विशेषांक: दलित साहित्य

11 Sep, 2020

स्वामी विवेकानंद: दलितोत्थान के मसीहा

शोध निबन्ध | डॉ. कमल किशोर गोयनका

हिंदी में दलित साहित्य और दलित दर्शन की इधर खूब चर्चा हो रही है और राजनीति के समान ही साहित्य में भी दलित राजनीति उसके केंद्र में आ रहे हैं। दलितों के मसीहा डॉ. अंबेडकर ने अपने अनुयायियों के साथ ’मनु स्मृति’ को जलाकर तथा इधर ’भारतीय दलित साहित्य अकादमी’ ने प्रेमचंद के प्रसिद्ध उपन्यास ’रंगभू्मि’ का दहन करके दलित समाज की राजनीति तथा साहित्यिक मापदंडों के प्रश्नों को राष्ट्रीय चिंतन का विषय बना दिया। ऐसी स्थिति में बौद्धिक एवं साहित्य कला के क्षेत्र में डॉक्टर अंबेडकर के बाद लेखकों की एक ही सामने आए जिसमें कबीर को दलित धर्म का प्रणेता- प्रवर्तक घोषित किया, दलित संत कवियों में दलित जीवन के तत्व खोजे और आधुनिक दलित चेतना के लिए डॉक्टर अंबेडकर के साथ ज्योतिबा फुले, नारायण गुरु, पेरियार रामास्वामी नायकर, स्वामी अछूतानंद, चाँद गुरु एवं गुरु घासीदास आदि को श्रेय दिया, लेकिन डॉक्टर अंबेडकर के दलित चिंतन की तुलना में गाँधी और उनके साहित्यिक अनुयायी प्रेमचंद की दलित दृष्टि की कटु आलोचना भी उनके दलित चिंतन का अंग बनकर सामने आई। डॉक्टर अंबेडकर ने स्वयं गाँधी को ’पतित व्यक्ति’ तथा गाँधी युग को ’अंधकार युग’ कहा था और उनकी दृष्टि में गाँधी ना तो ’महात्मा’ थे और ना ’राष्ट्रपिता’ और ना ’लोक मंगलकारी चिंतक’! गाँधी के अनुयायी प्रेमचंद के उपन्यास ’रंगभूमि’ को जलाकर आज के दलित समाज में भी कुछ ऐसी ही प्रतिक्रिया व्यक्त कर दी। दलित चिंतन के इस प्रवाह में दो चार व्यक्तियों ने स्वामी दयानंद के कर्म कर जाति व्यवस्था तथा समानता के दृष्टिकोण की तो चर्चा की किंतु यह आश्चर्यजनक है कि दलितोद्धार एवं दलित अधिकारों के साथ ब्राह्मण पुरोहितवाद तथा अस्पृश्यता के विरुद्ध उद्धत एवं कठोर आवाज़ उठाने वाले स्वामी विवेकानंद की किसी ने चर्चा तक नहीं की और उनके अत्यंत आज ने दलित दर्शन की भूमिका को किसी ने भी देखने समझने का प्रयत्न नहीं किया। स्वामी विवेकानंद 19वीं शताब्दी के अंत और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में देश में दलित चेतना के सबसे प्रबल उद्भावकों में थे और उन्होंने अपने दलित दर्शन से स्वतंत्र भारत की दलित-नीति की आधारशिला रख दी थी। स्वामी विवेकानंद अपने विचारों में अत्यंत आधुनिक थे और धर्म, आध्यात्मिकता, पूर्व-पश्चिम मिलन, ज्ञान विज्ञान आदि के समान ही दलित समाज को भी जड़ और पाखंडी पुरातन तंत्र से मुक्त कर नया रूप देने के लिए पूरे राष्ट्र को ललकार रहे थे। उनके दलित दर्शन को समग्रता में देखने पर यही निष्कर्ष निकलेगा उस काल खंड में स्वामी विवेकानंद जैसा कोई दूसरा दलित-उद्धारक तथा दलितों का मसीहा नहीं हुआ।

स्वामी विवेकानंद जैसे जातिभेद को तोड़ने एवं मनुष्य की समानता का संस्कार ही लेकर पैदा हुए थे। नरेंद्र (बाद में स्वामी विवेकानन्द) 6-7 वर्ष का ही था कि एक दिन पिता की अनुपस्थिति में उनकी बैठक खाने में जाकर वह भिन्न-भिन्न जाति के मुवक्किलों के हुक्कों में मुँह लगाकर कश खींच रहा था कि पिता आ पहुँचे और पूछा, ’यह क्या कर रहे हो’ तो बालक नरेंद्र ने उत्तर दिया, ’देख रहा हूँ कि जाति नहीं मानने पर क्या होता है?’ पुत्र की अद्भुत खोज परखता और विकट समस्या का आश्चर्यजनक समाधान कौशल देखकर पिता ज़ोरों से हँसे और बोले, ’दुष्ट हो रे बड़े’1इसके उपरांत स्वामी विवेकानंद के जीवन में जाति और धर्म के भेदभाव के विरुद्ध अनेक घटनाएँ घटित होतीं जिनसे उनका धार्मिक भेदभाव और अस्पृश्यता के विरुद्ध व्यक्तित्व स्पष्ट दिखाई देता है। खानपान में अस्पृश्यता के भी विरुद्ध थे और विश्व में मांसाहारी थे और तंबाकू पीते थे। उनके गुरु स्वामी परमहंस ने एक बार नरेंद्र के झूठे तंबाकू को पीकर अस्पृश्यता के पाखंड का पर्दाफ़ाश किया था और अभेद की शिक्षा दी थी।2 स्वामी विवेकानंद के हिमालय भ्रमण पर एक मुसलमान ने उनकी, खीरा खिलाकर प्राण रक्षा की थी और आबू में एक मुसलमान के यहाँ रहे तो उन्होंने खेतड़ी नरेश के प्राइवेट सेक्रेट्री मुंशी जगमोहन से कहा था, ’मैं संन्यासी हूँ। आप लोगों के सारे सामाजिक विधि-निषेधों से परे हूँ। मैं भंगी (मेहतर) के साथ भी भोजन कर सकता हूँ। इससे भगवान के अप्रसन्न होने का भय मुझे नहीं है क्योंकि यह भगवान द्वारा अनुमोदित है। शास्त्रों से भी मुझे भय नहीं है क्योंकि यह शास्त्र द्वारा भी अनुमोदित है फिर भी आप लोगों का और आप लोगों के समाज का भय मुझे अवश्य है, आप लोग तो भगवान और शास्त्र की भी परवाह नहीं करते। मैं तो देखता हूँ कि विश्व प्रपंच में सर्वत्र ब्रह्म प्रकाशित है, मेरी दृष्टि में ऊँच-नीच नहीं है। शिव, शिव।”3 और उन्होंने खेतड़ी राज्य के किसी रेलवे स्टेशन पर एक ’दीन-हीन’ चमार के हाथ का बना हुआ भोजन ग्रहण किया। वे वहाँ 3 दिन तक धर्म-चर्चा करते रहे और किसी ने उनसे भोजन के लिए नहीं पूछा। इस पर इस दीन-हीन चमार ने डरते-डरते उन्हें भोजन कराया। विवेकानंद ने उस भोजन से देवराज इंद्र द्वारा स्वर्ण पात्र में अमृत देने की तृप्ति से भी अधिक का अनुभव किया और आँखों में आँसू आ गए और सोचने लगे कि ऐसे हज़ारों उच्च चेतना संपन्न व्यक्ति पर्ण कुटियों में निवास करते हैं किंतु हमारी नज़रों में वे बराबर घृणित और हीन रहे हैं। कुछ उच्च जाति के लोगों के आपत्ति करने पर विवेकानंद उस चमार की मनुष्यता की प्रशंसा और आपत्ति करने वालों की नीचता की निंदा की।4 स्वामी विवेकानंद इसके बाद भी खंडवा की यात्रा में एक मेहतर के परिवार में कई दिन तक रहे और इस उपेक्षित नीची जाति के लोगों के हृदय की श्रेष्ठता देखकर वे आश्चर्यचकित हो गए। इस प्रकार ऐसी अनेक घटनाओं में स्वामी विवेकानंद की मन और विचारों में देश की उपेक्षित, दलित एवं निर्धन जातियों का पक्षधर बना दिया और पाया कि नीची जातियों के व्यक्तियों में भी ऊँची मनुष्यता विद्यमान है।

स्वामी विवेकानंद एक संन्यासी थे और उन्होंने विश्व के धर्मों का गहन अध्ययन किया था। मैं हिंदू धर्म को संस्थान का सर्वश्रेष्ठ धर्म मानते थे और आध्यात्मिकता को उसका केंद्रीय तत्व देश की वर्ण एवं जाति व्यवस्था के दोषों के लिए उन्होंने धर्म और जाति को सर्वथा निर्दोष पाया। उनका कथन था कि धर्म का संबंध केवल आत्मा से हैं और सामाजिक विषयों में हस्तक्षेप करना उसका प्रयोजन नहीं है।5 इस पर भी इसका दोष हिंदू धर्म के माथे मढ़ते हैं और आलोचकों को सुधार का यही एक उपाय दिखाई देता है कि संसार के इस महत्तम हिंदू धर्म को कुचल दिया जाए परंतु दोष धर्म का नहीं है क्योंकि हिंदू धर्म तो तुम्हें सिखाता है कि प्रत्येक प्राणी स्वयं तुम्हारी आत्मा का ही नाना रूपों में विकास है। दोष यह है कि हमने इस ज्ञान को व्यवहारिक रूप नहीं दिया तथा सहानुभूति एवं हृदय का उपयोग नहीं किया। इस स्थिति को हम धर्म का नाश करके नहीं, वर्णों के अनुसार आचरण करके तथा उसके साथ बौद्ध धर्म की ’अद्भुत सहानुभूति’ को संयुक्त करके ही दूर कर सकते हैं।6  स्वामी विवेकानंद हिंदू धर्म की निर्दोषता एवं सर्वश्रेष्ठता के प्रतिपादन के साथ इसी कारण उसके क्रूर आघातों की भर्त्सना करते हुए कहते हैं, ’पृथ्वी पर ऐसा कोई धर्म नहीं जो हिंदू धर्म के समान इतने ऊँचे स्वर से मानवात्मा की महिमा की घोषणा करता हो’ और पृथ्वी पर ऐसा कोई धर्म नहीं जो हिंदू धर्म के समान गरीबों और नीची जाति वालों का गला इतनी क्रूरता से घोंटता हो। प्रभु ने मुझे दिखा दिया है कि इसमें धर्म का दोष नहीं, वरन दोष उनका है जो हिंदू धर्म के अंतर्भुक्त होते हुए भी ढोंगी और दम्भी हैं जो ’परमार्थिक’ और ’व्यावहारिक’ सिद्धांतों के रूप में अनेक प्रकार के अत्याचार के अस्त्रों का निर्माण करते रहे हैं।7 स्वामी विवेकानंद का वर्ण एवं जाति व्यवस्था के संबंध में विचार है कि ’वर्ण व्यवस्था ने हमें हिंदू राष्ट्र के रूप में जीवित रखा है’।8 ’धर्म में जाति भेद नहीं है’ तथा ’जाति एक सामाजिक संस्था मात्र है’।9 ’भारतीय समाज का आधार जाति नियम हैं’।10 ’आर्य सभ्यता का साधन है विभिन्न वर्ण- विभाग। विभिन्न वर्गों में विभाजित करने का यह तरीका सभ्यता की सीढ़ी है जिसके द्वारा व्यक्ति अपनी अपनी विद्वत्ता और संस्कृति के अनुरूप उच्च से उच्चतर बन सकता है’।11 तथा ’जाति एक सामाजिक नियम एक सामाजिक रूढ़ि है और गुण-कर्म- भेद ही इसका आधार है’।12 इस प्रशंसा के बावजूद स्वामी विवेकानंद जाति व्यवस्था की लाभ हानि की गहराई से परीक्षा करते हैं। वे मानते हैं कि इस व्यवस्था से समाज वर्गों में बँटकर भी एक जाति के सभी सदस्य एकता के सूत्र में बँधते हैं, व्यक्तिगत या सामाजिक प्रधानता के लिए संघर्ष नहीं होता और व्यवसाय वंशानुगत हो जाता है, परंतु इसकी बड़ी हानि यह है कि प्रतियोगिता नष्ट हो जाती है जिसके कारण देश की राजनीतिक अवनति हुई और विदेशी जातियों से पराभूत होना पड़ा।13 वे मानते हैं कि यह ’ईश्वर प्रदत्त एक सबसे महान सामाजिक संस्था’ है, किंतु विदेशियों के अत्याचार तथा घोर अज्ञानी एवं अभिमानी ब्राह्मणों के कारण इसमें अनेक दोष-बाधाएँ आईं, परंतु यह संस्था अतीत के साथ भविष्य में भी अपने उद्देश्य में सफल होगी’।14 स्वामी विवेकानंद ने ब्राह्मण, पुरोहित तथा पुरोहिती पर नवीन दृष्टि से विचार किया और इनके गुण अवगुणों एवं उपयुक्तता-अनुपयुक्तता पर गंभीर आलोचनात्मक टिप्पणी करके नए युग के चिंतन को उद्घाटित किया। स्वामी विवेकानंद का मत है कि आरंभ में सब ब्राह्मण थे और आर्यों में सर्वोच्च जाति ब्राह्मण थी। ये ब्राह्मण धार्मिक, नीतिवान, सदाचारी, सज्जन, उदार, नि:स्वार्थी, ज्ञान एवं प्रेम प्रसूत शक्ति के संपादक-प्रचारक तथा भगवान के भक्त होते थे।15 ऐसे ’आध्यात्मिक साधना संपन्न महत्यागी ब्राह्मण ही हमारे आदर्श हैं’।16 क्योंकि वे ’ईश्वर के अंतरंग स्वरूप’17 एवं ’मनुष्यत्व के चरम आदर्श’ हैं।18 विवेकानंद इसी ’ब्रह्मज्ञ पुरुष’ तथा इसी ’आदर्श और सिद्ध पुरुष’ की रक्षा करना चाहते हैं और कहते हैं कि इसका लोप कदापि नहीं होना चाहिए’।19 विवेकानंद कहते हैं सच्चा ब्राह्मणत्वसद्गुणों का खजाना है और ब्राह्मण को इन सद्गुणों को संसार को बाँटना चाहिए। ब्राह्मणों ने जीवन के उच्चतर उद्देश्यों तथा संस्कृति के महत् तत्वों का खजाना जब से जनसाधारण के लिए बंद कर दिया तभी भारत गुलाम हुआ और अवनति हुई।20 विवेकानंद सबसे पहले ब्राह्मणों के धर्म पर एकाधिकार तथा उनके विशेषाधिकारों पर गहरी चोट करते हैं। यद्यपि यह मानते हैं कि ब्राह्मणों ने ही पहले भारत की सब जातियों में धर्म का प्रचार किया और सबसे पहले त्याग के भाग का उन्मेष किया तथा जीवन के सर्वोच्च सत्य के लिए सब कुछ छोड़ा।यह ब्राह्मणों का दोष नहीं था कि वे उन्नति के मार्ग पर अन्य जातियों से आगे बढ़े।21 परंतु उनका दोष यह है कि उन्होंने संचित ज्ञान और संस्कार पर एकाधिकार करके अन्य जातियों को उससे वंचित कर दिया। यह अवसर, अग्रसरता एवं सुविधाओं का आसुरी दृष्टि से किया गया दुरुपयोग है। विवेकानंद कहते हैं कि ब्राह्मणों ने धर्म शास्त्रों पर एकाधिकार जमा कर विधि-निषेधों को अपने हाथ में ही रखा थाऔर भारत की दूसरी जातियों को नीच कहकर उनके मन में विश्वास जमा दिया था कि वे वास्तव में नीच है। यदि किसी व्यक्ति को सोते, खाते, उठते, बैठते हर समय कोई कहता रहे कि ’तू नीच है’, ’तू नीच है’ तो कुछ समय के पश्चात उसकी यही धारणा हो जाती है कि मैं वास्तव में नीच हूँ।22 विवेकानंद एकाधिकार को समूल नष्ट करने के लिए ही ब्राह्मणों का आह्वान करते हैं और उनका उद्बोधन करने के साथ में चेतावनी भी देते हैं| वह कहते हैं कि ब्राह्मणों ने धर्म पर एकाधिकार कर रखा है पर वे अब काल-प्रवाह के विरुद्ध अपना एकाधिपत्य नहीं रख सकते। अतः प्रयत्न करो, सबको वह धर्म प्राप्त हो जाए और अब्राह्मणों के मन में यह बैठा दो कि ब्राह्मणों के समान उनका भी धर्म पर वही अधिकार है। सभी को, चांडाल तक को भी जाज्वल्यमान मंत्रों का उपदेश करो और अग्नि मंत्र में दीक्षित करो। यदि तुम (ब्राह्मण) ऐसा नहीं कर सकते तो धिक्कार है तुम्हारी शिक्षा और संस्कृति को, धिक्कार है तुम्हारे वेदों और वेदांत के अध्ययन को।23

स्वामी विवेकानंद मानते हैं कि ब्राह्मणों की प्रभुता की शक्ति उनके महान बौद्धिक एवं मानसिक तथा आध्यात्मिक उन्नति पर आधारित है लेकिन इन प्रवृत्तियों के नष्ट होने से वे अपने लिए प्रभुता और अधिकार बटोरने में लग गए। ब्राह्मण इतने शक्तिशाली हो गए कि किसी का वध करने पर भी उन्हें दंडित नहीं किया जा सकता था। ब्राह्मण जन्म से ही विश्व का स्वामी है तथा दुष्ट से दुष्ट ब्राह्मण की भी पूजा होनी चाहिए। ब्राह्मण ने ’महान त्याग रूपी महँगा मूल्य’ देकर जिस प्रभुत्व शक्ति को प्राप्त किया, उसे वह दूसरों को देने के लिए तैयार नहीं। ब्राह्मण ने अपने मानसिक ज्ञान को गुप्त रखा और उससे अन्य को वंचित किया तथा अपने पूर्वजों के गौरव, अधिकार, सम्मान, सत्ता एवं एकाधिकार को बचाए रखा जिससे अन्य जातियों के साथ उसका घोर संघर्ष हुआ।24 ब्राह्मण का यह एकाधिकर अनुवांशिक परंपरागत शक्ति केंद्र बन गया और ब्राह्मण ’अधिकार लिप्सा’ एवं ’व्याघ्रवततृष्णा’ के केंद्र बन गए।25 विवेकानंद इसी प्रकार ब्राह्मण के विशेषाधिकार का भंजन करते हैं क्योंकि वे इसे वेदांत, समानता एवं स्वतंत्रता के सिद्धांत के विपरीत पाते हैं। वे लिखते हैं वेदांती होना और साथ ही किसी के लिए किसी प्रकार का भौतिक, मानसिक या आध्यात्मिक विशेषाधिकार स्वीकार करना असंभव है। वेदांत में किसी के लिए किसी भी प्रकार के विशेषाधिकार का स्थान नहीं है। मनुष्य में एक ही शक्ति है किसी में अधिक प्रकट हुई, किसी में कम; वही सामर्थ्य सब में है। अत: वेदांत के अनुसार जन्म के बीच उच्च-नीच भेद का कोई अर्थ नहीं।26 अन्यत्र लिखते हैं कि मेरा अनुभव यही रहा है कि सभी दोषों की उत्पत्ति, जैसा कि हमारे शास्त्र कहते हैं, भेदभाव में विश्वास रखने के कारण होती है; और समानता में, सर्व भूतों के अंतःस्थित एकत्व में विश्वास करने से सर्व हितों की प्राप्ति होती है। यही महान वेदांतिक आदर्श है।27 स्वामी विवेकानंद विभिन्नता के प्राकृतिक सत्य को स्वीकार करते हैं लेकिन वे कहते हैं कि सारा विश्व विभिन्नता में एकता का खेल है। यह सत्य है कि विभिन्न भेद विद्यमान है और जब तक जीवन है विभिन्नता रहेगी किन-किन देशों में ही और उनके भीतर से ही एकता का अनुभव करना होगा। वे मानते हैं जीवन में कभी एक समानता नहीं आ सकती, किसी विशेष जाति के विशेषाधिकारों को दूर किया जा सकता है। सारे संसार में इसी का संघर्ष चल रहा है। मनुष्य का एक दल यदि अधिक बुद्धिमान है तो क्या इसके कारण दूसरे कम बुद्धि वालों से उनके भौतिक सुखोपभोग का भी अपहरण कर लिया जाए? इसी प्रकार कुछ मनुष्य अपनी विशिष्ट योग्यता द्वारा दूसरों की अपेक्षा अधिक धन एकत्र कर लें तो क्या यह उचित है कि वे इस शक्ति से अत्याचार करें तथा कम धन अर्जित करने वालों को भी तरह रौंद दें? विवेकानंद पर निष्कर्ष में कहते हैं कि दूसरों को दबाकर लाभ उठाना यही विशेषाधिकार कहाता है और इसी विशेषाधिकार को नष्ट करना नैतिकता का सदा उद्देश्य रहा है। यही एक कार्य है जो विभिन्नता का नाश किए बिना हमें समानता और एकता की ओर ले जाएगा।28 वे चाहते हैं कि इन विशेष अधिकारों की कब्र स्वयं ब्राह्मण ही खोदें और यह जितनी जल्दी होगा उतना ही बेहतर होगा क्योंकि जितनी देर होगी उतना ही वह करेगा और उतनी ही बुरी मौत मरेगा।29

ब्राह्मण के विशेषाधिकार एवं प्रभुता तथा शिष्टता के अहंकार के कारण ही हिंदू धर्म में अस्पृश्यता एवं छुआछूत का भयंकर रोग उत्पन्न हुआ। विवेकानंद का मत था कि सनातनी हिंदू समाज का एक ’अंधविश्वास’30 तथा ’कुसंस्कार’31 है और हम अपने आप को ’मत छुओ वाद” में सम्मिलित नहीं करना चाहते। यह हिंदू धर्म नहीं है तथा वह हमारे किसी ग्रंथ में नहीं है और इससे हमारी राष्ट्र राष्ट्रीय क्षमता एवं योग्यता को बड़ी हानि पहुँची है। वे इसके लिए ब्राह्मणों की आलोचना करते हुए कहते हैं, ’यह हजारों ब्राह्मण भारतवर्ष के नीच, पद दलित जनसाधारण के लिए क्या कर रहे हैं? उनके होठों पर केवल ’छुओ मत’ वाक्य खेल रहा है। हमारा सनातन धर्म उनके हाथों कितना नीच और पतित बन गया है, हमारा धर्म अब कहाँ है? केवल ’मत छुओवाद’ में, अन्यत्र कहीं नहीं।’32 हिंदुओं का वर्तमान धर्म, वेद, पुराण, भक्ति और मुक्ति में ना होकर केवल रसोई के बर्तनों में घुसा हुआ है और ज्ञान- मार्ग एवं बुद्धि-मार्ग सब ’मत छुओवाद’ में बदल गया है। जो धर्म दूसरों के केवल श्वास तथा स्पर्श से ही अपवित्र हो जाए, वह दूसरों को पवित्र कैसे बनाएगा? अतः विवेकानंद छुआछूत पंथियों के मुँह पर झाड़ू मारने का आह्वान करते हुए कहते हैं, ’देश में केवल छुआछूत पंथियों का दल रह गया है। ऐसे आचार के मुँह पर ”मार झाड़ू, मार लात"। इच्छा होती है– तेरे छुआछूत के पंथ की सीमा तोड़कर अभी चला जाऊँ– जहाँ कहीं भी पतित, गरीब, हीन, दरिद्र हों, ‘आ जाओ’ यह कह-कह कर, उन सभी को श्री रामकृष्ण के नाम पर बुला लाऊँ, इन लोगों के बिना उठे माँ नहीं जागेगी। मैं दिव्य दृष्टि से देख रहा हूँ, उनके और मेरे भीतर एक ही ब्रह्म, एक ही शक्ति विद्यमान है, केवल विकास की न्यूनाधिकता है।’33 विवेकानंद कहते हैं प्रत्येक हिंदू दूसरे हिंदू का भाई है, वह चाहे मोची, मेहतर, मूर्ख, निर्धन, अपढ़ या निम्न जाति का कोई भी भारतवासी हो, वे सब तुम्हारे भाई हैं लेकिन ’छुओ मत’ की पुकार ने इन सब को नीचे गिरा दिया है और इस प्रकार सारा देश ही नीचता, कायरता तथा अज्ञान के गहरे गर्त में बिल्कुल डूब गया है।34

विवेकानंद ने ’पुरोहित’ और ’पुरोहिती’ की तीव्र भर्त्सना की है। वे पुरोहित को ’पाखंडी’, ’बदमाश’, ’कलयुगी राक्षस’, ’निर्दय’ और ’हृदय हीन’, ’छली’, ’अधिकार लिप्सु’ आदि शब्दों से पारिभाषित करते हैं।35 उन्होंने ’मानवता के आदर्श के रूप में ’ब्राह्मणत्व’ को स्वीकार किया है परंतु वह ब्राह्मणों की पुरोहिती को ’आनुवांशिक परंपरागत व्यवसाय’, ’भेदभाव पूर्ण असमानता’ के जनक तथा ’भयानक अधिकार लिप्सा एवं व्याघ्रवत तृष्णा के केंद्र मानते हैं’।36 पुरोहित का आदर्श रूप वह था जब वह देवताओं से संबंध स्थापित करता था और देवताओं के समान उसकी पूजा होती थी। वह अपने आध्यात्मिक शक्ति, ज्ञान, विद्या, प्रेम और त्याग-वैराग्य से सार्वजनिक वित्त एवं कल्याण की अपनी प्रवृत्ति को बढ़ाता था और उसे अपने जीवनशोणित से उसके अंकुर को सींचता था लेकिन अपनी प्रभुत्व शक्ति, विशेषाधिकार, अज्ञान, अकर्मण्यता, छल और पाखंड के कारण पुरोहित मकड़ी के समान अपने ही फैलाए हुए जाल में फँस गए हैं। उन्होंने जिस श्रंखला से दूसरे के पैरों को बाँधा था अब वह उन्हीं के पैरों को सहस्त्रगुना जकड़ रही है और उनकी गति का सैकड़ों प्रकार से विरोध कर रही है। उस जाल को, श्रंखला को तोड़-फोड़ दो, तब तो पुरोहित की पुरोहिती जड़ तक हिल जाएगी।37 विवेकानंद ने स्पष्ट कहा कि पुरोहिती छल भारतवर्ष के लिए अभिशाप स्वरूप है। इस पुरोहिती छल को पुराने धर्म से उखाड़ फेंको तो तुम्हें इससे संसार का सर्वोत्तम धर्म प्राप्त हो जाएगा।38 अतः विवेकानंद पुरोहित एवं पुरोहिती छल को जड़ से उखाड़ फेंकने का आह्वान करते हुए कहते हैं ’उन्नति के सदा विरोधी पुरोहितों को धक्का देकर दूर हटा दो क्योंकि वे कभी सुधरेंगे नहीं। उनके हृदय कभी उदार नहीं होंगे। वे तो शताब्दियों के कुसंस्कार और अत्याचार से उत्पन्न हुए हैं। पहले पुरोहित छल को जड़ से उखाड़ फेंको। आओ मनुष्य बनो’।39

स्वामी विवेकानंद ने उच्च वर्ग तथा आभिजात्य वर्ग एवं कुलीन वर्ग में ब्राह्मण क्षत्रिय एवं वैश्य जातियों को सम्मिलित किया है और निम्न वर्ग में सभी शूद्र जातियों, निर्धन एवं अशिक्षितों तथा ग्रामीणों की गणना की है। विवेकानंद ने भारत की जनता को दो भागों में बाँट कर देखा है– एक तो यही अभिजात्य अथवा कुलीन वर्ग और दूसरा किसान श्रमिक, मेहतर, माली, मोची आदि का शेष निम्न वर्ग। इसलिए वे कहते हैं कि आदर्श के एक छोर पर तो ब्राह्मण है और दूसरे छोर पर चांडाल और संपूर्ण कार्य यही है कि इसके चांडाल को उच्च वर्ग के ब्राह्मण तक ऊँचा उठा दिया जाए।40 विवेकानंद इस कुलीन वर्ग के इतिहास का अवलोकन करते हैं और पाते हैं कि उच्च वर्ग के ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य सभी निम्न वर्ग के प्रति घोर अपराधी हैं और वे ’दस हज़ार वर्षों पीछे के ‘मम्मी’ अर्थात मृत शरीर तथा ’सचल शमशान’ के समान हैं।41 वे इस उच्च वर्ग को अनेक रूपों में स्पष्ट करते हुए कहते हैं, ’हे भारत के उच्च वर्ग वालो, तुम तो माया के इस संसार में मानो इंद्रजाल हो, रहस्य हो, मरु-मरीचिका हो। तुम तो भविष्य के शून्याकार, सारहीन, अस्तित्व रहित पदार्थ हो। स्वप्न राज्य के नागरिक! तुम लोग और अधिक समय तक क्यों भटक रहे हो? तुम भूतकालीन भारत के मृत शरीर के मांसहीन, रक्तहीन, अस्थि कंकाल जैसे हो– तुम शीघ्र ही अपने को मिट्टी में मिला कर हवा में अदृश्य क्यों नहीं हो जाते?42 विवेकानंद मानते हैं कि उच्च वर्ण के लोग सजीव नहीं है, अतः वे उनके आर्यों की संतान होने के अहंकार तथा प्राचीन भारत के गौरव का अभिमान करने को निरर्थक एवं निष्प्राण मानते हैं। उच्च वर्ण के लोगों का क्या यही काम है कि वे निम्न जाति के लोगों की मनुष्यता नष्ट कर दें, उन्हें भिखारी बना दें, उन्हें ईसाई बनने पर विवश करें, उन्हें सदैव के लिए दास अथवा हिंस्र पशु बना दें तथा उनमें मनुष्य होने का भाव ही खत्म कर दें।43 वे उच्च वर्ण के ऐसे शिक्षित लोगों को ’घृणा के पात्र’ कहते हैं जो निर्धनों एवं दलितों के खर्च पर शिक्षित हैं अथवा गरीबों को कुचलकर धनी बने हैं और फिर भी देश के बीस करोड़ निवासियों को भूखा और असभ्य बना रहने देते हैं।44 इसलिए वे चाहते हैं कि देश का अभिजात वर्ग खुद ही अपनी कब्र अति शीघ्र खोदे अन्यथा देरी होने पर वह सड़ेगी और मृत्यु भी उतनी भयंकर होगी। विवेकानंद बड़े स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि उच्च घराने में जन्म लेने और विशेष अधिकार रखने वाले प्रत्येक जाति के लोग अपने ही हाथों अपनी चिता तैयार करना अपना प्रमुख कर्तव्य बना लें, यही अच्छा और उपयुक्त है।45 इसका कारण यह है कि उच्च वर्ण के नाश के बिना नव भारत की रचना नहीं हो सकती, क्योंकि नए भारत का उदय तो किसान, मछुआ, मोची, मेहतर, छोटे व्यापारी श्रमिक आदि के हाथों से ही होगा। वे उच्च वर्ण के लोगों से इसी कारण कहते हैं, ’अपने को शून्य में लीन करके अदृश्य हो जाओ और अपने स्थान में ’नवभारत’ का उदय होने दो। उसका उदय हल चलाने वाले किसानों की कुटिया से, मछुए, मोचियों और मेहतरों की झोपड़ियों से हो। बनिए की दुकान से, रोटी बेचने वाले की भट्टी के पास से वह हो। कारखानों, हाटों और बाजारों से वह निकले। वह नवभारत अमराइयों और जंगलों से, पहाड़ों और पर्वतों से प्रकट हो। यह साधारण लोग सहस्त्र वर्षों से अत्याचार सहते आए हैं और आश्चर्यजनक धैर्य शक्ति प्राप्त कर ली है। वे सतत विपत्ति सहते रहे हैं, जिससे उन्हें अविरल जीवन शक्ति प्राप्त हो गई है। मुट्ठी भर अन्न से पेट भर कर वे संसार को कँपा सकते हैं; उनको तुम केवल आधी रोटी दे दो, और देखोगे कि सारे संसार का विस्तार उनकी शक्ति के समावेश के लिए पर्याप्त ना होगा। उनमें रक्तबीज की अक्षय जीवन-शक्ति भरी है। इसके अतिरिक्त उनमें पवित्र और नीति युक्त जीवन से आने वाला वह आश्चर्यजनक बल है जो संसार में अन्यत्र नहीं मिलता। ऐसी शक्ति, ऐसा संतोष, ऐसा प्रेम और चुपचाप सतत कार्य करने की ऐसी शक्ति और कार्य के समय इस प्रकार सिंह-बल प्रकट करना यह सब तुम्हें अन्यत्र कहाँ मिलेगा?’46

स्वामी विवेकानंद इसी कारण भविष्यवाणी करते हैं कि शूद्रों का समय आ गया है और अब शूद्रों का राज्य होगा। मानव समाज पर पुरोहित, योद्धा और व्यापारी शासन कर चुके हैं, अब शूद्र तथा निम्न वर्ग के लोग राज्य करेंगे। उन्हें अब कोई रोक नहीं सकता। जमाना बदल गया है। निम्न जातियाँ जागृत हो रही हैं और अपना यथोचित स्वत्व बलात ग्रहण करने के लिए सामूहिक प्रयास कर रहीं हैं। अब उच्च जाति वाले नीच जाति वालों को और अधिक समय तक दबा नहीं सकते, अतः उनका कल्याण इसी में है कि निम्न जातियों की इस कार्य में सहायता करें।47 वे कहते हैं कि ’गरीब, निरक्षर, मूर्ख और दुखी’ ईश्वर के रूप हैं, ’दरिद्र’ तो ’नारायण’ हैं।48 तथा उनकी झोपड़ियों में ही राष्ट्र बसता है49 यही उच्च वर्ण के लोगों के उत्तराधिकारी हैं और यही भावी भारतवर्ष है। उच्च वर्ण के अदृश्य होते ही तत्काल पुनर्जात भारतवर्ष करोड़ों गर्जनाओं के साथ यह उद्घोष करेगा ”वाहे गुरु की फ़तह’।50 विवेकानंद इस विजय घोष के मूल में उच्च वर्ण के लोगों के वे अत्याचार देखते हैं जो हजारों वर्षों से होते रहे हैं। वे कहते हैं कि हमारे देश में नीच जाति में जन्म लेने का अर्थ है कि वह मानो सदा के लिए नष्ट हो गया। यह कैसा अत्याचार है?51 देश के गरीबों का कोई विचार नहीं करता। वे ही तो देश के मेरुदंड हैं जो अपने परिश्रम से अन्न उत्पन्न करते हैं। ये मेहतर और मजदूर, यदि ये लोग एक दिन काम बंद कर दें तो शहर भर में घबराहट फैल जाए पर उनके साथ सहानुभूति रखने वाला कौन है? इस देश में दस-बीस लाख साधु और दस एक करोड़ ब्राह्मण इन गरीबों का रक्त चूसते हैं पर उनके सुधार का रत्ती भर भी प्रयास नहीं करते, वह कोई देश है या नरक? वह धर्म है या शैतान का नग्न नृत्य?52 वास्तव में देश के नीच, अज्ञानी, दरिद्र, चमार और मेहतर सभी उच्चवर्णीय समाज के भाई हैं और सभी का रक्त एक ही है। अतः ब्राह्मण तथा अन्य उच्च वर्ण का यह दायित्व है कि वे दूसरी जातियों के उद्धार की चेष्टा करें।53 प्रत्येक मनुष्य को ब्राह्मण बनाया जाए54 ऊँची श्रेणी को नीचे खींचने के स्थान पर नीची श्रेणी वालों को ऊपर उठाया जाए55 निर्धनों-अशिक्षितों को भोजन एवं शिक्षा दी जाए।56 पद दलितों को सहानुभूति दे’ और उनका दुख दूर किया जाए57 निम्न जाति को धर्म-दान विद्या-दान एवं ज्ञान-दान देकर उन्हें जागृत किया जाए58 देश काल के उपयुक्त एक नवीन स्मृति की रचना करनी होगी59 पुरोहिती के छल, प्रपंच, पाखंड को जड़ मूल से उखाड़ फेंकना होगा60 नीच जाति का धर्मांतरण रोकना होगा61 उनके खोए मनुष्यत्व को जागृत करना होगा62 तथा हम सभी को ’मनुष्य’ बनना होगा। हमें ऐसे धर्म सिद्धांत तथा शिक्षा की आवश्यकता है जो हमें मनुष्य बना सकें। हमें जो भी शारीरिक मानसिक और आध्यात्मिक दृष्टि से दुर्बल बनाये वह विष के समान त्याज्य है। मनुष्य केवल मनुष्य भर चाहिए। शेष सब कुछ अपने आप हो जाएगा।63

स्वामी विवेकानंद का विश्वास है कि ब्राह्मण और पुरोहित निर्दय, हृदयहीन, कुसंस्कारी, अत्याचारी, अहंकारी तथा उन्नति विरोधी हैं और वे कभी नहीं सुधरेंगे। उनकी प्रबल आकांक्षा थी कि बड़ी जातियों और छोटी जातियों में भाईचारे की भावनाका विकास हो, पारस्परिक सहानुभूति और प्रेम हो तथा उच्च जाति के लोग गाँव में जाकर वहाँ घुल-मिल जाए, क्योंकि देश के दारिद्रय और अज्ञता को देखकर उन्हें नींद नहीं आती थी। विवेकानंद को ब्राह्मणों ने इन विचारों और कार्यों के कारण ’शूद्र’ कहा तो वे इससे दुखी नहीं हुए और इसमें उन्होंने गरीबों पर अपने पूर्वजों द्वारा किए अत्याचारों का प्रतिकार माना।64 उन्हें निम्न जातियों की शक्ति और क्षमता पर विश्वास था। वे इस साधारण जनता को ’जागृत देवत्व’ कहते थे और इस विराट जनसमूह की पूजा करने का उद्बोधन करते थे।65 विवेकानंद एक प्रकार से इन निर्बलों को सबलों से अधिक अवसर देने के पक्ष में हैं जो आज की आरक्षण नीति से भी आगे बढ़ा हुआ कदम है। वे स्पष्ट कहते हैं कि सबल ब्राह्मण को शिक्षा की इतनी आवश्यकता नहीं है जितनी निर्बल चांडाल के लड़के को। यदि ब्राह्मण के लड़के को एक शिक्षक चाहिए तो चांडाल के लड़के को दस, क्योंकि अधिकतम सहायता उसे मिलनी चाहिए जिसे प्रकृति ने जन्म से कुशाग्र बुद्धि नहीं दी है। कोई पागल ही होगा जो उल्टे बाँस बरेली को ले जाए। यदि ब्राह्मण की शिक्षा की योग्यता अनुवांशिकता के कारण एक परिया से अधिक है तो ब्राह्मण की शिक्षा के लिए व्यय करना बिल्कुल बंद कर दो; सारा खर्च परिया की शिक्षा के लिए लगाओ। दान दुर्बल को दो क्योंकि सारे दान की आवश्यकता वहाँ है। यदि ब्राह्मण जन्म से बुद्धिमान है तो वह बिना सहायता के शिक्षित बन सकता है और यदि दूसरे लोग जन्म से बुद्धिमान नहीं है तो सारी शिक्षा और सभी शिक्षक, जितना उनको आवश्यक हो, उन्हीं के लिए रहे। यदि इसके बाद कुछ शेष रहा तो शिक्षित-सभ्य लोगों के लिए किया जाना चाहिए।66 विवेकानंद शूद्र समाज को एक दृष्टि से सावधान भी करते हैं। वे कहते हैं कि शूद्र जाति के असाधारण बुद्धि और योग्यता वाले मनुष्यों को उच्च वर्ग वाले उन्हें पदवियों से सम्मानित करके अपने वर्ग में उठा लेते हैं और इस प्रकार शूद्र समाज उनकी बुद्धि और गुणों से वंचित हो जाता है। प्राचीन काल में वशिष्ठ, नारद, सत्यकाम, जाबाल, व्यास, कृप, द्रोण, कर्ण, आदि विद्वान एवं पराक्रमी होने के कारण ब्राह्मण या क्षत्रिय पद पर प्रतिष्ठित कर दिए गए पर इससे वेश्या, दासी, ढीमर, या सूत जाति को क्या लाभ हुआ? इसके विपरीत यह भी होता था कि उच्च वर्ग के पतित मनुष्य सदैव शूद्रों के पद पर नीचे उतार दिए जाते थे। इस कारण वे चाहते हैं कि शूद्र जाति की संपत्ति, विद्या या बुद्धि की शक्ति का उपयोग उसी समाज की भलाई के लिए ही होना चाहिए।67

इस प्रकार स्वामी विवेकानंद बीसवीं शताब्दी के आरंभ में ही देश के नए युग की नई दलित चेतना को रूप देते हैं और उस कालखंड में दलितों के सबसे बड़े मसीहा बनकर सामने आते हैं। विवेकानंद हिंदू धर्म के आध्यात्मिक धर्म प्रचारक थे परंतु उनके पास भारत का एक आधुनिक बिंब भी था। वे वर्ण-व्यवस्था के समर्थक थे तथा जाति-व्यवस्था को एक श्रेष्ठ व्यवस्था मानते थे परंतु जाति-भेद, जाति-श्रेष्ठता, अस्पृश्यता आदि के लिए धर्म को नहीं, ब्राह्मणों और पुरोहितों को दोषी मानते थे। वे ब्राह्मणत्व को मानवता का आदर्श मानते हैं परंतु ब्राह्मणों के अहंकार, प्रभुत्व तथा अत्याचारों की भर्त्सना करते हैं। वे तो यहाँ तक कहते हैं कि उच्च वर्ग के लोगों को इस देश से अदृश्य हो जाना चाहिए। यह बड़े साहस की बात थी जो एक संन्यासी ही कह सकता है। उनका दृढ़ विश्वास था कि निम्न वर्ग के मनुष्य उच्च वर्ग के लोगों से मनुष्यता, कर्मशीलता तथा सहनशीलता में श्रेष्ठ हैं, यद्यपि इन्हें शिक्षा से सुसंस्कृत और मनुष्य बनाने की आवश्यकता है। वे दरिद्र, निर्बल और अशिक्षित को नारायण मानते थे और इस विराट जनसमूह को नव भारत का जनक मानते थे। उनका विश्वास था कि आने वाला युग दलितों, निर्बलों तथा शूद्रों का है तथा उनका राज्य स्थापित होगा। शूद्र जागृत होंगे और उन्हें राज्य करने से कोई रोक नहीं पायेगा। वे शूद्रों को शिक्षा आदि क्षेत्रों में आरक्षण के भी पक्ष में थे और उनका तर्क था कि दुर्बल को सबल की अपेक्षा अधिक अवसर मिलने चाहिए। यह आधुनिक भारत का दलित दर्शन था जो एक संन्यासी ने दिया था। विवेकानंद ने जिस स्पष्टता, निर्ममता एवं वैज्ञानिकता के साथ दलित उत्थान का विचार-पक्ष प्रस्तुत किया वैसा बाद के दलित-सुधारक नहीं दे पाए। गाँधी हिंदू धर्म के अंग-भंग के बिना हृदय परिवर्तन से दलित उद्धार चाहते थे और मंदिर-प्रवेश उनके लिए बड़ा मुद्दा था जबकि डॉ. अंबेडकर दलितों की हिंदू समाज से अलग एक स्वतंत्र सत्ता चाहते थे और जाति व्यवस्था का समूल उन्मूलन आवश्यक मानते थे। विवेकानंद शूद्र जातियों को समाप्त करके सबको ब्राह्मण बनाना चाहते थे68 वे नीची जातियों को ऊँची जाति तक पहुँचाना चाहते थे। उन्होंने अनेक बार देशवासियों से कहा कि शूद्र एवं निम्न श्रेणी के लोग अवश्य ही जागृत होंगे और वे तुम्हारे अत्याचारों को समझकर तुम्हें अपनी फूँक से ही उड़ा देंगे, अतः तुम्हें इन लोगों को विद्या-दान तथा ज्ञान-दान देकर जागृत करना चाहिए जिससे यह तुम्हारे प्रति कृतज्ञ बनें।69 स्वामी विवेकानंद ने इस प्रकार अपने युगानुकूल दलित-दर्शन से एक नई स्मृति की रचना की, जिसमें गाँधी, प्रेमचंद, अंबेडकर आदि को ही प्रभावित नहीं किया बल्कि नए भारत की दलित-चेतना की बुनियाद भी रख दी और वे आधुनिक दलित विमर्श के प्रथम मसीहा बन गए।

संदर्भ

1. युग नायक विवेकानंद,स्वामी गंभीरानन्द, खंड 1, पृष्ठ 38
2.वही, पृष्ठ 142
3. वही, पृष्ठ 273 से 74
4. वही, पृष्ठ 281-82
5. विवेकानंद रचनावली-खंड 2, पृष्ठ 328
6. युग नायक विवेकानंद-खंड 2, पृष्ठ 6-7
7. वही, पृष्ठ -7
8. युग नायक विवेकानंद-खंड 2, पृष्ठ 106 -107
9. विवेकानंद रचनावली-खंड 1 पृष्ठ 24
10. वही, पृष्ठ 314
11. जाति, संस्कृति और समाजवाद-स्वामी विवेकानंद, रामकृष्ण मठ, नागपुर, संस्करण 2002, पृष्ठ 4
12. वही, पृष्ठ 33-34
13. विवेकानंद रचनावली-खंड 1, पृष्ठ 274
14. जाति, संस्कृति और समाजवाद, पृष्ठ 71
15 वही, पृष्ठ 5, 20
16. भारत और उसकी समस्याएँ, पृष्ठ 62
17. वही, पृष्ठ 62
18. वही, पृष्ठ 67
19. वही, पृष्ठ 67
20. जाति, संस्कृति और समाजवाद, पृष्ठ 70- 71
21. भारत और उसकी समस्याएँ, पृष्ठ 69-70
22. विवेकानंद रचनावली-खंड -6, पृष्ठ 147
23. वही, पृष्ठ 129 तथा जाति, संस्कृति और समाजवाद पृष्ठ 72-73
24. जाति, संस्कृति और समाजवाद,पृष्ठ 37 से 40
25. वही, पृष्ठ 37
26. वही, पृष्ठ 46
27. वही, पृष्ठ 24
28. वही, पृष्ठ 48-49
29.वही, पृष्ठ 50
30. विवेकानंद रचनावली-खंड 4 पृष्ठ 264
31.जाति, संस्कृति और समाजवाद,पृष्ठ 60
32.वही, पृष्ठ 64 -65
33. विवेकानंद रचनावली-खंड 6, पृष्ठ 215 तथा जाति, संस्कृति और समाजवाद, पृष्ठ 61
34. जाति, संस्कृति और समाजवाद, पृष्ठ21
35. विवेकानंद रचनावली-खंड 1, पृष्ठ 389 तथा जाति, संस्कृति और समाजवाद, पृष्ठ 45
36.जाति,संस्कृति और समाजवाद, पृष्ठ 37-38
37. वही, पृष्ठ 40 -41
38. वही, पृष्ठ 22 तथा 42
39. वही, पृष्ठ43
40. वही, पृष्ठ 9
41. विवेकानंदरचनावली-खंड 8, पृष्ठ 168
42. जाति, संस्कृति और समाजवाद, पृष्ठ 86
43. वही, पृष्ठ 44, 79 एवं 84
44. विवेकानंद रचनावली-खंड 3, पृष्ठ 346
45. जाति, संस्कृति और समाजवाद, पृष्ठ 42
46. वही. पृष्ठ 86-87तथा विवेकानंद रचनावली-खंड- 8, पृष्ठ168
47. वही, पृष्ठ 80-83
48. विवेकानंद रचनावली-खंड 6, पृष्ठ 130
49. जाति-संस्कृति और समाजवाद, पृष्ठ 82
50. वही, पृष्ठ 87
51. वही, पृष्ठ 64
52. वही, पृष्ठ 43
53. विवेकानंद रचनावली-खंड5, पृष्ठ 189-90
54. वही, खंड 4, पृष्ठ 253
55 जाति, संस्कृति और समाजवाद, पृष्ठ 9
56. विवेकानंद रचनावली-खंड 3, पृष्ठ 346
57. वही, खंड 2, पृष्ठ 322 व 337
58. वही खंड 6, पृष्ठ 108
59.युगनायक विवेकानंद-खंड 3, पृष्ठ 182
60. वही, खंड 1, पृष्ठ 371
61. वही, खंड 1, पृष्ठ302- 303
62. वही, खंड 1, पृष्ठ 371
63. विवेकानंदरचनावली, खंड 5 118- 120
64. जाति, संस्कृति और समाजवाद, पृष्ठ 36
65.युग नायक विवेकानंद-खंड 2, पृष्ठ 326- 327
66 जाति, संस्कृति और समाजवाद,पृष्ठ 73 से 75
67. वही, पृष्ठ 79- 80
68. वही, पृष्ठ 19
69. विवेकानंद रचनावली-खंड 6,पृष्ठ 108
 

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