अमृत अल्कोहल दोऊ खड़े . . .

01-11-2020

अमृत अल्कोहल दोऊ खड़े . . .

डॉ. अशोक गौतम

इक्कीसवीं सदी के महामारी काल में सुर, असुर दोनों अपने अपने लेवलानुसार सृष्टि बचाने में जुटे थे तो उनके जैसे महामानव सृष्टि को खाने में। ये महामानव आपदा के इस अवसर को भी हाथ से नहीं जाने देना चाहते थे। जो हर आपदा को अवसर में न बदले वह मेरे जैसे मानवों में महामानव ही क्या! इसलिए महामानव टाइप के तीसरे दर्जे के मानव सृष्टि को महामारी काल में भी दोनों हाथों से लूट रहे थे। मानवता के नाम पर दिल्ली की दीवारों पर आदर्श नागरिकों की तरह खुलेआम सिर झुकाए मूत रहे थे, पास में शौचालय होने के बाद भी। 

मैं बापुरा चौथाई मानव यह देख दुविधा में! इधर सुरों के हाथों में सृष्टि को बचाने के लिए अमृत  तो उधर सृष्टि को बचाने हेतु असुरों के हाथों में अल्कोहल और बीच में समाज रक्षकों के हाथों में नक़ली दवाइयाँ।  

सुर सुर थे, सो उनके मार्केटिंग हेड ने प्राथमिकता के आधार पर महामारी काल में जन कल्याण के लिए अमृत के रेट और रिबेट सहित उसके फ़ायदों के बारे में मुझे डिटेल में बताते कहा, "हे महामारी और टीके के चक्रव्यूह में फँसे एक चौथाई मानव! लो! महामारी काल में हमारा अमृत सेल में लो, चमच भर पीओ और अमर हो महामारी पर विजय पाओ। ज्यों ही तुम्हारे गले से हमारा पूरी तरह मेड इन इंडिया अमृत नीचे उतरेगा, तुम महामारी पर अमृत्व प्राप्त कर जाओगे। महामारी तुम्हारे सिर में एक भी बाल न होने के बावजूद एक बाल तक बाँका न कर सकेगी।"  अमृत का धाँसू प्रचार सुन मैं अमृत की ओर लपका ही कि तभी असुरों के मार्केटिंग हेड ने अमृत को सिर से पाँव तक ख़ारिज करते कहा, "रे महामारी से डरे मानव! अमृत से ख़बरदार! आजकल अमृत और दवाइयों में डटकर मिलावट चली है। ये सुर आज तक धोखे से मृत्युजीवी को अमृत के नाम पर जो मन में आया बेचते रहे हैं। दिमाग़ है तो तनिक सोचो! नश्वर संसार में कोई अमर कैसे हो सकता है? आजतक ये सुर दिमाग़दारों तक से झूठ बोलते आए हैं। अमर होने के लालचियों की जेबें काटते आए हैं। ये जानते हैं कि अमरत्व के नाम पर बुद्धिजीवियों के हेड को भी मज़े से उल्लू मज़े में बनाया जा सकता है। देख सको तो देखो,  इस महामारी के दौर में जो-जो इनसे अमृत ले अमृतपान कर रहे हैं,वे अपनी आयु से पहले मर रहे हैं। इसलिए अमृत से सहस्त्र गुणा विश्वसनीय हमारा अल्कोहल लो और अपने का मरने से बचाओ।"

कुछ देर मैं दो पाटों के बीच में! कुछ कुछ यह जानते हुए भी दुविधा में रहने पर न माया मिलती है न राम! असल में जिसके पास अपनी अक़्ल नहीं होती या होती तो है, पर वह उसको लगाने में आलस करते हैं, उनका मेरे वाला हाल होता है। भैयाजी! माया और राम दोनों तो एकसाथ मिलने से रहे। हाँ! चुनावी मजबूरी में मिल जाएँ तो मिल जाएँ।  

जिन पर सरस्वती की कृपा होती है, वे सड़कों पर सुरीली आवाज़ में भजन गाते फिरते हैं, अख़बारों में मुफ़्त में युग प्रवर्तक लिखते फिरते हैं। जिन पर लक्ष्मी की कृपा होती है वे सरस्वती के उपासकों से फ़्री में भजन गवा उन्हें बाज़ार में बेच मालामाल हो जाते हैं। फ़्री में अपने अख़बारों पत्रिकाओं में लिखवा सरस्वतीपुत्रों को नाम  देने का लारा दे समय से पहले मरवाते हैं। सरस्वतीपुत्रों के शरीर की सूखती चर्बी अपने जिस्म पर लबेड़ साहित्य के पारखी होने का ढोंग कर समाज में वाहवाही लूटते हैं।

सुरों ने अपने अमृत के बारे बहुत बाज़ारू बारीक़ी से डिटेल में मुझे बताया, पर मेरी समझ में ख़ास तो छोड़िए, आम भी कुछ नहीं आया। आख़िर सुरों द्वारा अपने प्रॉडक्ट के बारे में गला फाड़-फाड़ कर बताने के बाद मैंने तनिक दिमाग़ पर ज़ोर डाल सोचा– यार! जो धरती पर सच्ची को अमृत होता तो कम से कम एक तो कहीं अमर हुआ दिखता मिलता, गाँव में नहीं तो दिल्ली, मुंबई में ही सही। मंदिरों में नहीं तो मस्जिदों में ही सही। पर यहाँ तो सबको मरने के बाद ही अमर क़रार दिया जा रहा है। सो वक़्त की माँग के हिसाब से मैंने सुरों के अमृत को ख़ारिज  कर दिया। मित्रो! मरने के बाद अमर हुए तो क्या अमर हुए? मज़ा तो अमर होने का इसीमें है कि ज़िंदा रहते अमर होने वाली फ़ीलिंग मिले।

अब असुरों को लग गया कि आधा पौनाशौना मानव अमृतवालों के लुभावने विज्ञापन में नहीं फँसा है तो असुरों के मार्केटिंग हेड ने समय की डिंमांड के हिसाब से परिवर्धित, परिष्कृत प्रॉडक्ट अल्कोहल के बारे में मुझे विस्तार से बताना शुरू किया जिसका मैंने कभी सेवन तो नहीं किया था, पर उसे और उसका सेवन करने वालों को अपने आपसपास देखा ज़रूर था। जबकि दूसरी ओर सच यह था कि न तो मैंने कहीं आजतक अपने आसपास अमृत देखा था न अमृत पीने वाले, "हे इतने युग बीत जाने के बाद भी सृष्टि की अनमोल कृति होने वाले एक हिस्सा मानव, तीन हिस्से दानव! अमृत-उमृत इस सृष्टि में कुछ नहीं। सब पानी ही पानी है। ये सुरों द्वारा मानव को बहलाने की चाल है। सृष्टि में सत्य अमृत नहीं, अल्कोहल ही परम सत्य है। युगों-युगों से अल्कोहल ही जीवन का अधार रही है। मेरा सच नहीं मानते तो सुरों से भी पूछ लो। सच तो यह है कि अमृत वाले भी सारा दिन अमृत का व्यापार करने के बाद जब रात को थके-हारे बिस्तर पर पड़ते हैं तो अपनी थकान मिटाने के लिए अमृत का नहीं, अल्कोहल का ही गिलास लेते हैं।"

"तो?" मेरे यह पूछने भर से ही अब असुरों के मार्केंटिग हेड भाँप गया कि सुबह-सुबह उठकर कर गंदाजल पीने वाला बंदा ज़िंदा रहने के चक्कर में धीरे-धीरे उनके अल्कोहल की ओर आकर्षित हो रहा है। तब असुरों के मार्केटिंग हेड ने गिलास अल्कोहल गटकने के बाद मुझे पुनः संबोधित करते कहा, "जानता हूँ! तुमने अल्कोहल को कभी मुँह नहीं लगाया। अल्कोहल वाली कोई दवाई गले से नीचे नहीं उतारी। पर कटु सत्य यह है कि अनादिकाल से जीवन में उतना महत्व अमृत का नहीं रहा, जितना अल्कोहल का रहा है। अल्कोहल ही सुरा का नया संस्करण है। अब भी यह पूर्णतया स्वदेशी है। अल्कोहल जितनी जीवन के लिए अनिवार्य पहले थी, उतनी की प्रासांगिक आज भी है, और कल भी रहेगी। कोरोना से बचने के लिए निक्कमे से निक्कमा डॉक्टर आज हाथ अमृत से धोने को कह रहा है या अल्कोहल से?

"अल्कोहल से गुरु!" मैं हतप्रभ! इस कहते हैं आपदाकल में धड़ाधड़ माल बेचने की कला।

"जब तुम्हारे आसपास ये वे प्रसन्न मुद्रा में होते हैं तो क्या लेते हैं? अमृत या अल्कोहल?” 

"अल्कोहल?"

"जब किसीके  कोई पैदा होता है तो वहाँ अमृत छलकता है या  अल्कोहल?"

"अल्कोहल।"

"जब कोई मरता है तो दुख में वहाँ अमृत पिया जाता है या अल्कोहल?" 

"अल्कोहल।"

"जब तुम्हारे जैसे शादी हो जाने पर प्रेमिका के बिछुड़ने के ग़म में दुखी और बीवी मिलने के ग़म में दुखी होते हो तो क्या पीते हो, अमृत या अल्कोहल?" 

"अल्कोहल ही हे असुराधीश।"

"जब तुम बेहद तनावग्रस्त होते हो तो तुम्हें आत्महत्या करने से कौन बचाता है? अमृत या अल्कोहल?"

"अल्कोहल सर!"

"लोकतंत्र के चुनाव में अमृत विजय दिलवाता है या अल्कोहल?"

 "अल्कोहल ही।"

"अच्छा, एक और बात बताओ! दफ़्तरों में काम करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका कौन निभाता है, अमृत या अल्कोहल?"

 "अल्कोहल मेरे दीनानाथ!"

"दूर क्यों जाना। महामारी काल में सरकार ने समाज को बचाने के लिए पहले ठेके खोले या मंदिर?" 

"ठेके।"

"ग़रीबी में भी जीवन जीने की ललक अमृत पैदा करता है कि अल्कोहल?" 

"अल्कोहल मेरे बापों के बाप अल्कोहल!"

"लॉकडाउन में सरकार की चौपट अर्थव्यवस्था को गति किसने दी? अमृत ने या अल्कोहल ने?"

"अल्कोहल ने!" मैंने चुपचाप आगे कोई तर्क कुतर्क सुने किए बिना असुरों से दुम दबाए अल्कोहल ले बगल दबाई और महामारी काल में महामारी पर विजय पा अपने रास्ते हो लिया। 

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में