आदर्श  ऑफ़िस के दरिंदे

01-10-2019

आदर्श  ऑफ़िस के दरिंदे

डॉ. अशोक गौतम

जबसे वे मेवानिवृत्त हुए हैं पता नहीं कैसे-कैसे, किन-किन ऑफ़िसों में सपनों में ज़ोर ज़बरदस्ती सारी रात घुसकर मेवारत कर्मचारियों से मिल तरह-तरह के मेवों के ख़्याली चटखारे लेते रहते हैं। जो बंदे सारी नौकरी एक ही ऑफ़िस में कई बार वहाँ से तबादला होने के बाद भी हर बार स्टे लेकर वहीं जमे रहे, वे इन दिनों सारी रात इस उस दफ़्तर विचरते रहते हैं, चरते रहते हैं। 

सच पूछो तो उनकी मेवानिवृत्ति के बाद उन्हें आने वाले ऑफ़िसों के सपनों को सुन-सुन कर अब मैं तंग आ गया हूँ। यार! बहुत हो लीं मेवारत कर्मचारियों के साथ सपनों में बैठकें। जो मेवारत हैं, उन्हें तो अब आराम से खाने दो। बीते दिनों को अब क्या याद करना। जो बीत गई सो बात गई। पर नहीं, मानते ही नहीं। 

यार! मेवानिवृत्त हो गए। अब मज़े से रात को तो रात को, दिन को भी लंबी तान के सोए रहो। मन करता है साफ़-साफ़ कह दूँ कि अब और मुझे नहीं सुनने तुम्हारे सपने। पर यह सोच चुप हो जाता हूँ कि कल को मुझे भी तो रिटायर होना है। ऐसे में जो मुझे भी ऐसे ही सपने आए तो मैं किसको अपने सपने सुनाऊँगा? उन्हें ही न! बस, यही सोच उनके सपने सुन रहा हूँ कि कल को वे तो कम से कम मेरे सपने सुनने वाले होंगे।

कल रात वे जिस सरकारी ऑफ़िस में घूमे वह आदर्श ऑफ़िस का था। वहाँ की सरकार ने उस  ऑफ़िस को आदर्श ऑफ़िस घोषित कर रखा था। आदर्श  ऑफ़िस बोले तो मॉडल ऑफ़िस! गई रात वे जैसे ही इस आदर्श  ऑफ़िस में घुसे, सारी रात उसमें घूमने, वहाँ के मेवारत बंधुओं से मिलने के बाद के क़िस्से सुनाते हुए यों बोले, “यार! पता है कल रात मैं सपने कहाँ गया था?”

 “कहाँ?”

“कल रात मैं एक आदर्शऑफ़िस में जा घुसा तो वहाँ के आदर्श बंदों को देख मैं दंग रह गया। वहाँ बिना किसी शोर-शराबे के सब अपने अपने ढंग से  ऑफ़िस को खाने में जुटे हुए। मौन! किसीको किसीसे कोई आपत्ति नहीं।"

यह सुन मैंने उनको बीच में रोकते कहा, "हे मेवानिवृत्त दोस्त! जहाँ किसीके खाने में कोई टाँग नहीं अड़ाता, वहाँ किसीको किसीसे आपत्ति होती ही नहीं।"

तब वे मुझे बीच में रोकते हुए बोले, "पहले पूरा तो सुन! फिर अपनी राय देना। तुम्हारी मुश्किल यही है कि तुम पूरा कुछ भी सुनते नहीं और बीच में ही अपनी राय की टाँग अड़ा हर किसीको गिराने लग जाते हो।
"... तो हुआ यों कि उस ऑफ़िस में सब अपने अपने ढंग से खाने बनाने में जुटे हुए। 

"मैंने देखा कि वे सोए-सोए भी आदर्श की बातें करते अपने अधीन हॉस्टल में अपने दोस्तों को फ़्री में ठहरा. उनसे अपने संबंध बनाने में जुटे हुए, वहाँ के कम्बल, रजाइयाँ बेख़ौफ़ घर ले जाने में जुटे हुए। तब मैंने उनसे पूछा, ’भाई साहब! ये क्या? ऐसे सरकार को चूना नहीं लग रहा है।’ तो वे मुस्कुराते बोले, ’बंधु! सरकार के चूने से ही तो अपने को चमकाया जा सकता है। ऐसा करने से संबंध बनते हैं। क्या पता कब कहाँ काम आ जाएँ?’ 

"तभी दूसरे की ओर रुख़ किया तो वे  ऑफ़िस की स्टेशनरी आठ की तो बिल साठ का बनवा उसे निकालने में मग्न। पूछा तो वे बेझिझक बिल निकालते बोले, ’तो क्या हो गया! यहाँ ऐसे ही चलता है।’

‘तो कबसे ऐसे ही चला रहे हो?’

‘जबसे यहाँ आया हूँ।’ 

"मैंने सादर उन भद्दे पुरुष के पाँव छुए और आगे हो लिया तो सामने क्या देखता हूँ कि वे  ऑफ़िस के पुराने पर्दों की गाँठ बाँध अपने कांधे पर उठाने को तैयार! पर उनसे वह गाँठ उठ ही नहीं रही थी। मैंने उन्हें तनिक रोकते पूछा, ’भैया! ये सरकारी  ऑफ़िस को बेपर्दा कर पर्दे कहाँ ले जा रहे हो?’

‘अपने घर! और कहाँ? तुम्हें भी चाहिएँ तो कहो? आधे में दे दूँगा,’ फिर वे मज़े से मेरी ओर ताकते बोले बोले, ‘तनिक मेरी इस गाँठ को उठाने में मदद कर दो तो...’

‘तो कुछ दूसरी बार ले जाते?’

‘सरकारी महकमों से माल निकालने का जो काम जितनी जल्दी हो जाए उतना अच्छा। कल को इन पर किसी दूसरे की बुरी नज़र पड़ गई तो???’ उनके सिर पर पर्दों का गट्ठर रखवा अभी हटा भी नहीं था, सामने का नजारा देखा तो दंग रह गया! वे नई कुर्सियाँ फड़वा रहे थे। जब उनसे इस बारे पूछा तो वे बोले, ’मित्र! इस बहाने साहब को भी लगता है कि वे कुछ कर रहे हैं।’

‘पर इससे जनता का पैसा बरबाद नहीं हो रहा जो....’

‘मेरा तो काम हो रहा है न! मैं बेकार की सैलरी नहीं लेता। भगवान को भी पता है इसलिए....’
‘पर ये  ऑफ़िस का नुक़सान नहीं?’
‘किसी का नुक़सान होगा तभी तो अपना फ़ायदा होगा न बंधु! दूसरे सरकार तो होती ही है नुक़सान उठाने के लिए। अच्छा, एक भी प्रमाण बताओ जहाँ से अपने कर्मचारियों से सरकार को फ़ायदा हुआ हो? या किसी उसके कर्मचारी ने उसका फ़ायदा किया हो? हे मेरे दोस्त! सरकार होती ही घाटा उठाने को है।’ उनके सरकारीहितोपदेश सुन और आगे बढ़ा तो.... मैं वह अप्रितम दृश्य देख तो मैं दंग ही रह गया।"
 
"ऐसा क्या देख लिया तुमने जो सबको दंग करने वाला ही दंग होकर रह गया?"

"देखा क्या यार! ऑफ़िसों से मैंने भी बड़ा गंद उठा-उठा खाया है। ऑफ़िसों से गंद उठाने वाले एक से एक देखे हैं, पर गंद उठाने वाला ऐसा बंदा पहली बार देखा।"

"मतलब?"

"मतलब क्या यार! न ही पूछ तो भला। कहते हुए भी उस बंदे से घिन्न आ रही है। बंदे ने बोरों में कुछ भरा था। जब नज़दीक जाकर देखा तो नाक बंद करनी पड़ी। तब नाक बंद करे-करे मैंने उनसे पूछा, ’भाई साहब! कहाँ फेंकने जा रहे हो? मैं मदद कर दूँ क्या?’ तो वे मुझ पर ग़ुस्साते बोले, ’इतनी क़ीमती चीज़ फेंकने को कह रहे हो? कमाल है!’

‘तो क्या है इनमें? बड़ी बुरी बास आ रही है।’
‘कौव्वों की बीठ। घर ले जा रहा हूँ। बाज़ार से खाद लेने के पैसे बचेंगे। शान से घर की क्यारियों में डालूँगा। क्यारियाँ लहलहा उठेंगी। आर्गेनिक सब्जियाँ उगलेंगी।’ 

‘जो इसे यहीं सबके सिर में थोड़ी-थोड़ी डाल देते तो...’

"तो आगे क्या कहा उस भ्रदपुरुष ने?"

"आगे तो तब सुनता जो बीवी चाय बनाने को न उठाती। चल आज फिर उस आदर्श ऑफ़िस में घुसने की कोशिश करूँगा। शेष फिर... लगता है बीवी जागने वाली है...," तभी अचानक बिस्तर पर पसरी उनकी बीवी की झिड़की पड़ते ही वे अपना प्रोबेशन पूरा करने किचन की ओर कूच कर गए... भीगी बिल्ली बन। 

अशोक गौतम, 
गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड,
 नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन-173212 हि.प्र
 

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