचते ही मुझे मिल जाते हैं। तुम्हारे फ़ादर को या तो मैं नहीं समझ पायी कि वो मुझसे क्या चाहते हैं, या फिर शायद वह मुझे समझ नहीं पाए, मुझे नहीं समझा सके कि उन्हें मुझसे क्या कुछ चाहिए, कितना चाहिए। शायद दोनों ही एक दूसरे को नहीं समझा सके, ना समझ सके।"

उनकी यह चतुराई भरी बातें मुझे बहुत बुरी लगीं। मैं ख़ुद को रोक नहीं सकी। मैंने कहा, मॉम मैं भी बड़ी हो गई हूँ। बहुत सी बातें समझती हूँ। यह भी जानती हूँ कि अनुभव भले ही मेरा कम है, लेकिन घर में सालों से चले आ रहे माहौल ने मुझे बहुत मैच्योर बना दिया है। यहाँ कुछ कॉम्पलिकेशन जैसी कोई बात ही नहीं थी, कोई भी हस्बैंड यह बर्दाश्त नहीं करेगा कि उसकी नॉलेज में उसकी मिसेज किसी थर्ड पर्सन के साथ रिलेशनशिप में रहे। इसीलिए आपको मना करते थे। आप मानने को तैयार नहीं थीं। बस इतनी सीधी सिंपल सी बात है। सिंपल सी बात को आप सिंपली स्वीकार कर लेतीं तो मैं पूरे कॉन्फ़िडेंस के साथ कहती हूँ कि बात जैसे भी हो मैनेज हो जाती। फ़ादर इतने लिबरल थे कि वह कोई ऐसा रास्ता ज़रूर निकालते, आपके साथ मिलकर ही निकालते कि ऐसी हालत नहीं होती। जो कुछ हुआ ऐसा नहीं है कि उससे आपको कष्ट नहीं हो रहा है। टेंशन में आप भी हैं।
मैं इतना ही चाहती हूँ कि जो बिगड़ गया है, फ़ैमिली जो बिखर गई है, यदि आप बातों को ऐसे ही कॉम्प्लिकेटेड बनाए रहेंगी तो जो अब तक बचा रह गया है उसके भी बिखरने में समय नहीं लगेगा। हम दोनों भी हमेशा के लिए अलग हो सकते हैं। इसलिए आपसे रिक्वेस्ट है कि बातों को सिंपली एकदम क्लियरली बोलिए, अब मैं अच्छी तरह समझ चुकी हूँ कि आप उस आदमी से रिलेशनशिप के बिना नहीं रह सकतीं। सॉरी मैं यह भी कह देना चाहती हूँ कि उसके साथ आपका जो भी रिलेशन है, वह ओवरऑल फिज़िकल ही है। आप दोनों के बीच इमोशनल अटैचमेंट कोई बहुत स्ट्रॉन्ग पोज़ीशन में नहीं है। बल्कि सच यह है कि कोई इमोशनल अटैचमेंट है ही नहीं। ऐसे में मैं यही कहूँगी कि आप ख़ुश रहें, टेंशन फ़्री रहें, ऐसा ही काम करें। आप चाहें तो उसे साथ लाकर यहीं रहें। मैं रेंट पर कहीं और रह लूँगी।

फ़ादर की फ़ैमिली पेंशन आपने मेरे नाम कर ही दी है। मुझे कोई दिक्क़त नहीं होगी, वैसे भी मैं जल्दी ही सेस्फ़ डिपेंड हो जाऊँगी। आपके ऊपर कोई बर्डन नहीं रहेगा। मैं साथ इसलिए नहीं रह सकती क्योंकि मैं उस व्यक्ति को सहन नहीं कर पाऊँगी जो मेरी फ़ैमिली की बर्बादी का कारण बना, जिसके कारण मेरे डैड की दर्दनाक मौत हुई। लेकिन क्योंकि आप मेरी मदर हैं, आपकी ख़ुशी में मेरी ख़ुशी है। मेरे कारण आप ख़ुश ना रह सकें यह भी ग़लत है। यह मैं नहीं चाहूँगी। इसलिए मैं आपसे ख़ुशी-ख़ुशी कह रही हूँ कि आप उस व्यक्ति के साथ रहें। मॉम यह कहते हुए मैं यह भी सोच रही हूँ कि हर मदर को भी औरों की तरह ख़ुश रहने का अधिकार है। जैसे भी वह ख़ुश रहें।

हमारी बहस निर्णायक दौर में पहुँच चुकी थी। मैं सब कुछ उसी समय फ़ाइनल कर देना चाहती थी। कल पर कुछ भी नहीं छोड़ना चाहती थी। और मदर उस व्यक्ति को। तो फ़ाइनली डिसाइड हुआ कि वह उसके साथ अब तक जैसे रह रही हैं वैसे ही रहेंगी। मुझे कहीं जाने की ज़रूरत नहीं।

इस डिसीज़न तक पहुँचने में जितनी और जिस तरह की बातें हम माँ-बेटी के बीच हुईं, वह कई बार बहुत बोल्ड, बहुत ग़ुस्से से भरी, तो कभी भावुकता से भरी रहीं। कई बार दोनों की आँखों से ख़ूब आँसू भी टपके। मगर अच्छा यह रहा कि हम एक डिसीज़न तक पहुँच गए। और साथ ही मैं एक नए निष्कर्ष पर भी पहुँची, कि सीमोन बोउवार की सेकेंड सेक्स किताब में लिखी यह बात पूरी तरह सच नहीं है कि "यह कहना अतिशयोक्ति ना होगी कि पुरुष नारी का आविष्कार कर लेता, यदि परमात्मा ने नारी की सृष्टि ना की होती।"

मैंने मन ही मन कहा कि इस इक्कीसवीं सेंचुरी का पूरा सच यह है कि, "नारी ने अपने लिए पुरुष का आविष्कार कर लिया होता यदि परमात्मा ने पुरुष की सृष्टि ना की होती।" उस वक़्त मुझे अपने कुछ फ़्रेंड्स की और उनके रिलेटिव्स की बातें, उनके किए गए काम याद आ रहे थे। जो कि मेरी मॉम से कम नहीं थे, बल्कि दो तो ऐसे विचारों की हैं, ऐसी लाइफ़स्टाइल को जीती हैं कि उसे देखते हुए यह मानने में मुझे कोई शक नहीं कि मेरी मॉम उनसे बहुत पीछे हैं।

मगर इस डिसीज़न ने मेरे कॅरियर पर बहुत बुरा प्रभाव डाला। मदर से एक लंबे गैप या यह कहें कि ना के बराबर कम्युनिकेशन होने, इमोशनल रिश्ते के कमज़ोर से धागे से जुड़े होने के कारण मेरा कॅरियर बिखर गया। मैं स्वयं कॅरियर के लिए पूरा एफ़र्ट नहीं कर पा रही थी। ड्रीम डॉक्टर बनने का था लेकिन वीक एफ़र्ट, मौज-मस्ती की तरफ़ ज़्यादा झुकाव के चलते डॉक्टर नहीं बन सकी। किसी तरह नर्स बन गई।

यह कहने में मुझे कोई हिचक नहीं कि मदर से अच्छे रिलेशन होते और वह अपनी ख़ुशियों को सेलिब्रेट करते हुए एक गुड मदर, गुड पेरेंट्स का भी रोल अच्छे से प्ले करतीं तो मैं डॉक्टर बन जाती। पढ़ने में क़तई कमज़ोर नहीं थी। हाँ तब मेरा स्वभाव ऐसा था कि उसे देखते हुए मुझ पर गुड पैरेंट की एक पतली सी छड़ी की छाया बनी रहनी चाहिए थी। जो मुझे ठीक रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करती, उस पर चलने के लिए प्रेशर बनाए रखती। पतली सी छड़ी की छाया ना होने का रिज़ल्ट यह हुआ कि डिसीज़न डे के तीन साल बाद ही मैं बुलेट बाइक ले आई। मदर से पूछा तक नहीं। पूछती भी क्यों, उनसे कोई रिश्ता रह ही कितना गया था।

उन्होंने घर में नई बाइक देखी लेकिन कुछ पूछा तक नहीं। उनके पास अपनी ख़ुशी सेलिब्रेट करने के बाद इतना समय कहाँ रहता था कि वह यह देखतीं कि मैंने कुछ साल पहले डैड द्वारा साइकिल दिए जाने पर बाइक लाने की ज़िद की थी। और पढ़ाई पूरी किए बिना ही ले आई। मेरी पढ़ाई कैसी चल रही है, क्या पढ़ रही हूँ, क्या करूँगी? कभी कुछ नहीं पूछा। वैसे उनसे यह अपेक्षा करना मूर्खता ही थी। डिसीज़न डे के बाद हर महीने में दो तीन बार ऐसा होता था कि वह उसी आदमी के साथ ही कहीं जाकर रहती थीं। यह तक नहीं बताती थीं कि कहाँ हैं। कब आएँगी। किसके साथ हैं। हालाँकि मुझे यह तो मालूम ही रहता था। पहली बार जब ग़ायब हुई थीं तब ज़रूर पूछा था, लेकिन जो रिप्लाई मिला उसके बाद मैंने कभी नहीं पूछा।

असल में एक मकान में ही हम दो अजनबियों की तरह रह रहे थे। एक दूसरे के कमरे में जाते तक नहीं थे। इस बीच मैंने जस्टिन के बारे में जानने की बहुत कोशिश की लेकिन पता नहीं चला। उसके घर छोड़ने के क़रीब पाँच साल बाद एक रिश्तेदार से बाई चांस ही मालूम हुआ कि वह बेंगलुरू में है। वहीं कोई बिज़नेस कर रहा है। और मैरिज भी कर ली है, एक बेटा भी है। यह सुनकर मैं बहुत ख़ुश हुई थी। मदर को भी बताया था तब उन्होंने धीरे से कहा, "ओह जीसस, थैंक्यू।" उनकी आँखों में तब मैंने ख़ुशी की चमक देखी थी। मैंने सोचा चलो ठीक है, कोई किसी के साथ नहीं है। सब अलग रह कर ख़ुश हैं तो यही सही।

मैं नर्स की जॉब से कुल मिलाकर संतुष्ट थी। कुछ बड़ा करने की इच्छा कहीं गहरे दब चुकी थी। नर्स की जॉब करते-करते मुझे पाँच साल बीत गए थे। और साथ ही कार्लोस के साथ रिश्ते बने हुए तीन साल। वह बड़ा ही सक्सेसफ़ुल मेडिकल रिप्रेज़िंटेटिव था। हॉस्पिटल में ही मुलाक़ात हुई थी। हम दोनों एक ही तरह की लाइफ़ स्टाइल पसंद करते थे। इसलिए जल्दी ही बहुत क्लोज़ हो गए। कुछ दिन बाद ही मैंने मदर से उसका परिचय करा दिया था। मैंने देखा उन्होंने उसे कोई इंपॉर्टेंस नहीं दी। हालाँकि तब-तक मेरे लिए इस तरह की बातें कुछ मैटर भी नहीं करती थीं।

वह कुछ कहतीं भी तो क्या? जल्दी ही कार्लोस घर पर रुकने भी लगा। वह एक ज़बरदस्त बाइकर था। मैं जान छिड़कती थी उसकी बाइकिंग पर। उसकी बाइक भी बुलेट ही थी। छुट्टी मिलते ही हम दोनों लंबी राइड पर निकल देते थे। एक बार हम दोनों ने अपनी बाइकिंग कैपेबिलिटी को चेक करने की सोची। तय किया कि इस बार छुट्टी में किसी हिल एरिया के लिए निकलेंगे। 

छुट्टी मिलते ही हम दोनों एक ही बाइक पर हफ़्ते भर के टूर पर निकल दिए। लखनऊ से हरिद्वार, देहरादून होते हुए चंपावत तक गए। यह लम्बा रास्ता था। हमें लखीमपुर होते हुए सीधा रास्ता पकड़ना चाहिए था। मगर मस्ती में चूर हमारा जिधर मन हुआ उधर ही चल दिए। सीधा या टेढ़ा कुछ भी हमारे मन में नहीं था। छुट्टियाँ कम पड़ रही थीं, लेकिन हम दोनों ने तय किया कि हम अपना टूर चंपावत तक पूरा करके ही लौटेंगे।

हम अपनी जर्नी के आख़िर में चंपावत स्थित बनबसा के उस स्कूल और अनाथालय भी गए जिसके बारे में फ़ादर ने कई बार बताया था। उनके अनुसार हमारे ग्रैंड फ़ादर उस स्कूल में पढ़े थे। हमें जब पता चला कि स्कूल के संचालक ब्रिटेन के एक नागरिक हैं तो हमने वहाँ के लोगों से उनका संपर्क नंबर माँगा, मगर न जाने क्यों उन लोगों ने नंबर नहीं दिया। मगर हम निराश नहीं हुए और अपनी रोमांचक जर्नी पूरी कर वापस चल दिए।

जैसी ख़ूबसूरत मस्ती भरी हमारे टूर की रवानगी थी, वापसी उसके उलट अत्यंत दुखद रही। रास्ता पूरा करने के बाद घर के क़रीब पहुँचे तो रिंग रोड पर हमारी बाइक एक पेट्रोल टैंकर से टकरा गई। कार्लोस ऑन द स्पॉट हमें छोड़कर प्रभु यीशु के पास चला गया। मेरा एक पैर, हाथ, कई पसलियाँ टूट गर्ईं। दो महीने हॉस्पिटलाईज़ रही। घर पर भी एक महीना बिस्तर पर ही बीता। इस दौरान मदर ने जिस तरह मेरी देखभाल की वह बहुत अच्छी थी। लेकिन एक माँ की तरह नहीं, एक इनक्रेडिबल नर्स की तरह।

इस सारे समय मुझे डैड की बहुत याद आई। कार्लोस ने मुझे बहुत आँसू दिए। मैं बेड पर पड़े-पड़े उसके लिए बहुत रोती। मदर यह देख कर एक बार सिर्फ़ इतना बोलीं, "जो नहीं रहा उसके लिए रोते नहीं। जो दुनिया में सामने है उसे देखो।" मैंने सोचा क्या देखूँ, जो देख रही हूँ वह कहीं से कम से कम मेरे लिए तो अच्छा नहीं है। कितनी बार मुझे आपके हेल्प की तुरन्त ज़रूरत पड़ी, लेकिन आप अपने कमरे में उस बास्टर्ड आदमी के साथ बंद रहीं। आप दोनों की आवाज़ मुझ में कितनी खीज पैदा करती थी इसका अंदाज़ा आप नहीं लगा सकतीं।

आप दोनों की आवाज़ सुनकर बार-बार डैडी की याद आ जा रही थी। लगता जैसे वह अभी कमरे से निकल कर मेरे पास आएँगे, प्यार से सिर पर हाथ फेरते हुए पूछेंगे, "कैसी हो माय चाइल्ड।" मदर से मैंने यह भी बताया कि हम उस स्कूल और अनाथालय भी गए थे जहाँ ग्रैंडफ़ादर ने अपना समय बिताया था। लेकिन मदर ने हमारी बात का कोई रिस्पांस नहीं दिया। वह जब हॉस्पिटल चली जातीं तो मैं दस-बारह घंटे के लिए एकदम अकेली हो जाती। शुरुआती एक महीने तो दस-बारह घंटे मैं डायपर के सहारे ही बिता पाती थी। उस तक़लीफ़ के क्षण कई बार मन में आया कि मैं भी कार्लोस की तरह मर जाती तो अच्छा था। जीसस ने मुझे इस तरह की तक़लीफ़ झेलने के लिए क्यों बचा लिया।

मुझे बड़ा याद आता अपना तब का परिवार जब जस्टिन, मैं, पैरेंट्स पूरा परिवार ख़ुशियों से भरा था। सब एक दूसरे को ख़ूब प्यार करते थे। किसी को जरा भी तक़लीफ़ हो जाए तो बाक़ी सारे लोग उसकी देखभाल में रात-दिन एक कर देते थे। मगर क्या से क्या हो गया था। मदर ने ख़ुद को, परिवार को कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया था। बेड पर मैंने जो लम्बा समय बिताया उस दौरान जीवन के कई लेशन भी पढ़े, समझे। मदर को लेकर मेरा जो नज़रिया था उसमें भी बड़ा चेंज आ गया।

अब उन्हें मैं मदर से पहले एक फ़्रेंड मानने लगी। ऐसी फ़्रेंड जो अपनी लाइफ़ को एंज्वाय करे, ऐसी फ़्रेंड जिसे अपनी लाइफ़ को एंज्वाय करने से कोई भी स्थिति रोक नहीं सकती। कोई मर्यादा, सीमा है उसके लिए तो यही कि उसे अपनी लाइफ़ अपने एंज्वायमेंट से प्यार है। परिवार उसके एंज्वायमेंट में एक रोड़ा था जिससे छुटकारा पाने में उसे कोई संकोच नहीं हुआ। उसी समय मैंने महसूस किया कि मैं उनके रास्ते से पूरी तरह नहीं हट पाई हूँ, इसलिए अब मुझे भी पूरी तरह हट जाना चाहिए। मगर कैसे यह तय नहीं कर पा रही थी। काफ़ी समय इसी उधेड़बुन में बीत रहा था। क़रीब छः महीने बाद मैंने ऑफ़िस ज्वाइन कर लिया था। लेकिन बाइक चलाने लायक़ नहीं हो पाई थी। ऑटो से ही जाना-आना हो पा रहा था। उस समय भावेश सान्याल मेरे क़रीब आया। ऑफ़िस में मेरी बड़ी मदद करने लगा। कुछ समय बाद मैं उसी के बाइक पर आने-जाने लगी।

उसके विहेवियर में मुझे अक्सर कार्लोस की झलक मिलती, जब वह मेरी किसी काम में हेल्प करता तो लगता जैसे डैडी उतर आए हैं। मैं ऑफ़िस जाते समय एक बार अपनी बाइक को अवश्य छूती थी। उसे भरपूर एक नज़र अवश्य देखती थी। उस पर नज़र पड़ती तो कार्लोस की याद एकदम ताज़ा हो उठती। मैं तब डॉक्टर से बार-बार पूछती थी कि मैं फिर से बाइक चलाने लायक़ कब तक हो जाऊँगी। वह मुस्कुरा कर कहतेे, "मैं अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास कर रहा हूँ।" मैं और ज़ोर देती तो कहते, "एक वर्ष तो लग ही जाएगा।" जब वह एक वर्ष कहते, वह भी निश्चित नहीं तो मेरा दिल बैठ जाता। बड़ी मायूसी होती। एक नर्स होने के नाते मैं भी इतना जानती हूँ कि मेरी मेन प्रॉब्लम क्या है। पसलियों, प्रपादास्थि या तलुओं की [मेटाटार्सल] हड्डियों में भयानक टूट-फूट इतनी जल्दी ठीक होने वाली नहीं है। डॉक्टर की बात सुनकर जब मैं सीरियस हो जाती थी तो भावेश बहुत ढांढ़स बँधाता था।

ऑफ़िस ज्वाइन किए हुए मुझे तीन महीने ही हुए थे कि एक दिन छुट्टियों में मैंने मदर को बाथरूम से बाहर आते देखा। वह हफ़्ते भर का कपड़ा मशीन में धुल कर बाहर निकल रही थीं। मैंने आँगन में नेचुरल लाइट में उनका चेहरा देखा तो नज़र उनके चेहरे पर टिक गई। फिर कई हिस्सों पर टिकी। मैं साफ़ देख पा रही थी कि उन्होंने अपने शरीर के कई हिस्सों को आल्टर कराया है। ख़ासतौर से अपने ऊपरी हिस्से में, उनके होंठ, गाल, थुड्डी, गर्दन हर जगह चेंज साफ़ नजर आ रहा था। उन्होंने बड़ी बारीक़ी से अपनी प्लास्टिक सर्जरी कराई थी। उन्हें देखकर मुझे ख़ुशी हुई। मैं मुस्कुराए बिना नहीं रह सकी।

मन ही मन कहा मॉम तो इस उम्र में भी इतनी ब्यूटी कॉन्शेयस हैं। वह अपनी उम्र से वाक़ई छः सात साल कम लग रही थीं। सच में ख़ूबसूरत लग रही थीं। मुझसे रहा नहीं गया।

मैंने बोल ही दिया मॉम आप वाक़ई बहुत ख़ूबसूरत लग रही हैं। मेरी बात का आशय वह समझ गईं थीं। समझते ही बोलीं, "थैंक्यू।" उनके चेहरे पर भी मुस्कुराहट थी। लेकिन मुझे लगा कि उन्होंने जो चेंज कराया है, हेयर स्टाइल उस हिसाब से मैच नहीं कर रही है। मैंने कहा मॉम हेयर स्टाइल भी चेंज कर लीजिए। मेलिना ट्रंप जैसी स्टाइल इस लुक को और इंप्रूव कर देगी। वह मुस्कुरा कर रह गईं। मॉम की ख़ुशी देख कर मुझे बहुत अच्छा फ़ील हुआ था।

तेज़ी से एक साल का समय बीत गया। लेकिन मेरा पैर ना मेरी और ना ही डॉक्टरों की अपेक्षानुसार इंप्रूव हो रहा था। हालाँकि फिर भी आराम से चलने-फिरने लगी थी। लेकिन बाइक चलाने के लायक़ नहीं हुई थी। इसी बीच एक दिन अचानक ही पता चला कि उस आदमी ने अपनी बीवी को डायवोर्स दे दिया है। और अब वह और मॉम दोनों मैरिज करने जा रहे हैं। उसने अपने को अपने परिवार से बिल्कुल अलग कर लिया है। उस दिन मैंने सोचा यह अच्छा हुआ दोनों लोग मैरिज करके आराम से ख़ुशी से रहें। मन में यह बात भी बड़ी गहराई से उठी कि यह उस परिवार के एंगल से अच्छा नहीं हुआ है। बहुत बुरा हुआ उसके परिवार के लिए। उसकी मिसेज तीन-तीन बच्चों को लेकर कैसे अपनी लाइफ़ जियेगी। वह ज़्यादा पढ़ी-लिखी भी नहीं है।

मॉम और इस आदमी ने अपने व्यक्तिगत सुखों के लिए अपने-अपने परिवार की बलि दे दी है। मैं मॉम से बहुत रिज़र्व रह रही थी। मुझे तभी लगा कि अब सही समय है मॉम के रास्ते से पूरी तरह हट जाने का। तो उस दिन सीधे पूछ लिया मैरिज के बारे में तो उन्होंने भी बिना किसी संकोच के बता दिया। समय भी बता दिया कि अगले हफ़्ते मैरिज करने जा रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि, "मैं आज ही बताने वाली थी लेकिन तुम्हें मालूम हो गया।" मैंने कहा मैं ख़ुश हूँ। मैं बहुत ख़ुश हूँ कि आपने यह डिसीज़न लिया। मैं समझती हूँ कि यह आपको और पहले ही कर लेना चाहिए था। उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। मैंने सोचा शादी धूमधाम से होगी लेकिन मॉम ने कहा नहीं।

पाँच दिन बाद ही शादी थी। मॉम के मना करने पर भी मैंने पूरे घर को इतने दिनों में जितना रेनोवेट कराया जा सकता था, कराया। उनके कमरे में नया पेंट कराने से लेकर बेड, फ़र्नीचर, कॉरपेट सब नया बनवा दिया। पाँचवें दिन मैरिज के वक़्त चर्च में मैं उनके साथ थी। व्हाइट ड्रेस में मॉम वाक़ई बड़ी ख़ूबसूरत लग रही थीं। बड़ी मासूम सी। दोनों का पेयर ख़ूब अच्छा लग रहा था। लेकिन आदमी के चेहरे पर नज़र जाते ही मुझे उबकाई सी महसूस होने लगती थी। उसकी तरफ़ से मैं तुरंत मुँह फेर लेती थी। मुझे वह दोनों परिवारों को नष्ट करने वाला निहायत गंदा घिनौना व्यक्ति नज़र आ रहा था।

चर्च में गिने-चुने लोगों को ही इनवाइट किया गया था। एक होटल में छोटी सी पार्टी दी गई थी। शादी करके घर पहुँचने पर मैंने ही मॉम को रिसीव किया। कई रस्मों को भी पूरा किया। मॉम नहीं चाहती थीं लेकिन मैं नहीं मानी। मैंने ही उन्हें उनके कमरे में पहुँचाया। जिसे मैंने बहुत प्यारे ढंग से सजाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। वह निहायत गंदा आदमी नए ढंग से सजे ड्रॉइंग रूम में बैठा था। उसके कुछ दोस्त उसके साथ थे। वो लोग उसे भी हैंडसम कह रहे थे। लेकिन वह मुझे गंदा ही लग रहा था। जल्दी ही सारे गेस्ट चले गए। मॉम अपने कमरे में थीं। मॉम को मैंने गोल्ड का एक ख़ूबसूरत गिफ़्ट, बुके देकर नए जीवन की शुरुआत के लिए ख़ूब बधाई दी। उन्हें गले से लगाया। उन्होंने भी "माय चाइल्ड, माय चाइल्ड", कहकर मेरी पीठ थपथपाई।
मैंने उन्हें गुड नाईट बोलते हुए कहा, ओके मॉम, कल मिलती हूँ। लास्ट में मैंने मैनर्स के चलते उस गंदे इंसान को भी विश किया, गिफ़्ट दिया। और भावेश के साथ घर से पाँच किलोमीटर दूर उस घर में आ गई जिसे मैंने रेंट पर अपने लिए लिया था। इसी एक हफ़्ते में मैंने अपना नया आशियाना भी बना लिया था। इस पूरे एक हफ़्ते में भावेश सारे काम में मेरे साथ रहा। मेरा हाथ बँटाता रहा।

घर से जितना मेरा अपना पर्सनल सामान था वह मैं ले आई थी। नेक्स्ट डे सुबह ही मॉम का फोन आया "माय चाइल्ड कहाँ हो?" मैंने कहा मैं अपने नए घर में हूँ। उन्हें शॉक लगा, बोलीं, "क्या! तुम्हें घर छोड़कर जाने की क्या ज़रूरत है।" मैंने कहा मॉम अब वह मेरा घर नहीं रहा। कम से कम मैं यही मानती हूँ, डैड रहे नहीं, जस्टिन ने छोड़ दिया। और अब आप भी आप नहीं रहीं। सरनेम चेंज हो गया है। आप ही सोचो मॉम घर में हर जगह डैड, जस्टिन, मेरी मॉम की अनगिनत यादें हैं, वहाँ मैं किसी और को कितनी देर देख पाऊँगी। वह भी उसे जो मेरे घर की इस हालत के लिए ज़िम्मेदार है। इसलिए प्लीज़ मॉम जैसे आप डैड, जस्टिन को भूल गईं वैसे ही अब मुझे भी भूल जाइए। अपने नए जीवन को एँज्वॉय करिए। मेरा जब मन होगा, ऑफ़िस में आपसे मिल लिया करूँगी। लेकिन वहाँ कभी नहीं आऊँगी। क्योंकि अब वह मेरा घर नहीं रहा। इसलिए प्लीज़ मुझे क्षमा कीजिए।

मॉम आप इस बात को भी ठीक से समझ लें कि हमारे आपके लिए यही अच्छा है कि हम दूर रहें। हमारी खुशियाँ अब इसी दूरी पर डिपेंड करती हैं। मॉम ने मुझे समझाने की कोशिश की लेकिन मैंने अपना मत स्पष्ट बता दिया। मॉम अब आपकी दुनिया अलग है। मेरी अलग, इस सच को स्वीकारिए। मॉम ने जब यह समझ लिया कि मैं अपनी बात पर अडिग हूँ तो उन्होंने भी मुझे अच्छे जीवन की ख़ूब शुभकामनाएँ दीं और बात ख़त्म कर दी। लास्ट में यह बोले बिना नहीं रह सकीं कि माय चाइल्ड कभी-कभी मिलने आओगी तो मुझे बहुत ख़ुशी होगी। उनसे बात ख़त्म कर मैं भावेश के साथ सामान पैक करने लगी थी। हम एक हफ़्ते के लिए चंपावत घूमने जा रहे थे। मगर बुलेट से नहीं। मेरे पैर तब भी मेरा साथ नहीं दे रहे थे। बुलेट मैंने कपड़े से कवर करके पोर्च में खड़ी करवा दी थी। कई बार मन से चाहते हुए भी हम कई चीज़ों को अपना नहीं पाते।

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