विशेषांक: दलित साहित्य

01 Oct, 2020

ज्योति पासवान
तुम्हारे हौसले
बुलंद इरादों के चर्चे
फैल चुके हैं
दूर तक
देश-विदेश में,
तुम कौन हो?
मुझे याद आ रहा है 
तुम्हारा इतिहास
तुम बहादुर थीं
ज़िम्मेदार भी थीं
तब भी-
जब गाँव में 
तुम पैठ से
साइकिल चला कर
सौदा लेने बाज़ार
जाती थीं
दबंगों को नागवार 
गुज़रा था तुम्हारा 
साइकिल चलाना
तुम्हारी माँ को भी धमकियाँ 
दी गयी थीं
इसे रोक ले
साइकिल पर चढ़ने से
अपनी औक़ात 
भूल गयी तू भी
नीच जात की होकर
ये साइकिल चलाएगी
तो हमारी बहू-बेटियाँ
क्या चलाएँगी?
तू बराबरी करेगी
हम से
इसकी इतनी हिम्मत।
उसके बाद
तुम्हारी साइकिल
छूट गयी थी
परन्तु -
तुमने अपना हौसला
तब भी बनाये 
रखा था जैसे आज बनाये रखा है
कोरोना संकट में,
तुम्हारी उस साइकिल 
इतिहास की ख़बरें
तब भी छपीं थीं अख़बारों में
‘एक दलित की बेटी को साइकिल 
चलाने से दबंगों ने रोका’
तब तुम दलित की बेटी थीं
आज तुम फिर
सुर्ख़ियों में हो
मगर-
अब दलित की बेटी नहीं
भारत की बेटी हो।
तुमने परिपाटी 
बदली है
पूरे समाज और देश की
जिसे कमज़ोर समझा गया
तुमने मज़बूती
दिखाई है अपने तन और मन की
जिसे पराया समझा गया
तुमने अपनापन दिखाया है।

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