आलोचना की वाचिक परम्परा का नामवर

01-05-2020

आलोचना की वाचिक परम्परा का नामवर

डॉ. नितिन सेठी

साहित्य में रचनात्मकता और विचारधारा को सर्वप्रथम स्थान देने वाले नामवर सिंह ने अपनी विशिष्ट आलोचना पद्धति विकसित की। वे प्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक-चिंतक के रूप में हिन्दी साहित्य में प्रतिष्ठित हैं। उनकी आलोचना-समीक्षा का आधारभूत तत्व रचना होती है। आलोचना उनके लिए केवल आस्वाद नहीं है, एक सार्थक विश्लेषण-मूल्यांकन का भाव भी वे अपनी आलोचना दृष्टि के आगे रखकर चलते हैं। नामवर जी का जन्म बनारस के गाँव जीअनपुर में सन् 1927 में हुआ। आपके पिता नागर सिंह गाँव के प्राइमरी स्कूल में अध्यापक थे। पिताजी के परिश्रम और चरित्रबल का गहरा प्रभाव नामवर जी पर पड़ा। सन् 1949 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के एम.ए. पाठ्यक्रम में उन्हें प्रवेश मिला। वहीं नामवर जी ने ‘हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योगदान’ नामक लघु शोध प्रबंध लिखा। यहीं आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी से उनका मेल हुआ। जुलाई 1959 में आप सागर विश्वविद्यालय में नियुक्त हुए। 1969 में जोधपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष का पदभार मिला। सन् 1974 में वे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा केन्द्र में अध्यक्ष-प्रोफेसर के पद पर आसीन हुए। यहीं से नामवर सिंह जी के व्यक्तित्व को एक नवीन दिशा और दशा मिली।

नामवर सिंह जी को पाठ्यक्रम सुधारक के रूप में सदैव याद किया जाता रहेगा। तत्कालीन पाठ्यक्रम केवल छायावाद तक ही हिन्दी साहित्य की पहचान रखता था। उन्होंने उर्दू साहित्य का सामान्य अध्ययन भी पाठ्यक्रम में जोड़ा। भारतीय व पाश्चात्य काव्यशास्त्र पर नामवर सिंह का अच्छा अधिकार रहा है। आपने पाठ्यक्रम में प्रगतिवाद, आलोचना, काव्यशास्त्र जैसे नवीन विषयों को स्थान देकर पाठ्यक्रम को मुख्यधारा से जोड़ दिया।

नामवर जी ने सन् 1945 तक केवल कवितायें ही लिखीं। प्रगतिशील लेखक संघ की गोष्ठियों में होने वाली बहसों-चर्चाओं-मेल मिलापों ने उनके सोचने समझने की अभिवृत्ति को ही बदल डाला । ब्रजभाषा में ‘पुनीत’ उपनाम से कवितायें लिखने वाले नामवर सिंह अशोक वाजपेयी से एक बातचीत में कहते हैं, "इस क्रम में मैं देखता हूँ तो क़ायदे से आलोचक बनने का और आलोचना लिखने का कोई इरादा मेरा नहीं था, आप ही की तरह कविता से मैंने जीवन शुरू किया था। फिर एक ऐसा क्षण आया जब लगा कि ज़्यादा सार्थक, बल्कि कहना चाहिए ज़्यादा ज़रूरी आलोचना कर्म है।" उल्लेखनीय बात यह भी है कि आरम्भिक कृतियों को छोड़कर नामवर जी ने पुस्तक के रूप में कोई सृजन नहीं किया। उनके शिष्यों-श्रोताओं-आयोजकों ने उनके महत्वपूर्ण वक्तव्यों-भाषणों को लिपिबद्ध कर उन्हें पुस्तकों का रूप प्रदान किया। उनकी महत्वपूर्ण कृतियों में ‘बक़लम ख़ुद’, ‘हिंदी के विकास में अपभ्रंश का योग’, ‘आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ’, ‘छायावाद’, ‘पृथ्वीराज रासो की भाषा’, ‘कविता के नये प्रतिमान’, ‘दूसरी परम्परा की खोज’, ‘आलोचक के मुख से’ आदि हैं जिनमें आलोचना-विवेचना के नवीन आयाम प्रस्फुटित हुए हैं। उनके आलोचना कर्म का प्रथम सोपान है ‘हिंदी के विकास में अपभ्रंश का योगदान’। इसी विषय को आगे विस्तार देते हुए उन्होंने अपना शोध कार्य ‘पृथ्वीराज रासो की भाषा’ पर केन्द्रित किया। ज्ञातत्व है कि शुक्ल जी हिंदी साहित्य की जड़ों को अधिक से अधिक दसवीं सदी से मानते थे। नामवर जी के गुरू हजारी प्रसाद द्विवेदी ने हिंदी साहित्य की जड़ों को संस्कृत-प्राकृत तक जमा हुआ माना है। इसी परिप्रक्ष्य में डॉ. नामवर सिंह का शोधकार्य देखा जाना चाहिए।

अपनी कृति ‘आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ’ में हिंदी में चल रहे वादों के विवादों के विरुद्ध अपनी विराट् आलोचना दृष्टि डाली। अनेक वादों में से चार प्रमुख वादों-छायावाद, रहस्यवाद, प्रगतिवाद और प्रयोगवाद को उन्होंने केन्द्र में रखा। जीवन की शुद्रताओं से मनुष्य को ऊपर उठाकर उसे उच्च भाव भूमि पर प्रतिष्ठित करने का श्रेय वे रहस्यवाद को देते हैं। गाँठरहित भाषा, नैसर्गिकता, साधारण पात्रों के निर्माण की कला को नामवर जी प्रगतिवादी लेखकों की विशेष उपलब्धि मानते हैं। प्रयोगवादी कविता के सम्बंध में उनका निष्कर्ष है, "कुल मिलाकर प्रयोगवादी कविताएँ ह्रासोन्मुख मध्यमवर्गीय जीवन का यथार्थ चित्र हैं। इनमें मध्यवर्गीय हीनता, दीनता, अनास्था, कटुता, अंतर्मुखता, पलायन आदि का बड़ा ही सजीव व मार्मिक चित्रण हुआ हैं। अपनी कृति ‘छायावाद’ में बारह अध्यायों के अन्तर्गत वे छायावादी युग का गहन विश्लेषण करते हैं। सामाजिक सत्य का उद्घाटन, काव्यगत वैशिष्ट्य की पहचान, समालोचना का मान, जैसे शीर्षक विषयवस्तु को समझने का सरल माध्यम है।

‘कविता के नये प्रतिमान’ नामवर सिंह जी की सर्वाधिक महत्वपूर्ण कृति कही जा सकती है। इसकी भूमिका में ही वे आलोचक की भूमिका को स्पष्ट कर देते हैं, "लेखक का विश्वास है कि जिस तरह वैयाकरण भाषा से शब्द नहीं बनता, उसी तरह आलोचक भी काव्य के मूल्योें का निर्माण नहीं करता है। शब्दानुशासन के समान ही काव्यानुशासन भी वस्तुतः अनुशासन है, शासन नहीं।" आरम्भ में नामवर सिंह रस सिद्धान्त के प्रति विवेकपूर्ण रुख़ की माँग करते हैं। इसके बाद ‘कामायनी’, ‘उर्वशी’, ‘तारसप्तक’ के पुनर्मूल्यांकन पर पुनर्विचार किया गया है। काव्यभाषा, काव्यबिंब, काव्यसंरचना पर विभिन्न नवीन प्रतिमानों का निर्धारण किया गया है। डॉ. नामवर सिंह ने अपनी इस कृति में ‘निराला’, प्रसाद, ‘दिनकर’, रघुवीर सहाय, ‘अज्ञेय’, शमशेर बहादुर सिंह की कविताओं का बड़ी बारीक़ी से विश्लेषण किया है।

नामवर जी की ‘दूसरी परम्परा की खोज’ पुस्तक अपने आकाशधर्मी गुरु हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के साहित्यिक अवदान पर केन्द्रित है। यहाँ नामवर जी ने उन्हें व्यक्ति के रूप में न देखकर एक परम्परा के रूप में देखा है। इसमें आठ अध्याय हैं। भूमिका में वे स्पष्टतया लिखते हैं, "इस पुस्तक में न पंडित जी की कृतियों की आलोचना है, न मूल्यांकन का प्रयास। अगर कुछ है तो बदल देने वाली उस दृष्टि के उन्मेष की खोज जिसमें एक तेजस्वी परम्परा बिजली की तरह कौंध गई थी।" वास्तव में ‘दूसरी परम्परा की खोज’ भारत की लोकधर्मी परम्परा की ही खोज है जिसके स्फुलिंग वैदिक काल से लेकर आधुनिक युग तक दर्शनीय है। ‘लोक’ को डॉ. नामवर सिंह साहित्य का सबसे सुसंगत और विकसित प्रतिमान मानते हैं। कुछ ऐसा ही भाव हजारीप्रसाद द्विवेदी ने कबीर और उनकी लोक कविता के सम्बन्ध में रखा है। प्रकारांतर से ‘दूसरी परम्परा की खोज’ हजारीप्रसाद द्विवेदी के साहित्य-सिद्धांतों का जनवादी परिप्रेक्ष्य में अनुशीलन मानी जा सकती है।

नामवर जी ने कहानी विधा पर भी अपनी आलोचना की दृष्टि डाली है। सन् 1965 में आई कृति ‘कहानी: नई कहानी’ में, भैरवप्रसाद गुप्त के संपादन में निकलने वाली ‘कहानी’ पत्रिका में प्रकाशित विभिन्न आलेखों का संग्रह है। इस पत्रिका के ‘हाशिये पर’ नामक स्तम्भ में वे जनवरी 1960 से दिसम्बर 1962 तक लगातार लिखते रहे। नामवर जी अपनी इस पुस्तक में कहानी को समझाते हुए लिखते हैं, "कविता में जो स्थान लय का है, कहानी में वही स्थान कहानीपन का है। कविता चाहे जिस हद तक छंदमुक्त हो जाये, वह लयमुक्त नहीं हो सकती। कहानीपन से रहित गद्य रचनाओं के बारे में यही बात लागू होती है।" आगे विभिन्न कहानीकारों की विशिष्टताओं का वर्णन वे करते हैं, "चित्रकला में नवीन प्रवृत्तियों का प्रवर्तन करने वाले पिकासो जैसे चित्रकारों ने जिस प्रकार परम्परागत रूप से खंडित करके नये-नये अनुक्रमों द्वारा जीवन विस्तार के विविध आयामों को चित्रित किया, उसी प्रकार संभवतः आज की हिन्दी कहानी में भी यह कार्य कहीं-कहीं चल रहा है। रेणु और मार्कंडेय ने इस कला के द्वारा यदि ग्राम जीवन के कुछ मार्मिक पक्ष उभारे हैं तो निर्मल वर्मा और राजेन्द्र यादव ने भी जीवन के अन्य क्षेत्रों के अलक्षित पहलू दिखलाये हैं। इसी को कुछ लोगों ने यथार्थ को विकृत करना कहा है। वस्तुतः यह दूसरे स्तर पर यथार्थ के जटिलतर रूप की उपलब्धि मानी जा सकती है।" नामवर जी ने नई कहानी पर भी विचार किया है। ज्ञातत्व है कि स्वयं नामवर जी ने एकमात्र कहानी ‘कहानी की कहानी’ लिखी थी जो मार्च 1945 में ‘क्षत्रिय मित्र’ नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई थी।

नामवर सिंह ने आलोचना के अपने आधारभूत सूत्र विकसित किये। उनकी आलोचना का फैलाव जिन दो सूत्रों को लेकर हुआ है, वे हैं- व्यापकता और गहराई। सन् 1957 में आई उनकी पुस्तक ‘इतिहास और आलोचना’ में यह निबंध इसी शीर्षक से संकलित भी है। नामवर जी के इस संबंध में शब्द विचारणीय है, "देखना यह है कि किसी लेखक में व्यापकता के होते हुए भी जब हम गहराई की कमी पाते हैं तो वस्तुतः वह गहराई की कमी व्यापकता की ही कमी तो नहीं है ? इसी तरह कोई लेखक संकीर्ण होते हुए भी गहरा मालूम हो तो विचारने की ज़रूरत है कि कहीं उनकी उस गहराई में ही तो कमी नहीं हैं? मानवीयता की व्यापक भूमि पर ही कोई अनुभूति गहरी हो सकती है।" ‘आलोचना’ पत्रिका के सम्पादक के रूप में भी नामवर ने ख़ूब नाम कमाया। एक लम्बे अंतराल के पश्चात् नामवर जी की कुछ और कृतियाँ भी साहित्य-जगत् में आयीं। पटना में आयोजित ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ की सभा में आपने पाँच लम्बे आख्यान प्रस्तुत किये जो बाद में राजकमल प्रकाशन से ‘आलोचक के मुख से’ नामक पुस्तक के रूप में संगृहीत किये गये। ‘कविता की जमीन और जमीन की कविता’, ‘प्रेमचंद और भारतीय समाज’, ‘जमाने से दो-दो हाथ’, ‘हिन्दी का गद्य पर्व’, ‘आलोचना और विचारधारा’, ‘साहित्य की पहचान’ जैसी कृतियाँ पिछले आठ-दस वर्षों में आयी हैं और सभी ने मनन-चिंतन के नवीनतम गवाक्षों की ओर पाठकों का ध्यान खींचा है।

वाचिक परम्परा के आलोचक नामवर सिंह का नाम विभिन्न विवादों को भी जन्म देता रहा है। परंतु उनमें अपनी बात को ताल ठोंक कर कह पाने और मनवाने की क्षमता है। अपनी सृजनधर्मिता, अन्वेषण क्षमता, मूल्यपरकता और वैचारिक प्रतिबद्धता के कारण नामवर सिंह का नाम हिन्दी आलोचना के क्षेत्र में सदैव अमर रहेगा।

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