आर्दश आचार संहिता

23-02-2019

आर्दश आचार संहिता

सुदर्शन कुमार सोनी

हमारे देश में सरकारी अधिकारी/कर्मचारी नेताओं की चमचागिरी को ही सबसे बड़ा धर्म समझते हैं, इसीलिए इन्हें कोई पूछता नहीं। अदना/छुटभैया नेता इन्हें चमका देता है। वो तो भला हो पूर्व निर्वाचन आयुक्त टीन.एन.शेषन का कि उन्होंने निर्वाचन आयोग को इतना प्रभावशाली बना दिया कि नेता इससे थरथराने लगे साथ ही नेता टाईप अधिकारी भी। इसके पहले कितने निर्वाचन आयुक्त आये; देश की जनता उन्हें इसी तरह भूली हुई है जैसे उपराष्ट्रपति कब कौन था देश में।

शेषन ने ही आदर्श आचार संहिता का हौआ खड़ा किया। सही अर्थों में यह निर्वाचन आयोग का बेंत था जिसे उपयोग कम किया जाता है, दिखाया ज़्यादा जाता है। जैसे कि पहले स्कूल में मास्टर जी का बेंत होता था। उसकी चर्चा ख़ूब होती थी परंतु दिखाते बहुत कम थे ताकि दहशत बनी रहे; ऐसी ही निर्वाचन आयोग की आदर्श आचार संहिता है।

देश में/राज्यों में लोकसभा विधानसभा निर्वाचन कार्यक्रम घोषित होने के साथ ही यह प्रभावशाली हो जाती है। इसके लागू होते ही सबकी हवा निकल जाती है। वी.आई.पी. की हालत फटेहाल जैसी हो जाती है; जो कलेक्टर/एस.पी. अभी तक वी.आई.पी. के आने की सूचना पर एक-दो दिन पहले से टेंशन में आ जाते थे, अब ध्यान ही नहीं देते हैं कि वी.आई.पी. कब आये व चले गये। क्योंकि ध्यान देना भी चाहें तो आचार संहिता आड़े आ जाती है व निर्वाचन आयोग का चाबुक चल जाता है। वास्तव में आचार संहिता के समय की नौकरी को अधिकांश सरकारी अधिकारी अपनी नौकरी का स्वर्णिम काल मानते हैं।

परंतु नौकरशाही ने भी आचार संहिता का अनावश्यक हौआ खड़ा किया हुआ है। ज़रा सी बात में आचार संहिता का उल्लंघन हो जायेगा का बहाना बनाकर कार्य अटका दिया जाता है। कर्मचारी आपस में बात भी करते हैं कि नौकरी का सही समय यही होता है जब कोई भी ऐरा-गैरा ऐंठ कर बात नहीं कर सकता। कर्मचारी कहता भी है कि वह निर्वाचन आयोग का कर्मचारी है; किसी की नहीं सुनेगा। बड़े-बड़े भ्रष्ट व नियम विरुद्ध काम करने के आदी कर्मचारी नियम के क़ायल होने की बात, बात-बात पर करते हैं; नहीं तो बात का बंतगड़ बनाकर आपके काम को बेकाम कर देते हैं। आदर्श आचार संहिता केवल इसीलिये है कि निर्वाचन निष्पक्ष रूप से संपन्न हो तथा सत्तापक्ष के दबाव में सरकारी कर्मचारी पक्षपातपूर्ण व ग़लत कार्य न करें जिससे एक पार्टी विशेष या व्यक्ति विशेष को लाभ हो जाये, परंतु इसे हर काम को शक़ की निगाहों से देखने का एक हथियार बना दिया गया है जैसे कि नई बहु आने पर उसके प्रत्येक एक्शन को सास शक़ की निगाहों से व बहु सास के एक्शन शक़ की निगाहों से देखती है; उसी तरह एक पार्टी दूसरे के किसी भी कार्य को शक़ की निगाहों से देखती है।

जैसे नामांकन भरते समय एक अधिकारी ने प्रत्याशी से हाथ मिला लिया तो दूसरी पार्टी के लोगों ने कहा यह पंजा चुनाव चिन्ह का प्रचार कर रहा है तथा आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन की शिकायत हो गई।

एक ज़िले में बच्चों की मौत कुपोषण से हो रही थी व मामला आचार संहिता के उल्लंघन की छन्नी में फँसा था क्योंकि सत्तारूढ़ पार्टी ने सरकारी सहायता तत्काल पहुँचा दी तो विपक्षी ने कहा, आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन कर लाभ पहुँचाया गया है; कलेक्टर को हटाओ। निर्वाचन आयोग ने शिकायत पर जाँच शुरू कर दी, इसी बीच डेढ़ दर्जन बच्चे भगवान को प्यारे हो गये तो भी ये दोनों दल झगड़ने से बाज नहीं आये।

वर्षा कम होने से नगरपालिका/निगम ने दूसरे-तीसरे दिन ही पानी नलों से देने की व्यवस्था बनाई है। इस तरह पानी की कमी के आधार पर टैंकर माँग पर उपलब्ध कराये तो आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन हो गया की शिकायत हुई व जाँच शुरू हो गई।

सीमावर्ती ज़िलों में जंगली हाथियों ने उत्पात मचा दिया। किसानों की फ़सल बर्बाद हो गई। मुद्दा बार-बार प्रेस में उठा तो दूसरी पार्टी ने शिकायत कर दी की एक पार्टी के चुनाव चिन्ह के संगठित प्रचार का तरीक़ा खोजा गया है। मदमस्त हाथी भी इस आचार संहिता की लड़ाई से बेख़बर रहकर स्वतंत्र आचार-विचार कर फ़सलें रौंद रहे थे जैसे चुनाव जीतने के बाद नेता भी हाथी सदृश होकर जनता रूपी फ़सल को बेदर्दी से रोंदेंगे।

एक दल का चुनाव चिन्ह गिलास था। तेज़ गर्मी पड़ रही थी शहर में जगह-जगह इसने परमार्थ के नाम पर प्याऊ खोल दिये व सभी जगह एक ही तरह के गिलासों का उपयोग किये जाने लगा। यह जान-बूझकर बर्रे के छत्ते में हाथ डालने की बात थी; निर्वाचन आयोग हरकत में आ गया।

आदर्श आचार संहिता का ख़ौफ़ इतना ज़्यादा है कि सही कार्य के लिये भी बात-बात पर निर्वाचन आयोग को छोटे-छोटे मसले भी मार्गदर्शन के लिये भेजे जाते हैं, तथा आयोग का दफ़तर भी सरकारी कार्यालय की तरह मार्गदर्शन की फ़ाइलों पर बैठ जाता है।

एक जगह एक ग़रीब ग्रामीण को साँप ने डस लिया। साँप को पता नहीं था कि आदर्श आचार संहिता क्षेत्र में प्रभावशील है। मृतक की बेबा को सरकारी सहायता नहीं मिल पायी, क्योंकि आचार संहिता आड़े आ गयी थी। ठण्डी में कोई चुनाव नहीं होना चाहिये नहीं तो ठण्डी में मरने पर भी सरकार केवल आचार संहिता के कारण कंबल नहीं बाँट पाती है।

आचार संहिता में सबसे ज़्यादा चीज़ अगर नेताओं को खलती है तो वह सरकारी विमान या हेलीकॉप्टर के उपयोग पर प्रतिबंध। कई बार किराया पार्टी को देना पड़ता है। वह चुनाव के बाद फिर से मलाईदार विभागों को ब्याज सहित ऊपर ही ऊपर नीचे से भुगतान करने को कहती है।

आचार संहिता में सरकारी अधिकार/कर्मचारी नेताओं को इस तरह आँखें दिखाता है कि न जाने दुबारा इतनी हिम्मत प्रदर्शित करने का कभी मौक़ा मिलता भी है कि नहीं।

एक बार आदर्श आचार संहिता के दौरान ही होली व ईद एक साथ आ गयी। न्यूज़ पेपर ख़बर के अनुसार एक सम्प्रदाय का जुलूस निकलते समय दूसरे सम्प्रदाय के धार्मिक स्थान से पत्थर फेंके गये। इसके पहले यह ज़रूर था कि जुलूस में चल रहे लोगों ने जोश में उत्तेजक नारे लगाये, परिणाम दंगा हो गया 5 लोग मरे, 55 घायल हुये, परंतु आचार संहिता के भय से कोई प्रमुख नेता मगरमच्छी आँसू बहाने नहीं पहुँच पाया। इससे छुटभैया नेता भी आचार संहिता व शेषन को कोसते नज़र आये। आदर्श आचार संहिता के समय एक युवती नेता की संतान होने पर बहुत नाराज़ थी; आदर्श आचार संहिता के कारण उसकी शादी के समारोह में चंद लोग ही इकट्ठे हुये तथा गिफ़्ट व माल असबाब भी लिमिटेड आया। जो अधिकारी ऐसे समारोहों में लिफ़ाफ़े में शादी के उपहार के नाम पर सीधे तौर पर नगद रक़म रख देते थे वे अधिकांश समारोह में नहीं आये। आदर्श आचार संहिता कम से कम ऐसे मौक़े, जब दो दिल मिल रहे हों, आड़े नहीं आना चाहिये। लगता है शेषन जी प्यार में चोट खाये हैं; वे इसीलिये ऐसी व्यवस्था करके गये हैं।

यदि आप को ज़ोर से छींकें आ जायें तो सम्हल कर रहना, हो सकता है इसमें भी आचार संहिता का उल्लंघन हो जाये।

फ़िल्म वालों को भी बहुत सावधान रहना चाहिये कोई ऐसी फ़िल्म इस समय न प्रदर्शित कर दें जैसे “हाथी मेरे साथी” नहीं तो एक दल के प्रचार का आरोप लग जायेगा।

मुझे भी यह लेख लिखते समय आचार संहिता का डर लग रहा है क्योंकि कोई भी आरोप लगा देगा कि इन्होंने पंजे का सहारा लेकर (पंजे में लगी उँगलियों का) यह लेख लिखा है अर्थात् एक दल का प्रचार कर उल्लंघन किया है।

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