15-05-2019

32 - न्यूयोर्क की सैर भाग- 1

सुधा भार्गव

25 जुलाई 2003

न्यूयोर्क की सैर

कनाडा की राजधानी ओटावा में रहते काफ़ी दिन हो गए थे, सोचा न्यूयोर्क भी घूम लिया जाय। वहाँ जाने से पहले इन्टरनेट पर वे सब स्थान देख लिए जहाँ-जहाँ बस टूर में जाने वाले थे। पहले से कुछ ज्ञान होने पर गाइड की सूचनाओं का ख़ज़ाना जल्दी हाथ लग जाता है वरना उन्हें टटोलते ही रहते हैं। पिछली बार यूरोप भ्रमण के समय मुझसे यह ग़लती हो गई। बहुत सी बातें तो मैं कुछ समझ ही नहीं पाई। गाइड के कहने का लहज़ा भी ऐसा था कि आधी बातें हवा में ही उड़ गईं। यूरोप टूर में 19 दिनों में 9-10 देशों का भ्रमण मज़ाक न था, पैदल चलते-चलते थककर चूर हो गए। इसी कारण इस बार भ्रमण का समय कम ही रखा और 3 दिन 2 रात की न्यूयार्क की सैर आरामदायक भी रही। 

ओटावा में 25 जुलाई की बात है हमें उस दिन एक निश्चित स्थल पर जाकर टूरिस्ट बस में सवार होना था। समय सुबह 6 बजे का निर्धारित किया गया था। समय को पकड़ते हुए हम ट्रेन स्टेशन के आगे खड़ी बस के पास पहुँचे। सब यात्री अपनी सीट पर विराजमान थे, बस हमारा इंतज़ार हो रहा था। हमें अपनी 5 मिनट की देरी पर बहुत शर्म आई। ड्राइवर और गाइड रॉबर्ट ने हमारा हँसकर स्वागत किया तब कहीं जाकर झुकी आँखें ऊपर उठीं। रॉबर्ट बहुत नेक इंसान थे। हमारा सामान देख भागे-भागे हमारी सहायता करने को आए और अटैची उठाकर सामानधानी में रख दिया। सामानधानी के नाम पर पर दो छोटी छोटी गहरी गुफाएँ सी थीं और उनके ऊपर बैठने का प्रबंध था। सीढ़ियों से ऊपर जाते समय कोने में आपतकालीन शौचालय बना था। हमारे बैठते ही बस चल दी। साफ़-सुथरी, वातानुकूलित आरामदायक गद्दीदार सीटें। हवा से बातें करती हुई बस उड़ चली। मि. रॉबर्ट की आवाज़ गूँजने लगी- “आप सबका स्वागत है। आप नंबर एक अमेरिका के, नंबर एक शहर न्यूयार्क की सैर करने जा रहे हैं। आपकी यात्रा शुभ हो।” एक दूसरे का परिचय दिया जाने लगा। साथ ही संतरे का जूस, कुकीज़, न्यूट्रीग्रेन यात्रियों को मिलने लगा। फ़ूड पैकिट का वितरण अकेले रॉबर्ट ही कर रहे थे। अत: मैंने उनका हाथ बँटाना उचित समझा। मेरे बाद और कुछ लोग उनकी सहायता को खड़े हो गए। बस के 50 यात्रियों में मुश्किल से 10 भारतीय थे बाकी युरोपियन या कनेडियन थे। 

हर घंटे के बाद यह बस पेट्रोल पंप के पास रुकती थी। पेट्रोल पंप बस में पेट्रोल डालने का ही यंत्र नहीं था अपितु हमारे पेट को भरने का पेट्रोल भी वहाँ खूब मिलता था। बाहर बस का पेट्रोल और उसी से सटी एक अच्छी-ख़ासी बड़ी दुकान पर खाने-पीने का सामान, खिलौने, नई से नई शराबें, देश-विदेश की कलात्मक वस्तुएँ मिलती हैं। आराम से खाओ-पीओ। आसपास के मनभावन दृश्यों को कैमरे में क़ैद करते हुए प्रफुल्लित मन सीट पर वापस बैठ जाओ। है न सुविधावादी संस्कृति। 

क़रीब एक घंटे सफ़र करने के बाद बस, ड्यूटी-फ़्री शॉप पर रुकी। लोग बेतहाशा अंदर भागे। लौटकर आए तो कोई वाइन की बोतल पकड़े था तो कोई बीयर की। इन्हें अपनी शाम रंगीन जो बनानी थी। जैसे ही हमने कनाडा की सीमा पार की गाइड की आवाज फिर गूँज उठी- “अमेरिका महान है। यहाँ पुल बड़े हैं, किश्तियाँ बड़ी हैं, लोग बड़े हैं,भवन बड़े हैं। यहाँ की तो हर चीज़ बड़ी है।” 

तभी सीमेंट गारे का बना बड़ा सा कौवा दिखाई दिया। गाइड ने इशारा किया, “देखिए-देखिए कौवे भी बड़े हैं।” उसके विनोदी स्वभाव पर हम सब दिल खोल कर हँस पड़े। 

अद्भुत वाशिंगटन पुल के नीचे हडसन नदी बहती है। यही पुल न्यूयार्क और न्यूजर्सी को जोड़ता है। इसी सेतु द्वारा न्यूजर्सी को पार करके हमने न्यूयोर्क में प्रवेश किया। दूर से ही आसमान से मिले भवन व पुलों के जाल पर नज़र अटक गई। वहाँ पहुँचने के पहले ही कॉफ़ी ब्रेक, लंच ब्रेक मिल चुका था। अब तो सबकी निगाहें खिड़की से बाहर वह सब देखने का प्रयास कर रही थीं जिसे देखने यहाँ आए थे। ब्रिज के नीचे पानी, दूर किनारों पर बनी ऊँची-ऊँची इमारतों का झिलमिलाता रूप अजीब नज़ारा दिखा रहा था। 

ऐतिहासिक एम्पायर स्टेट बिल्डिंग- 20वीं सदी की महान उपलब्धि है। 

उसी दिन दोपहर के समय करीब 3:30 बजे हम एम्पायर स्टेट बिल्डिंग के निकट थे। गाइड से पता चला कि इस बहुमंज़िली इमारत का जन्म ही एक महत्वपूर्ण घटना है। इसका निर्माण न्यूयोर्क स्टेट के भूतपूर्व गवर्नर अल्फ्रेड ई स्मिथ और जॉन जे. रसकोव ने कराया था। 

7फरवरी 1930 में एक मज़बूत चट्टान को बम से 55फीट की गहराई तक उड़ा दिया था और फिर इसकी नींव डाली। जून 6,1930 को पाँच मंज़िलें बनकर तैयार हुईं। उस समय अन्य इमारतें भी इसी के बराबर ऊँची थीं। 18अगस्त 1930 को आकाश मार्ग को चुनौती देती हुईं इसकी 86 मंज़िलें लगभग बन कर तैयार हो गई थीं। 10 नवंबर 1930 को टावर मास्ट लगाकर यह साबित कर दिया कि यह बिल्डिंग संसार की सबसे ऊँची हैं। इसने न्यूयार्क की क्षितिज रेखा को हमेशा के लिए बदलकर रख दिया। इसका उद्घाटन समारोह मई 1,1931 को मनाया गया तथा अल्फ्रेड ई स्मिथ ने इसे जनसाधारण के लिए खोल दिया। आधुनिक तकनीकों के आधार पर निर्मित 20वीं सदी की आधुनिक इमारत ने अमेरिका को सबसे अधिक आधुनिक देश की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया। अमेरिकन जोश, स्फूर्ति, वफ़ादारी की दाद तो देनी ही पड़ेगी। 

जॉन जे रेसकोन न कोई इंजीनियर था न कोई शिल्पकार था। न ही नगर योजना तकनीक में कुशल था पर जानता था कि कार्य कैसे करवाया जाता है। वह एक चतुर वित्तकार था। उसके प्रबंध कौशल का ही यह धमाका हुआ कि एक वर्ष, 45 दिनों में अपने नाती-पोतों के साथ बड़ी-बड़ी हस्तियों के बीच गगनचुंबी भवन के उद्घाटन हेतु रिबन काटने के लिए कैंची लेकर खड़ा था। 20वीं सदी की महान उपलब्धि है यह। 

गाइड सरपट-सरपट बोलते रुका तब हमारी आँखें इधर-उधर घूमीं वरना उसी पर टिकी थीं। इसके प्रवेश कक्ष का चमकता फ़र्श दर्पण सा पारदर्शी और चिकना। जल्दी-जल्दी चलते समय मुझे तो लगता फिसल ही न जाऊँ। सड़क के किनारे दोनों ओर दर्शनीय स्थानों के रंग-बिरंगे पोस्टर्स वीडियो स्क्रीन पर आ जा रहे हैं। ऊपर से नीचे तक चहल-पहल। 

प्रति व्यक्ति टूरिस्ट टिकट 22डॉलर का ख़रीदकर हम द्रुतगामी एलीवेटर लिफ़्ट से 86वीं मंज़िल पर एक मिनट में ही पहुँच गए। इस मंज़िल पर वेधशाला (observatory) है। इससे विभिन्न दृश्यों का सरलता से अवलोकन करने लगे। इतनी ऊँचाई से शहर का अवलोकन अपने में अपूर्व अनुभूति है। विशेष इमारतों, पुल, वास्तुशिल्प व कलात्मक स्थलों पर ख़ास तौर पर रोशनी फेंकी जा रही थी। लगता था किसी जादुई जगमगाती सितारों की दुनिया में आ गए हैं।

 रात के समय 86वीं मंज़िल पर खुली हवा में खड़े होकर दर्शक नीचे झाँककर देख रहे थे। विश्वास ही नहीं होता था कि इंसान ने इतनी तरक़्की कर ली है। दूर-दूर आकाश में केवल तारों की झिलमिलाहट, रोशनी की जगमगाहट के बीच लग रहा था मानो काली मखमली रात ने हीरों की चादर ओढ़ रखी हो। पास ही आलोकित ऊँची मीनार से आती रंग-बिरंगी रोशनी की आभा में चारों तरफ़ 80 मील दूर तक शहर डूबा रहता है। ऊँचाई पर खड़े होकर ग्राउंड ज़ीरो की हमने झलक देखी जहाँ वर्ल्ड सेंटर की गगनचुंबी इमारत नष्ट हो गई थी। केवल झलक देखने से संतोष न हुआ।अ त: समय पाते ही किसी दूसरे दिन ग्राउंड ज़ीरो जाने का निश्चय किया।

वहाँ से जाते-जाते भी हम एम्पायर स्टेट बिल्डिंग को मुड़-मुड़ कर देख रहे थे ऐसा यौवन छिटका था उसके आस-पास। 

- क्रमश:

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