विशेषांक: दलित साहित्य

10 Sep, 2020

अमित जी को ग्रामीण अंचल के उस विद्यालय में स्थानांतरित हुए एक सप्ताह ही हुआ था। मध्यांतर में सभी शिक्षक "स्टाफ़ रूम"एकत्रित होकर चाय पिया करते थे। आज जब सभी शिक्षक आ गए तो अमित जी बोले, "मैं बहुत दिनों से देख रहा हूँ की अंतर सिंह जी का कप हम सबसे अलग रहता है... मुझे यह उचित नहीं लगता।"

यह सुनकर कुछ शिक्षक उनसे बहस करने लगे। बात को गंभीर होता देख कर अंतर सिंह जी बोले, "अमित जी! आप मेरा पक्ष कहाँ कहाँ लेंगे? मैं शिक्षक हूँ, लेकिन कुएँ पर मुझे दूर से पानी दिया जाता है! आप ही बताइए, मैं आप लोगों के समान ऊँचे कुल में नहीं जन्मा, तो इसमें मेरा क्या दोष है..??" उनकी आवाज़ भारी हो गई।

इतने में भृत्य चाय की केतली लेकर आ गया और टेबल पर कप जमाने लगा। अंतर सिंह जी अलमारी में रखा अपना कप उठाने को तत्पर हुए।

घबराहट में उनके हाथ से कप छूट गया और उसके टुकड़े -टुकड़े हो गए। कक्ष में एक अजीब सी ख़ामोशी छा गई।

अधिकांश चेहरों पर व्यंग्य भरी मुस्कुराहट देखकर अमित जी का चेहरा क्रोध से तमतमा उठा। वे ज़मीन पर पड़े कप  के टुकड़ों को देखने लगे। उन्हें लग रहा था कि शहीदों द्वारा की गई स्वतंत्र भारत की कल्पना मानों चूर-चूर हो गई हो!

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