विशेषांक: दलित साहित्य

10 Sep, 2020

दामू की लाडली मिरू

लघुकथा | शिबु टुडू

कंधे पर लटके गमछे के एक छोर से पसीने से लथपथ शरीर को पोंछते दामू हेम्बरम, जून की उमस भरी दोपहर में, खेत किनारे स्थित बबूल के छाँव तले आकाश की ओर टकटकी लगाये कुछ यूँ बुदबुदाते हैं–

"नेस हों ओकोय बड़ाय चो कम गेये दागा,
नोवा सेरमा बोरसा चासोक् दो नित काते मुसकिल एना,
(शायद, इस साल भी वर्षा कम होगी, आज के समय में मौनसून के भरोसे खेती करना मुश्किल हो गया है) 
नोवा दिसाम रे संविधान बेनाव काते आयमा सेरमा पारोम एना,
मेनखान ओकोयटाक् सोरकार हों आदिवासी लागित बेनाव कानून
ऑटोनॉमस कॉन्सील अनुसूचित क्षेत्र रे बाङ को एहोप् लेदा 
आर ओना रेयाक् दोसा गे नित नोंडे दाक्, सड़क, हाटिया,
इसकुल, हासपाताल, रेयाक् चेत् बेबोसथा गे बानुक्आ 
(इस देश के संविधान बने कई साल बीत गये, परन्तु, आदिवासियों के अनुसूचित क्षेत्र के लिए निर्मित कानून "ऑटोनॉमस कॉन्सील" देश के किसी भी सरकार ने लागू नहीं किया, जिसके परिणाम स्वरूप आज यहाँ (गाँव) पानी, सड़क, हाटिया, स्कूल, अस्पताल जैसी सुविधाएँ नदारद हैं)। 

जुदि कानून बेनाव कोक्-आ, तोबे आले 
लेकाते आले लागित् बेबोसथा ले बेनाव केया, 
सेरमा सेच् दो ओहो गे कोयोक् होय लेना,
उपाय बानक्-आ नोव दारे रे बाबेर तोल तेगे होयोक् तिञा 
(काश! कानून बने होते तो हम अपनी व्यवस्था अपने हिसाब से किये होते। कम-से-कम यह आकाश तो निहारना नहीं पड़ता। अब उपाय नहीं है, इस पेड़ पर मुझे रस्सी बाँधनी ही पड़ेगी)।"

सोच ही रहा था, तब उसके छोटी सी बच्ची मिरू ने पीछे से आकर दामू की  आँखें अपनी दोनों हाथ से तोतली बोली के साथ ढक लीं – "लाय में बाबा ओकोय कानाञ? चेत् हुदिस दाम?"(बताएँ पिताजी मैं कौन हूँ? क्या सोच रहे हैं?)। 

दामू ने एक झटके में अपनी गंदी सोच बदल दी और अपने नन्हीं सी मिरू को बाँहों में रोते हुए छिपा लिया।

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