विशेषांक: दलित साहित्य

22 Sep, 2020

गमलों के सोवनियर

कविता | वीना श्रीवास्तव

पर्वतों के पीछे से आज फिर रिस रहा है लहू
शायद फिर हो रहा है कोई हलाल
काटा जा रहा है किसी का शीश
अभी तो रेता जा रहा होगा उसका गला
फिर, किये जाएँगे अलग उसके हाथ, फिर,धड़, पैर
फिर उखाड़ दिया जाएगा समूल
वो नहीं बन पाएँगे इतिहास
नहीं पनपेगी उनकी वंश बेल
दुनिया के नक़्शे से ग़ायब हो जाएँगे
आदिमजातियों के आदिम घर
विरासत में मिले हरियालेपन को
हमने कर दिया धूसर
उन्होंने हमें दिया भोजन और साँसें
और हमने स्वाहा कर दिया उनका जीवन
शायद तभी गढ़ी गई
होम करते हाथ जलने की परिभाषा
न, न, परिभाषा तो हमने अपने लिए गढ़ी
दरअसल, केवल उनके हाथ ही नहीं जले
वो पूरे जल गए, पूरे कट गए, पूरे मिट गए
जब खंडहर ही नहीं होंगे तो कोई कैसे जानेगा
कि इमारत कितनी बुलंद थी
वो भी हो जाएँगे ऐसे ग़ायब
जैसे ग़ायब हो रहे हैं
आदिवासी और उनके ठिकाने
 
सभ्यताओं के इतिहास में हमारी तरह
वो भी हो जाएँगे ज़मींदोज़
आजकल ज़ोरों पर हो रहा है गिरि संहार
जंगलों के घरों को किया जा रहा है समूल नष्ट
बनाए जा रहे हैं कंकरीट के महल
और महलों में तैयार हो रहे हैं
गमलों के सोवनियर

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