आम आदमी के पक्ष में खड़ी कविताएँ

15-09-2021

आम आदमी के पक्ष में खड़ी कविताएँ

दीपक गिरकर

आलोच्य पुस्तक: नई रोपणी (कविता संग्रह)
लेखक: सुरेश उपाध्याय 
प्रकाशक: बोधि प्रकाशन, सी-46, सुदर्शनपुरा इंडस्ट्रियल एरिया एक्सटेंशन, नाला रोड, 22 गोदाम, जयपुर - 302006  
आईएसबीएन नंबर: 978-93-89831-76-4
मूल्य: 120 रुपए

“नई रोपणी” सुपरिचित कवि-साहित्यकार श्री सुरेश उपाध्याय का दूसरा कविता संग्रह हैं। सुरेश उपाध्याय की प्रमुख कृतियों में “हाशिये की आवाज”, “अति सर्वत्र विराजिते” (आलेख संकलन) “शब्दों की बाजीगरी नहीं”, “नई रोपणी”  (कविता संग्रह) शामिल हैं। लेखक ने प्रभातपथ (पत्रिका), प्राची (बुलेटिन), सरोकार (स्त्री केंद्रित कविताएँ), संघर्ष चेतना, उड़ान (स्मारिका) इत्यादि का सम्पादन भी किया हैं। इनकी रचनाएँ निरंतर देश की लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। श्री सुरेश उपाध्याय की सामाजिक, सांस्कृतिक व ट्रेड यूनियन आंदोलन में सक्रियता रहती हैं। इसके अतिरिक्त रक्तदान, नेत्रदान व कुष्ठरोग निदान अभियान में सुरेश उपाध्याय की सहभागिता रहती है। कवि के पास दृष्टि की गहराई और जीवन की व्यापकता है। सुरेश जी की कविताओं का फलक व्यापक है। सुरेश उपाध्याय सामाजिक सरोकारों के कवि हैं। इनकी कविताओं में पर्यावरण तथा सामाजिक-मानवीय संबंधों के प्रति गहरी चिंता दिखाई पड़ती है। कविता संग्रह की रचनाएँ ठहरकर सोचने के लिए विवश करती हैं। इस संकलन में 70 छोटी-बड़ी कविताएँ संकलित हैं। इस संकलन की कविताएँ गद्य शैली में लिखी गई हैं लेकिन इन कविताओं में वह रवानी वह बहाव है जो दिल को छू लेती हैं। श्री सुरेश उपाध्याय का दृष्टिफलक विस्तृत है। इनकी रचनाओं में व्याप्त स्वाभाविकता, सजीवता और मार्मिकता पाठकों के मन-मस्तिष्क में गहरा प्रभाव छोड़ने में सक्षम है। सुरेश उपाध्याय सच्चे यथार्थवादी कवि हैं।

कवि ने आम आदमी की पीड़ा, निराशा, घुटन, दर्द को मार्मिक रूप से अपनी कविताओं में अभिव्यक्त किया है। सुरेश उपाध्याय समाज की समस्याओं को पैनी दृष्टि से देखते हैं। “नई रोपणी” एक ऐसा कविता संग्रह है जो कई मुद्दों और विषयों पर प्रकाश डालता हैं। कवि की रचनाएँ व्यवस्था के विरुद्ध मुखर हैं। “अरमानों के खंडहर” कविता में कवि बड़ी निर्भीकता से शोषक वर्ग को बेनक़ाब करते हैं। इस कविता में कवि कहते हैं –

बिसरा नहीं पाएँगे / कैसे उजाड़ा / कनाड़िया रोड / दीपोत्सव के पूर्व 
बियाबानी का दर्द / सालता रहेगा / बाशिंदों को / पीढ़ियों तक 
आवास / व्यवसाय ध्वस्त / बिलखता गणेशगंज त्रस्त / विकासवीर मस्त / स्मार्ट बनेगा शहर / अरमानों के खंडहर  
उम्र बीत जाती है / एक घर बनाने में / शर्म नहीं आती उन्हें / बस्तियां उजाड़ने में।

“पिप्लियामंडी (मंदसौर)” कविता में व्यवस्था पर गहरा कटाक्ष हैं। इस कविता में कवि कहते हैं–

कहाँ है पिप्लियामंडी / कितना है दूर / राजधानी भोपाल से
शिवना के तट / पशुपतिनाथ से प्रसिद्ध / मंदसौर से लगभग / 15 कि.मी. दूर है पिप्लियामंडी
कितना लगता है वक्त / सियासतधानी भोपाल से / पहुंचने पिप्लियामंडी
रेल-सड़क मार्ग / से लगते हैं घंटे आठ / और हवाई मार्ग से / लगते हैं दिन आठ / पहुंचने पिप्लियामंडी।

“उठे हजारों हाथ” कविता में मौसम का कहर, प्राकृतिक आपदा और विकास मॉडल के प्रति चिंता करते हुए कवि लिखते हैं – 

मौसम का कहर / जल आप्लावित केरल / गाँव-शहर  
उठे हजारों हाथ / किसान मजदूर जन-जन / देशवासी साथ-साथ 
अमानवीय कुछ आवाज / पाप का परिणाम / कैसा बनाना है समाज? 
भुज, मोरवी, चैन्नई, उत्तराखंड / प्राकृतिक आपदा अपार / विकास मॉडल पुनर्विचार दरकार।
 

बड़े बाँध के निर्माण से एक ओर गाँवों को निगल लिया है तो दूसरी ओर ग्रामीण लोगों को अपने गाँव से विस्थापित कर दिया हैं। मेधा पाटकर कविता में लेखक लिखते हैं –

विस्थापन का दर्द आंका / पुनर्वास का खींचा खाका / संघर्षों में जीवन झोंका / बुलडोजर को जब-तब रोका 
नर्मदा घाटी का संघर्ष / जल, जंगल, जमीन / जन-जीवन का उत्कर्ष 

देश में वर्तमान में जो घटनाएँ घटित हो रही हैं उनका यथार्थ चित्रण कवि ने “मेरा देश बदल रहा है” कविता में किया है –

उंगली तोड़ देंगे / हाथ तोड़ देंगे / दौड़ा-दौड़ा कर पीटेंगे / नाक काट देंगे / गर्दन काट देंगे / जो बर्बर / असहिष्णु कहेंगे / देशद्रोही घोषित कर देंगे / क्या रणनीति है / कुछ बोलेंगे / कुछ चुप रहेंगे 
ये क्या हो रहा है / मेरा देश बदल रहा है।  

“भीड़तंत्र” और “माफ़ करना बच्चों” कविताओं में सुरेश उपाध्याय की बैचेनी और व्यथा महसूस की जा सकती है।

दाभोलकर पानसरे कलबुर्गी / जुनैद अखलाख पहलूखान / याकूब पंडित / निर्दोष हत्याएँ कितनी / क्यों कब तक?
ऊना  सहारनपुर  मुजफ्फरनगर  / बशीरहाट 
प्रताड़ना / जुल्म / ज्यादती / दंगे कितने / क्यों कब तक?      
मूक समर्थन / मुखर अवसरवादिता / घातक चुप्पी / मौन
क्यों कब तक? (भीड़तंत्र)
ऑक्सीजन का अभाव / काल के / गाल में समाव 
चमकी बुखार / मुजफ्फरपुर / बार बार 
कुपोषण के शिकार / बीमार / हजारों हजार 
माफ़ करना बच्चों / शिक्षा स्वास्थ्य कारोबार / जिम्मेदार नहीं सरकार। (माफ़ करना बच्चों)

“उन्हें सिखाना” स्त्री के अस्तित्व की कविता है। “ये कैसा मेरा गांव?” कविता में लेखक की गाँव के प्रति एक टीस महसूस की जा सकती है। संग्रह की अधिकाँश कविताओं में जंगल माफिया, रसूखी ठेकेदार के प्रति विक्षोभ, चिंता, छटपटाहट को अनुभव किया जा सकता है। “कब आओगे वसंत?”, “कामना”, “प्रकृति प्रार्थना”, “बरखा की बूंदें” आदि कविताएँ प्राकृतिक सौंदर्य पर आधारित हैं जो प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करती हैं। कविता “नई रोपणी” कथात्मकता के साथ जिस तरह से अपने पूरे यथार्थ को चित्रित करती है उससे काव्य की नई अनुभूति होती है। यही कविता का सौंदर्य है। 

कवि अपनी रचनाओं में लोगों के संघर्ष को स्वाभाविक तरीक़े से सहज रूप में व्यक्त करते हैं। इस संग्रह की रचनाएँ पाठकों को मानवीय संवेदनाओं के विविध रंगों से रूबरू करवाती हैं। इस संग्रह की एक प्रमुख विशेषता है कि कवि की दृष्टि छोटी से छोटी बातों पर गई है। संग्रह की कविताएँ हृदय को बड़ी गहराई तक स्पर्श करती हैं। कवि की रचनाएँ शोषण का विरोध करती हैं और आम आदमी के पक्ष में खड़ी दिखती हैं। सुरेश उपाध्याय की रचनाएँ देर तक पाठकों को उद्वेलित करती रहती हैं। बेशक “नई रोपणी” एक पठनीय और संग्रहणीय कृति है। आशा है इस कृति का साहित्य जगत में भरपूर स्वागत होगा। 

दीपक गिरकर
समीक्षक
28-सी, वैभव नगर, कनाडिया रोड,
इंदौर- 452016    
मोबाइल : 9425067036
मेल आईडी : deepakgirkar2016@gmail.com

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