आसमान से गिरे...

15-09-2019

आसमान से गिरे...

सुशील यादव

आसमान से गिरते हुए मैंने बहुतों को देखा है, मगर किसी मुहावरे माफ़िक खजूर में लटका किसी को नहीं पाया..। एक तो अपने इलाक़े में दूर-दूर तक खजूर के पेड़ नहीं, दूजा आसमान को छूने वाले आर्मस्ट्रांग नहीं।

किसी काम को वाजिब अंजाम देने के लिए आर्म का स्ट्रांग होना बहुत ज़रूरी साधन है ऐसा हमारे गुरूजी ने दूसरी तीसरी क्लास में बता दिया था। जोश के लिए अखाड़ा पहलवानी की शर्तें भी रख दी थी। हम पहलवानी की तरफ़ तो नहीं गए, केवल उनके सुझाये बादाम ने आकर्षित किया, सो खाते रहे। फ़ायदा ये हुआ की आर्म की बजाय हमारो खोपड़ी स्ट्रांग होती गई।

खजूर में लटके हुओं का इंटरव्यू लेने की दबी इच्छा आज भी है। ज़ूम-कैमरे और लेटेस्ट तकनीक के मोबाइल माइक को ले के हम हमेशा तैयार रहते हैं। सुदूर जंगल से भी ख़बर ये आ जाए कि कोई लटका हुआ है तो हम पहुँचने की शत-प्रतिशत गारंटी देने में अव्वल हैं।

एक दिन ज़ोरों से हाँफता नत्थू आया, “सर जी जल्दी चलो, आपकी इच्छा पूरी होगी। आप खजूर पर लटके हुए का इंटरव्यू लेना चाहते थे न...?”

मुझे अचंभित देख कहने लगा…, “वो अपने गाँव का है न मुच्छड़ किसान पलटू उसे गाँव से बाहर 'छीन-खजूर' पेड़ तरफ़ रस्सी लेके जाते देखा है।”

“वहाँ-कहाँ मरने जा रहा है...? चलो देखते हैं… ताड़ी-वाड़ी का चक्कर होगा...।”

स्पॉट में जाने पर मामला भी बिलकुल वैसा ही पाया...। पलटू ताड़ी उतार के ख़ुद उतर रहा था...।

हमारे दोनों कंडीशन को फ़ुल-फ़िल नहीं करता था; न तो वो अंतरिक्ष से गिरा मानव था, ना आ के खजूर पे लटका था। फिर भी टाइम पास की गरज से उसी से कल्पित इंटरव्यू का रिहर्सल कर ली।

पलटू को पास बुलाया। वो ताड़ी छोड़ भागने की फ़िराक़ में था नत्थू ने पकड़ लिया। पुचकारते हुए कहा घबराओ नहीं हम ताड़ी अपराध रोकने वाले महकमे के नहीं हैं। साहब जो पूछे बता दो बस ...। पलटू सहमी नज़र से देखने लगा। मैंने सवाल किया, “पलटू, बताओ तुम्हें कोई आसमान से नीचे फेंक दे, तुम ज़मीन पर आने की बजाय खजूर पे लटक जाओ तो क्या करोगे ....?”

पलटू को प्रश्न सुनते ही ताड़ी-बोध ने फिर घेर लिया। क्या मुसीबत में फँसे स्टाइल में नत्थू तारणहार पर सवालिया निगाह फेर के कहा, “आप कह रहे थे कुछ नहीं होगा, मगर साहेब हमें फेंक रहे हैं।”

पलटू -नत्थू संवाद बाद वह पूरी तरह आश्वस्त होकर इंटरव्यू को राज़ी हो गया।

पलटू उवाच .…

“साहेब जी, आप को ऊलजलूल की बहुत सूझती है, नेता चार दिन कुर्सी से चिपक क्या जाता है उसे चारों तरफ़ हरा-हरा नज़र आता है। गधे की हालात हो जाती है... अरे बाप रे... अभी तो कुछ नहीं चरा.... बहुत ज़्यादा चरना बाक़ी है .…!” उसका दम फूलने लगता है, …

“साहेब हम लोग किसान हैं, आपके सवाल के मर्म तक पहुँच गए हैं। किसान के सामने आसमान से गिरने जैसी नौबत तब आती है जब हम गाँठ के आख़िरी बीज तक को खेत में बगरा के ऊपर आसमान को तकते हैं, बरखा-मेघा बरस भी जाओ। वे ठेंगा दिखा देते हैं।

“हम साहूकार -बिचौलिये के पास बीज कर्ज़ा लेने जाते हैं। वे हमें खजूर में लटके हुए माफ़िक ट्रीट करते हैं, देखो किसनवा, तुम ऊँचे में फँसे हो, तुम्हे उतारने की लंबी सीढ़ी चाहिए। इतनी लंबी सीढ़ी आर्डर पर जुगाड़ से बनती है। सबसे पहले इस एग्रीमेंट पर अँगूठा लगाओ।

“हम अँगूठा लगाते-लगाते पूछ बैठते हैं। कोनो जतन करो हमें धकियाने ले अब की बार बचा लो साहू जी।”

“हाँ, हाँ, हम लोग हैं इसी मर्ज़ की दवा। तुम्हें अच्छे से नीचे उतारने का इंतिज़ाम किये देते हैं,” साहूकार काग़ज़ समेट कर तिजौरी के हवाले करते हुए, नोट पकड़ा देता है।

 “उसकी बनाई सहूलियत की सीढ़ी से हम उतर तो आते हैं, मगर लोचा फ़सल कटाई बाद शुरू होता है। अँगूठा लगा काग़ज़ दिखा वे खड़ी सीढ़ी को औंधा बिछा के कहते हैं या तो इसमें लेट या अगले साल की फ़सल बुवाई-कटाई के लिए हमसे कर्ज़ा ले...। ब्याज का हिसाब अभी किया ही नहीं है।”

“इन सब झमेलों से निपटने के लिए पलटू जी आप जैसी बिरादरी की क्या योजना है...?”

“किसान की योजना सिर्फ़ खेत खलिहान तक पहले की भाँति होती तो ठीक थी साहेब… अब कॉम्पीटीशन के ज़माने में, बेटे-नातियों को स्टेंडर्ड की शिक्षा देनी है, वे उधर गये तो इनके रहने-बसने पर ख़र्च होना है। ज़रूरत के ख़र्चों में आजकल नेट, टीवी, मोबाइल जुड़ गया है इनका इंतिज़ाम न हो तो उनको पढ़ाई में खलल महसूस होता है। हमारे ज़माने में एक टाकीज़ पर फ़िल्म रिलीज़ होती थी तो महीनों नहीं उतरती थी। अब चार दिन चली पिक्चर सौ करोड़ कमा लेती है, ऐसा गाँव वाले बताते हैं। आप जान सकते हैं, किसानों की कमाई का, कितना अहम भाग उनके लाड़ले, इधर इन्वेस्ट कर रहे हैं।

“सरकार ने तरक्क़ी के नाम पर गाँव को सड़क बना-बना के जोड़ दिया। देहातों में कोने-कोने तक बाइक लोन दिलवा-दिलवा के हर घर में मोटर सायकल भिजवा दी, टीवी, फ़्रिज, कूलर लगवा दिए। नतीजा क्या रह...? सब कमाऊ पूत शहरोन्मुखी निक्कमे हो गये। गाँव कोई महीनों-सालों झाँकता नहीं। बेरोज़गारों को कम पैसों में राशन, पीने को सर्व सुलभ शराब है। सरकारी ऐलान मार्फ़त ये सब चीजें स्कूल-कालेज, मंदिर-देवालय के नज़दीक उपलब्ध हैं...? क्या ख़ाक खेतों में मज़दूर जुटेंगे...?

“आप देख रहे हो ये रस्सी, हर रोज़ ये इच्छा होती है इसे गले ने डाल के झूल जाऊँ...? हम जैसों का आसमान से गिरना और आप जैसों का खजूर में लटकी लाशों पर राजनीति करना बहुत आसान है।

“भले, आपने पूछने की भले हिमाक़त न की हो, आसमान से गिरने वाले खजूर पर कैसे लटक जाते हैं ... मेरी बात को दुनिया तक पहुँचाइए सब समझदार हैं ख़ुद जान जाएँगे ....।”

माहौल में, एक गहरी निस्तब्धता छा गई... मुझे लगा एक बढ़िया इंटरव्यू वाला काम निपट गया... मगर ये क्या...? पलटू का संवाद तो केप्चर हुआ ही नहीं...।

पलटू के संवाद को केप्चर नहीं कर पाने का मुझे ताज़िंदगी अफ़सोस रहेगा, मोबाइल का स्विच ग़लती से ऑफ़ रह गया था।
ऐसी चूक या ग़लतियाँ कभी-कभी सरकार से भी हो जाती हैं। वे कहीं, ग़रीबों की योजनाओं को शुरू करने वाले बटन को ऑन करना सालों भूले रहती हैं।

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