ऐ मैगुसारों सवेरे सवेरे

28-04-2007

ऐ मैगुसारों सवेरे सवेरे

अब्दुल हमीद ‘अदम‘

ऐ मैगुसारों सवेरे सवेरे
ख़राबात के गिर्द फेरे पे फेरे

 

मैगुसारों=शराबियों; ख़राबात=मदिरालय

 

बड़ी रोशनी बख़्शते हैं नज़र को
तेरे ग़ेसूओं के मुक़्द्दस अंधेरे

 

किसी दिन इधर से गुज़र कर तो देखो
बड़ी रौनकें हैं फ़कीरों के डेरे

 

ग़म-ए-ज़िन्दगी को “अदम” साथ लेकर
कहाँ जा रहे हो सवेरे सवेरे

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