विशेषांक: दलित साहित्य

10 Sep, 2020

इस तरफ़ से जहाँ वह बैठे थे, वहाँ से उस तरफ़ का दृश्य साफ़ ही दिखाई देता, पर दोनों छोरों के बीच कोहरे का एक झीना आवरण था, ठंडक थी और बर्फ़ के गले हुए टुकड़ों से बने पानी की नदी। पहाड़ी के बीचोंबीच यह नदी ख़ामोशी से बह रही थी, जाने कब से।

स्थानीय लोगों ने उन्हें पहले ही मना कर दिया था कि नदी में ना उतरें, उस का पाट बेशक ज़्यादा चौड़ा नहीं है, बामुश्किल चालीस हाथ होगा, पर गहरी बहुत है नदी, शायद चार बाँस गहरी मतलब लगभग चार सौ फ़ीट से कुछ अधिक ही। सावधान रहिए। 

इस पार से उस पार जाने के लिए लकड़ी का एक पुल वहाँ था, काफ़ी पुराना और थोड़ा जर्जर भी। कब और किस ने बनाया यह पुल यह बात बहुत से लोगों से पूछने पर पता चली कि बहुत पहले कभी अंग्रेज़ों के वक़्त में बनाया था एक अंग्रेज़ ने। 
“सर मैं उस पार जाऊँगी।” रम्या की उँगली नदी के दूसरे छोर की तरफ़ इशारा कर रही थी और आँखें, दीपंकर के चेहरे पर अपने सवाल की प्रतिक्रिया को पढ़ने में ठहरी हुई थीं। उन्होंने नदी की तरफ़ देखा, वह धीमी गति से बह रही थी और सच में, अगर बताया न गया होता कि इतनी गहरी है तो पता भी न चलता। 

वह इतना ही कह सके– “कैसे?”

“उस पुल से!” 

रम्या ने उत्साह से कहा। उस की छोटी-छोटी आँखों की चमक जो उन्हें सबसे अच्छी लगती थी, थोड़ी अधिक फैली हुई थी। 

वह पुल की तरफ़ बढ़ गए। पुल लकड़ी का था और लकड़ी काली पड़ चुकी थी, जगह-जगह से घिसी हुई भी। बीच में कई जगह से तो उखड़ भी गये थे, लकड़ी के शहतीर। 

उन्होंने आशंका प्रकट करते हुए कहा– “कहीं बीच में लकड़ी टूट गई तो...!” 

“यूनिवर्सिटी लेवल की तैराक हूँ,” कहते हुए रम्या ने लापरवाही से कंधे उचकाए और पुल पर चढ़ गई। कोई भय उस की आँखों में नहीं दिखा। 

“लौट आओगी न?” उस के निश्छल ढंग से इस तरह कहने पर वह हँसे। 

“हाँ पक्का ... बस इंतज़ार न छोड़ना मेरा।” 

फिर रम्या रुकी पल भर को और पलट कर उन की आँखों में देखने लगी। वह भी उसे बहुत उत्सुकता से देख रहे थे। दोनों के बीच धुंध का झीना पर्दा था। 

धीमे क़दमों से वह लौट आई, बिल्कुल उनके पास। उन की आँखों के आगे हाथ फिराया– “कहाँ हैं आप, जवाब दीजिए।” 

“तुम ज़िद्दी हो।” 

“हाँ, हिम्मती... सच है... पर ये मेरे सवाल का जवाब नहीं।” 

“हम्म…” उनके मुँह से सिर्फ़ इतना निकला। 

“हम्म नहीं, हाँ कहो ना,” रम्या ने अतिरिक्त आज़ादी ली।

“पहले भी कुछ लोग गए, पर लौटे नहीं फिर!” उन्होंने अपने ठंडे हाथों को ओवरकोट की जेब में डाल लिया, जैसे जेब अतीत की कोई सुरंग हो। 

“मैं लौटूँगी... अब आप से मुझे कोई दूर नहीं कर सकता,” अपनी जैकेट उतारते हुए रम्या ने कहा। 

रम्या ने उनके प्रत्युत्तर की प्रतीक्षा नहीं की और पुल की तरफ़ बढ़ गई। उस ने पुल के हत्थों को दोनों हाथों से पकड़ रखा था और बहुत ही नपे-तुले क़दमों से आगे बढ़ती गई। बामुश्किल पाँच मिनट में वह उस तरफ़ से चिल्ला रही थी। “मैं पहुँच गई, पहुँच गई।” 

उन्होंने उसे देखने की कोशिश की पर आवाज़ की तरह, चेहरा साफ़ नहीं था धुंध का मोटा आवरण झूल रहा था उन दोनों के बीचोंबीच। 

वहाँ उस तरफ़ सिर्फ़ एक इंसानी आकृति थी और एक आवाज़ जो उस की पहचान कराती हुई उन तक पहुँचती। इस के अलावा कुछ नहीं था। ये कितना दुखद है कि जब तक हम धुँधलके में होते हैं, स्वीकार्य होते हैं, पहचान होते ही अस्वीकृत हो जाते हैं! वह सोचते हुए टहलने लगे। 

पाँच सात मिनट बाद रम्या उसी सावधानी से लौट आयी, संतुलित चाल में। कुछ फूल थे उस के हाथों में। कुछ लाल, कुछ पीले और आश्चर्यजनक रूप से कुछ नीलिमा लिए हुए भी। वह पास आ खड़ी हुई, फिर वह कुछ और नज़दीक सरक आई। फूलों की मादक और मनमोहक गंध उन दोनों के बीच फैल गई। 

“आप के लिए,” रम्या ने हाथ आगे किया। 

“क्या वहाँ बहुत फूल हैं?” उन्होंने पूछा। 

“हाँ, बहुत सारे, बहुत ख़ुशबू भी; अभी लोगों ने उस जगह को बर्बाद नहीं किया, शायद भीतर के भय की वज़ह से।” 

पुल की जर्जर हालत की तरफ़ देखते हुए वह बुदबुदाए– “हर कोई जोखिम नहीं उठाता।”

दोनों लौट कर होटल आ गए। अब रम्या वही नहीं लग रही थी जो पुल पार करने से पहले थी। एक नया आत्मविश्वास सा दिखा उस में। थोड़ी वाचाल सी हो गई वह। रास्ते भर कुछ-कुछ शरारत करती रही वह। 

होटल का मालिक उन्हें आते देख चाय रख गया। वे दोनों आमने-सामने सोफ़े पर बैठ गए। उनका ध्यान रह-रहकर रम्या के चेहरे पर जाता, जहाँ एक अछूती सी ताज़गी फैली हुई थी। 

चाय के कप से डिप किया हुआ टी-बैग उन्होंने निकाला। बूँद-बूँद चाय गिर रही थी, उससे अब भी। थोड़ी ठंडी हो गई थी चाय। उस टी-बैग को वह अपनी नाक के पास ला कर उस की महक लेने लगे। तुलसी की एक अलग सी महक आ रही थी उस में से। यह गंध तुलसी के पत्तों से आती गंध से अलग थी, एकदम अलग। क्या ये वाक़ई अलग हो गई है, अपने मूल स्रोत से अलग बाँध देने की वज़ह से। क्या रम्या भी? कुछ असहज से हुए वह।

“आप के बच्चे?” रम्या ने चाय का घूँट भरते हुए ख़ामोशी तोड़ी। 

“कोई नहीं है। कोई समस्या थी मेरी पत्नी को।” 

“और पत्नी?” 

“हम साथ नहीं है अब। ग्यारह साल हम साथ रहे फिर वनवास ख़त्म हो गया। वह एक अच्छी औरत है पर हम अलग हैं, बिल्कुल अलग। उस ने तो मुझे दूसरी शादी करने को भी कहा, पर मुझ से ये हो न सका। 

“आप की अरेंज्ड मैरिज थी?” 

“देखो, इस से कोई फ़र्क नहीं पड़ता ...मैंने अब तक यही जाना कि इस से कोई बड़ा फ़र्क नहीं पड़ता भारत में। शादी एक जुआ है, जिसमें आप का दाँव लग भी सकता है, नहीं भी और ज़्यादातर इस में कम मुनाफ़े की ही जीत होती है।” 

यह सब रम्या से कह देना चाहते थे वह पर कह नहीं सके। वह अब भी इस पर विचार ही कर रहे थे कि क्या वाक़ई वह अपनी सोच में ठीक हैं। “हाँ अरेंज्ड मैरिज,” इस से अधिक उन्होंने कुछ नहीं कहा। 

रम्या ने दोनों पाँव उठाकर सोफ़े पर रख लिए– “हाँ, उस में ऐसा ही होता है।”

वह कुछ पल अपनी पुरानी ज़िंदगी में पहुँच गए। उन दोनों की ज़िंदगी के बीच जैसे कोई पारदर्शी पर्दा था, जहाँ से वे एक दूसरे को देख तो सकते थे, पर एक दूसरे के पास आ-जा नहीं सके कभी। वह क्या था, ठीक ठीक उसे वे पहचान भी नहीं पाते, पर कुछ था जो वे अपनी पत्नी से नहीं पा सके। उनके बीच ज़्यादातर वक़्त बहुत कम बातें होतीं। उन की पत्नी सुंदर थी, पर उन्हें उन की सुंदरता ने कभी आकर्षित नहीं किया। क्यों नहीं किया? वे नहीं जानते। पर वे इतना ज़रूर जानते थे कि उन्हें अपनी पत्नी से बातें करने में कोई आनन्द नहीं आता था। ये वह स्त्री नहीं थी, जिस की चाहत उन्हें थी, जिस की तलाश थी, जो उमंग और उत्साह से सराबोर कर दे, जिस के साथ होने से शक्ति और स्फूर्ति मिलती हो। ये ग्यारह वर्षों का एकांत था, ऐसा निचाट अकेलापन, जो किसी को समझाया भी ना जा सके। जोंक की तरह चिपटे उस अकेलेपन को उन्होंने बिना शिकायत किये ग्यारह वर्ष जिया।

“एक दिन वह अलग हो गयी, तब मैं बयालीस का था। मैंने भी कोई आपत्ति नहीं की। पिछले तीन साल से हम नहीं मिले।” 

“क्या वे आप को पसंद नहीं थीं?” 

तभी सामने से उन्हें कोई आता दिखा। यह दृश्य बहुत अजीब था। वह उसे देखने लगे और कुछ अधिक ही कौतुहल से। सामने से एक आदमी उल्टे पाँव चला आ रहा था, मुँह सामने कर के नहीं, बल्कि पीठ कर के। उन्हें उस तरफ़ देखते देख रम्या भी उधर देखने लगी। उस व्यक्ति की इस हरकत पर वह मुस्कुरा गई। कुछ पास आने पर स्पष्ट हुआ कि वह साठ से ऊपर का एक व्यक्ति है, कोई स्थानीय व्यक्ति, जो शायद अपनी मस्ती में था, शायद होटल के मालिक से मिलने आया होगा। 

“वह मेरी पसंद थी या नहीं, यह व्यक्ति उस का उत्तर है। इस से अधिक मैं कोई जवाब नहीं दूँगा, क्योंकि हर जवाब असंतुष्ट रखने वाला साबित होगा। एक तलाश होती है, दुर्गम और दुर्दमनीय, पर हम वहाँ पहुँच जाना चाहते हैं, मरने से पहले। वह एक अच्छी औरत थी, पर ज़िंदगी इस व्यक्ति की तरह चली, और मैं असंतुष्ट था इस स्थिति से।"

"हम्म...और कौन-कौन हैं घर में।"

"पिता हैं और दो बड़े भाई। पिता एक कॉलेज में चपरासी थे, दोनों भाई ज़्यादा पढ़े नहीं। वे भी शुरू में चपरासी ही थे, पर अब प्रोमोशन ले कर क्लर्क हो गए हैं। पिता उन्हीं के साथ कम्फ़र्टेबल महसूस करते हैं, वहीं रहते हैं। भाई मेरे पास नहीं आते, शायद वे मेरे साथ सहज नहीं हैं। माँ नहीं हैं, बहुत पहले गुज़र गयीं। परिवार की छोड़ो, अब ये देखो, इन जगहों पर जब से ठेकेदारी सिस्टम आया है, तब से इन छोटे पदों पर कोई भर्ती नहीं होती हमारे लोगों की। हमें सुनियोजित ढंग से बेदख़ल कर दिया गया। नई पीढ़ी कहाँ से तैयार होगी वहाँ दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों की... ख़ैर छोड़ो कहोगी कि हर वक़्त यही बातें, तुम अपने बारे में कुछ बताओ।"

रम्या ने कप सामने की टेबल पर रख दिया– "कितना कुछ मिलता-जुलता है सब। मेरे दादाजी मध्यप्रदेश के एक छोटे से गाँव से यहाँ रेलवे में खलासी हो गये थे। पिताजी पढ़-लिख कर मंत्रालय में बड़े बाबू बन गए और अभी डिप्टी कमिश्नर हैं। वे मुम्बई में रहते हैं फ़िलहाल। मेरी छोटी बहन एक निजी बैंक में असिस्टेंट मैनेजर है, दिव्या भारद्वाज, सब उसे वहाँ ब्राह्मण ही समझते हैं। किसी को वह बताती भी नहीं। दादाजी ने ही पापा के नाम के साथ भारद्वाज लगा दिया था, स्कूल में उनका नाम लिखाते वक़्त," इतना कह कर वह कुछ पल ख़ामोश हो गयी और अपनी हथेलियों की रेखाओं को देखने लगी।"पापा के पास कास्ट सर्टिफ़िकेट था, पर उन्हें इस की ज़रूरत नहीं पड़ी, उन की नौकरी में कहीं इंटरव्यू जो नहीं था," वह मुस्कुराने की असफल कोशिश करने लगी। 

दीपंकर ने लम्बी साँस छोड़ी– "ये है इन लोगों के राज करने का तरीक़ा। आरक्षण को छेड़ा भी नहीं और हम लोगों के घुसने के रास्ते भी बंद कर दिए। अब अगर हम इन जगहों पर घुसना चाहें तो हमेशा हमें अपनी पहचान छिपा कर रखनी होगी और उनके नक़ाब से ही ख़ुद को दिखाना होगा। तब शासन तो ये उन्हीं का हुआ ना।" 

रम्या कुछ देर सोचती रही। उसे याद आया कि दिव्या ने एक बार उसे बताया था कि दीदी हर वक़्त ये भय तो बना ही रहता है कि यहाँ किसी को मेरी असलियत ना पता चल जाये किसी दिन। कितना बदल जायेगा तब सब कुछ, शायद नौकरी से ही निकाल दें किसी और बहाने से। रम्या कुछ व्यग्र हुई और फिर उठ कर अपने कमरे में चली गई। जाते हुए उस ने सिर्फ़ इतना कहा– “ओके सी यू एट लंच।” 

वह भी वहाँ नहीं रहे थे अब, अतीत की आड़ी-तिरछी गलियों में खो गए। इधर कुछ कॉलेजों के विद्यार्थियों ने एक समूह बनाया था, साहित्यिक-सांस्कृतिक समूह। पहले वह फोन पर व्हाट्सअप पर बना और कुछ ही महीनों में मूर्त रूप लेने लगा। 

सुलेखा गुप्ता इस समूह की एडमिन थी और उस ने उन्हें बताया कि यह एस.सी., एस.टी., ओबीसी वर्ग के विद्यार्थियों का समूह है जिस में विद्यार्थी और कुछ प्राध्यापक भी जुड़े हैं। हालाँकि इस समूह द्वारा लगाई गई पोस्ट देखकर उन्हें इस का कुछ कुछ अंदाज़ा पहले ही हो गया था। 

सुलेखा से परिचय तब हुआ, जब उस ने उन्हें अपने कॉलेज में व्याख्यान देने के लिए बुलाया। विषय था– ’डॉक्टर अंबेडकर और मध्यवर्ग’ कार्यक्रम अंग्रेज़ी विभाग की ओर से था, पर उन्होंने अपना व्याख्यान हिंदी में ही दिया। अपने व्याख्यान में उन्होंने जातिगत पहचान और दलित मध्यवर्ग की भूमिका पर विस्तार से विचार रखे।

इस महानगर के प्रतिष्ठित कॉलेजों में से एक महिला कॉलेज था यह। यहीं उन की मुलाक़ात रम्या से हुई। व्याख्यान के बाद डॉ. रम्या भारद्वाज ने उनका फोन नंबर लिया था उनसे । साथ ही बताया कि अभी पिछले साल दो हज़ार चौदह में ही उस की बतौर स्थायी प्राध्यापक नियुक्ति हुई है, अंग्रेज़ी विभाग में। 

व्याख्यान के दो दिन बाद ही उस का फोन आ गया। उस ने पूछा कि क्या हम वीकेंड पर मिल सकते हैं? दोनों ने तय किया कि शनिवार की शाम गैलेक्सी मॉल के सनसैट रेस्तराँ में मिलेंगे। सितंबर शुरू हो चुका था, पर उस दिन तेज बारिश हुई। मौसम की आखिरी बारिश थी यह। इस के बाद लगभग हर वीकेंड पर वे दोनों मिलने लगे। व्हाट्सअप पर चैटिंग भी शुरू हो गई। जल्द ही वे बहुत घुल-मिल गए। काफ़ी उत्साहित थी रम्या और उन्हें भी यह रिश्ता एक अजीब सी ऊर्जा दे रहा था। 

“मेरा जन्म भी एक दलित परिवार में हुआ है दीपंकर सर।” रम्या ने एक दिन चैट करते हुए लिखा तो वह चकित रह गए। रम्या के रम्या भारद्वाज होने के कारण उन्हें इस की कोई आशा नहीं थी। दूसरे, उस ने पहली बार उन्हें ‘दीपंकर सर’ कह कर संबोधित किया। दूसरे कारण से उन्हें ज़्यादा विस्मय हुआ। आगे बढ़ने की शुरुआत थी उस की यह। 

उस शाम, कॉलेज के बाद, चार बजे वे दोनों मिले। वह काले रंग की चुस्त जीन्स और ब्राउन रंग का घुटनों से कुछ ऊपर तक लंबा एक कोट पहने हुए थी। उस का व्यक्तित्व और खिल गया था। कपड़ों और उनके रंग का उस का चुनाव उस के सौंदर्यबोध और सुरुचि को बता रहा था। 

"दीपंकर सर आप दलित नहीं लगते।" आज से पन्द्रह साल पहले जब उनसे  कोई यह बात कहता था तो वे नाराज़ हो जाया करते और पूछते कि आख़िर दलित कैसे होते हैं, क्या उनके कोई सींग-पूँछ होती हैं, फिर कुछ सालों बाद ऐसा वक़्त भी आया कि वह यह सुन कर हैरान भर होते परंतु अब तो वह यह सुन कर केवल मुस्कुरा भर देते हैं। 

“कैसे होते हैं फिर दलित?” मुस्कुराते हुए उन्होंने पूछा और घड़ी देखी। शाम के चार बजकर चालीस मिनट हुए थे। बाहर सूरज और कमज़ोर पड़ गया होगा, हवा थोड़ी और सर्द हो गई होगी। सब तरफ़ साये लम्बे हो कर फैलने लगे होंगे। 

रम्या ने अपने आसपास की कुर्सियों पर नज़र डाली, वहाँ कोई नहीं था, उन दोनों के अलावा। रेस्तराँ ख़ाली था।

“दीपंकर सर, दलित सुंदर नहीं होते न,” इतना कह कर उस ने बहुत सहजता से अपना मग उठा लिया। एक पल उन्होंने ग़ौर से रम्या के उजास से भरे गेहुँए रंग और तीखे नैन-नक़्श वाले चेहरे को देखा और सोचा कि पूछ ही लूँ कि तुम भी तो दलित हो और इतनी सुंदर हो, पर नहीं पूछा; कुछ सोच कर रुक गये। अपना गिलास उठाया और गट-गट कर बियर ख़त्म कर दी। 

“उठो रम्या, अब चलें तुम्हें शायद नशा हो रहा है,” रम्या के बहकने को भाँप लिया उन्होंने। 

रम्या ने अपना मग मेज़ पर रख दिया और सवालों को आँखों में। 

“अच्छा, कभी तुम सुबह मेरे घर आना, सभी कहते हैं कि मैं चाय अच्छी बनाता हूँ, तुम्हारे लिए वही सही रहेगी। बाक़ी बातें हम वही करेंगे,” वह खड़े हुए और कोट पहनने लगे। 

वह नहीं उठी और अपने बालों के मोटे से जूड़े से बड़ी सी चॉपस्टिकनुमा सिलाई खींचकर निकाल दी और बालों को खुल कर बिखर जाने दिया। छोटे-छोटे घुँघरू से सजी सलाई को उस ने सामने मेज़ पर रख दिया और मग हाथों में उठा लिया– “दीपंकर सर, यह तो तानाशाही हुई न।” कहते हुए उस ने अपनी कलाई उन की तरफ़ बढ़ा दी। 

“और कितना वक़्त, बाहर सर्दी बढ़ने लगेगी फिर,” दीपंकर ने कुछ आग्रह से कहा।

ये कहते हुए उनका ध्यान रम्या की सुंदर घड़ी पर अटक गया जिस का डायल किनारों से सुनहरा और भीतर वर्तुलाकार में नीला था। काफ़ी महँगी और विदेशी घड़ी लगी उन्हें। 

“आपकी घड़ी और मेरी घड़ी लगभग एक जैसी है ना दीपंकर सर,” रम्या ने उन की निगाह पकड़ ली।

उनके सवाल को उस ने फिर से जैसे अनसुना कर दिया। 

“पर आप की कलाई, मेरी कलाई से ज़्यादा ख़ूबसूरत है,” वह शरारत से मुस्कुराई। 

लगभग वह कहते-कहते रुक गए कि नहीं, तुम्हारी कलाई ज़्यादा गोल और सुघड़ है जो आमतौर पर नहीं होती। अब वह वापस बैठ गये। 

“ऐसा नहीं कहते, तुम अभी जवान हो, मेरी और तुम्हारी क्या बराबरी।"

उस ने इस का कोई जवाब नहीं दिया, जैसे सुना ही नहीं हो और मग से फिर एक गहरा सिप किया। घूँट की आवाज़ उन तक आई। 

“तुम मुझ से बीस साल छोटी हो रम्या,” उन्होंने उसे सावधान किया और शायद ख़ुद को भी। 

“नहीं, बीस नहीं, सत्रह साल, दो महीने, बारह दिन... मैंने फ़ेसबुक पर आप की डेट ऑफ़ बर्थ देखी है और आप देखने में पैंतीस से ज़्यादा के लगते भी नहीं, बेवज़ह ख़ुद को बूढ़ा बनाए हुए हैं,” रम्या ने दूसरा गहरा सिप किया। "प्रोफेसर और थिंकर दिखने की यूनिफ़ॉर्म होती है क्या ये?" 

कुछ असहज हो गए वह, पता नहीं, आह्लाद से, आश्वस्ति से या आशंका से। उन्होंने अपने गले से मफ़लर निकाल कर टेबल पर रख दिया और बालों को ठीक किया। रीढ़ सीधी की और थोड़ा तन कर भी बैठ गए। 

“एक सच बात कहूँ मैं दीपंकर सर।” 

“मुझ से सच ही कहा करो तुम।” 

रेस्तराँ का दरवाज़ा किसी व्यक्ति ने खोला और बाहर चला गया तो हल्की धूप की तपिश ठंडी हवा के साथ घुल मिल कर उन दोनों के चारों तरफ़ फैल गयी। एक उजास सा उन दोनों के बीच मेज़ पर उभरा। उस ने मग को अपने मुँह से लगाया तो वह उजलापन उस के चेहरे पर फैल गया। 

रम्या ने हाथ बढ़ाकर उनके हाथ पर रख दिया– “आप मुझे पाँच साल पहले क्यों नहीं मिले दीपंकर सर, आप जानते हैं आप मुझे इतने अच्छे क्यों लगते हैं, इसलिए क्योंकि आप में आत्मविश्वास है, अपने वजूद से आप शर्मिंदा नहीं, आप उसे स्वीकार करते हैं, जो आप वास्तव में हैं, कोई बनावटीपन नहीं, बहुत सहज, एकदम मिट्टी के मानुस हैं आप।” 

कुछ पल, कुछ भी न कह सके वह, मुस्कुरा कर रह गए। 

“ये पहचान एक संयोग भर है, किसी का चुनाव नहीं, बस एक नियति। अभी ऐसी भी बहुत देर नहीं हुई है, मिस रम्या भारद्वाज।”

उन्होंने हल्के से मुस्कुरा कर कुछ इंतज़ार के बाद कहा तो रम्या ने होंठ एक तरफ़ को उचका कर उपेक्षा से उन की ओर देखा। शायद उस ने उनके इस तरह से कहने में व्यंग्य को महसूस किया। कुछ देर बाद दोनों उठ कर बाहर निकल गए। बाहर दिसंबर की सर्द हवाएँ थी, साढे़ पाँच बजे ही अँधेरा घिर आया था। तीन महीने से कुछ अधिक ही पुरानी थी उन की जान-पहचान, पर लगता था जैसे दोनों एक-दूसरे को वर्षों से जानते हों। पॉश इलाक़ा था यह महानगर का। लगभग आधे किलोमीटर में आलीशान बाज़ार ही फैला हुआ था, जहाँ बहुत से कैफ़े और पब थे। अँधेरा हो चुका था, पर बड़े-बड़े शोरूम की दूधिया रोशनी से सर्विस लेन रोशन थी। मेन रोड पर ट्रेफ़िक की भीड़-भाड़ थी, पर इस तरफ़, जहाँ वे चल रहे थे, कम ही लोग थे। थोड़ा आगे चल कर एक संकरी सी गली पड़ी और वे दोनों उस में घुस गए। गली आगे चल कर मेट्रो स्टेशन पर खुलती थी, पर इस वक़्त ये एकदम सुनसान थी। उन्हें अब कुछ सर्दी सी महसूस हुई तो उन्होंने अपना मफ़लर गले पर बाँध लिया। 

“ये मफ़लर आपको बहुत प्रिय है शायद?” उस की आवाज़ में चहक थी।

“हाँ, पर क्यों?” 

“हमेशा देखती हूँ।” रम्या ने हाथ रगड़ कर गर्म करते हुए कहा – “मुझे चाहिए।” 

“तुम्हारे लिए एक और ला दूँगा, जब अगली बार मिलेंगे,” वह पटरी पर धीमे-धीमे चलते हुए बोले। 

“नहीं यही चाहिए और अभी,” रम्या रुक कर खड़ी हो गई और उस की आवाज़ में अधिकार और आग्रह आ उतरा। 
उन्होंने स्थिति को समझते हुए अपने गले से मफ़लर खोला और रम्या के गले में डाल दिया। इसी पल में, रम्या ने झट आगे बढ़कर उनके होठों को चूम लिया। रम्या के पीछे हटने से पहले ही उन्होंने उसे कस कर अपनी बाँहों में भींच लिया। कुछ क्षण वे दोनों एक दूसरे से ऐसे लिपटे रहे, जैसे दुनिया जहान से ही बेख़बर हो गए हों। फिर अचानक दीपंकर को जैसे होश आया और वह झटके से अलग हो गए। 

दो दिन बाद शनिवार की सुबह दस बजे, रम्या उनके घर पहुँच गई। वह उस समय कुछ लिख रहे थे। बॉक्सर भौंक रहा था दरवाज़े पर। मेड ने बताया कि कोई मैडम मिलने आयी हैं। उन्होंने कहा उन्हें अंदर भेज दो। वे जानते थे क्योंकि रम्या ने रात ही को व्हाट्सएप पर संदेश भेजा था कि ‘आप की चाय कल सुबह।’

"इतनी देर से,” रम्या के आते ही उन्होंने बनावटी शिकायती लहज़े में कहा। 

“मैं सात बजे से इंतज़ार कर रहा हूँ।” 

 रम्या हँसते हुए डबल बेड पर बैठ गई, जबकि सामने सोफ़ा ख़ाली था।

"अरे सर, मैं तो एक घंटा पहले ही आ जाती पर जैसे ही घर से बाहर निकली, मेरे पड़ोसी आर.सी. शर्मा जी ज़िद पर अड़ गए कि आज तो आप को चाय पीनी ही होगी। फिर शुरू हुई उनकी कभी ख़त्म ना होने वाली बातें, बहुत बातूनी आदमी हैं। मिनिस्ट्री में अंडर सेक्रेटरी हैं, पर हैं बहुत ही लो आईक्यू के आदमी। सोचती हूँ कि उन की बीवी उन्हें रोज़ कैसे झेलती होगी।" 

वह हँसते हुए कुर्सी से उठे और बाहर तक गए। मेड किचन में बर्तन माँज रही थी। 

“आज खाना नहीं बनेगा, बर्तन माँज कर चली जाना,” उन्होंने मेड की पीठ से कहा और मेड की पीठ के ऊपर सिर ‘हाँ’ में हिला। 

कुछ देर बाद मेड चली गई। उन्होंने जा कर मुख्य द्वार बंद कर लिया। 

“तुम्हारे लिए चाय बनाता हूँ,” कह कर वह किचन की तरफ़ जाने लगे, तभी रम्या ने उन्हें कमर से कस कर पकड़ लिया। 

“बाद में, बैठिये,” रम्या ने लिपट कर कहा। 

“चाय बना लाता हूँ, फिर बातें होंगी।” 

इतना कह कर वह किचन में चले गए। कुछ देर बर्तनों की आवाज़ होती रही। थोड़ी देर में वह चाय के दो कप, एक तश्तरी में रख कर लाए। इस बीच रम्या उनके कमरे की किताबें, तरह-तरह के पैन, स्टडी टेबल, कुर्सी, बिखरे हुए काग़ज़ देखती रही। डबलबेड के किनारे, रजाई के पास, एक तौलिया पड़ा था। उस ने उसे उठाया और एक तरफ़ रख दिया। बहुत व्यवस्थित कमरा नहीं था, पर शांति बहुत थी। दीपंकर में जो कई बातें उसे खींचती थीं, उस में एक वज़ह यह भी थी कि उस को उन की उपस्थिति में गहरा सुकून और सकारात्मक ऊर्जा मिलती। यही भाव इस कमरे में खिल रहा था और उस ने आश्वस्ति से भर कर एक गहरी साँस ली। 

 “इस कमरे में ख़ुशबू किस चीज़ की आ रही है। क्या आप पूजा भी करते हैं?” उन्हें आते देख रम्या ने पूछा। 

“मैं हमेशा ही इबादत में रहता हूँ, अलग से पूजा करने की क्या जरूरत?" उन्होंने मुस्कुराते हुए, सिर झुकाने का अभिनय किया। "यह ख़ुशबू फ़ेरारी कंपनी के लेवेंडर परफ़्यूम की होगी। पर मुझे तो नहीं आ रही।” 

“ओह इटैलियन… तभी आप में से भी आ रही है,” रम्या ने कप पकड़ते हुए कहा। रम्या ने चाय सिप की– “वाह, अमेज़िंग टी।”

“एक बात पूछूँ?” फिर उस ने हाँ-ना का इंतज़ार किए बिना कहा– “आप की कास्ट क्या है?” 

वह सिर झुका कर चाय सिप कर रहे थे। ये सवाल सुन कर उन्होंने आँखें उठा कर उस की तरफ़ देखा। फिर चाय सिप करने लगे। 

वह अब भी बेड पर थी और वह सोफ़े पर। तभी उन की प्यारी बिल्ली शिमला ठुमकते हुए चलती हुई आई और सोफ़े के हत्थे के पास आ कर बैठ गई। वह अपना मुँह उनकी गोद में रख कर कहीं अनंत में देख रही थी। उस को ऐसे बैठते देख, उनका कुत्ता बॉक्सर, जो सामने किचन के दरवाज़े पर बैठ कर ऊँघने लगा था, उठ कर आया और दूसरी तरफ़ की जाँघ पर सिर रख कर सोफ़े पर लेट गया। 

“ये मेरी शिमला पर्शियन जाति की है,” उन्होंने बिल्ली के सिर पर हाथ फेरा। बाक्सर ने उन्हें ऐसा करते देख पूरी अपनी आँखें खोल दीं। उन्होंने कप दूसरे हाथ में पकड़ा और बॉक्सर के सिर पर हाथ फेरने लगे। “ये बॉक्सर लेब्राडोर रिट्रीवर जाति का है, बहुत पज़ेसिव, दोनों बहुत ईर्ष्यालु हैं, जो मुझे एक के लिए करना पड़ता है, वह दूसरे के लिए भी करना पड़ता है, पर आपस में बहुत प्यार करते हैं, कभी लड़ते नहीं एक दूसरे से, मिल-जुल कर खाते हैं।” 

रम्या ने देखा कि बिल्ली उस की तरफ़ एकटक देख रही थी। नज़रें नीची कर वह चाय पीने लगी। “आप ने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया,” रम्या ने कप को दोनों हाथों से पकड़ लिया। 

“दिया... ध्यान दो,” कह कर उन्होंने शिमला से पूछा – “चाय पियोगी?” यह सुन कर उस ने रम्या की तरफ़ से मुँह फेर लिया। “तुम पियोगे?” उन्होंने बॉक्सर से पूछा तो वह टाँगें लंबी कर के और पसर गया। 

“जाति कृत्रिम है, बनाई हुई संरचना, मेरी कोई जाति नहीं। इंसान होना ही मेरी जाति है पर कुछ कमिटमेंट होते हैं इंसानियत के लिए। वे फ़र्ज़ आप को निभाने पड़ते हैं। अपनी पत्नी के साथ भी मैंने फ़र्ज़ निभाए, पर उसे ये बोझ लगने लगे, इंसान सच में बहुत जटिल होता है।” 

बेड के सिरहाने की तरफ़ की दीवार में एक छोटी खिड़की थी, जिस में छोटे-छोटे चौकोर खानों वाली लोहे की ग्रिल लगी थी और खिड़की के दरवाज़ों में मच्छर रोकने वाली जाली। उन्होंने उठ कर खिड़की के दरवाज़े खोल दिए। धूप के कुछ टुकड़े बिस्तर पर फूलों की तरह बिखर गए। 

“घर में खिड़की ज़रूर होनी चाहिए। ताज़ा हवा आती रहती है। हवा थोड़ी ठंडी है, अगर परेशान करे तो बंद कर देना।” 

रम्या ने तुरंत उठ कर खिड़की बंद कर दी और पर्दा लगा दिया।"मेरा सवाल वहीं है अभी।"

“शायद तुम मेरे जवाब से संतुष्ट नहीं हो, तब मुझे कुछ भी मान सकती हो, दलित, शेड्यूल्ड कास्ट या बहुजन कुछ भी... पर यह सब मेरे कमिटमेंट हैं, कर्ज़ हैं, ज़िम्मेदारी हैं, पर पहले हम इंसान हैं,” उन्होंने रम्या की आँखों में असंतुष्टि और असहजता को देख कर कहा। 

इतना सुन कर रम्या उठ कर कमरे में बेचैनी से चहलक़दमी करने लगी। उस के चेहरे पर तनाव गहराने लगा। दीपंकर भाँप गए उस ताप को। 

“तुम दोनों दूसरे कमरे में जाओ, कुछ देर के लिए प्लीज़,” उन्होंने कहा तो दोनों सोफ़े से उतरे और ड्राइंग रूम की तरफ़ चले गए। 

“बैठ जाओ, थोड़ा शांत रहो।” 

वह बैठी नहीं। आवेश से भरी आवाज़ में उस ने कहा– “नहीं, मुझे आप से कुछ कहना है।”

“कहो।” 

“लेकिन वे तो हमें इंसान नहीं मानते,” रम्या का चेहरा तमतमा गया। 

“ये उन की समस्या है,” दीपंकर का स्वर शांत था।

“सेक्स के लिए मैं ठीक हूँ, पर शादी के लिए नहीं,” रम्या की भवें तन गयी। 

“कौन था?” 

“था एक बास्टर्ड, मयंक नाम था, एम.ए. में मिला था, सिर्फ़ उसी को मैंने अपनी जाति बताई और उस ने सब जगह फैला दिया, पता नहीं कब, कानों-कान फैल गई बात। सवर्ण दोस्तों ने धीरे-धीरे एक पारदर्शी दूरी बना ली। इस पोस्ट पर जब मेरा इंटरव्यू शुरू हुआ तो मुझे एक मेंबर ने यहाँ तक कहा कि आप ने जनरल कैटेगरी में क्यों अप्लाई किया है।” 

“सब तरह के लोग हैं,” उन्होंने उसे सांत्वना देने की कोशिश की।

“मैं बी.ए.में फ़र्स्ट क्लास, एम.ए. में गोल्ड मेडलिस्ट, जे.आर.एफ़, पीएच.डी. सब कुछ... क्यों अप्लाई करूँ रिज़र्व्ड केटेगरी से? इसका मतलब तो ये कि आरक्षण न हो तो ये हमें वहाँ घुसने ही नहीं देंगे। आख़िर हमारा दोष क्या है… प्रोफेसर त्रिपाठी तक जो मेरे सुपरवाइज़र थे, चुप बैठे रहे। प्रोफेसर उपाध्याय ने मेरा पक्ष लिया और फिर वाइस चांसलर प्रो. खान ने। बाद में पता चला कि दो मेम्बर्स ने ‘डिसेन्ट नोट’ लिखने तक की धमकी दी वी. सी. को, पर वाइस चांसलर भी अड़ गए। वाईस चांसलर ने कहा लिख दीजिए। प्रो. उपाध्याय ने भी वाईस चांसलर से सहमति जताई...और यह सब उस बास्टर्ड की वज़ह से हुआ।"

“इस विचार से ऊपर उठना शुरू करो कि सब दलित अच्छे और ग़ैर दलित बुरे हैं। बेशक, हमारे कुछ कमिटमेंट हैं, कुछ जवाबदेही पर वह इंसान के प्रति होनी चाहिए। अच्छा वह कहाँ गया फिर?” दीपंकर ने पाँव फैलाते हुए पूछा।

“नहीं पता मुझे, मैंने उसे लात मार कर भगा दिया। कहता था मैं तुम्हें प्यार करता हूँ, पर हमें शादी तो ये कठोर समाज करने नहीं देगा। चाहे किसी से भी शादी कर लूँ मैं, पर तुम मेरी ज़िंदगी में हमेशा रहोगी... मतलब क्या है इस का...मीन्स कॉन्क्यूबाईन, मतलब रखैल बना कर रखोगे मुझे।” 

"घटिया होगा कोई, अच्छा हुआ छूट गया," दीपंकर ने दिलासा देने का प्रयास किया। 

"हाँ बहुत नीच, कुत्ता, कमीना, कास्टियस्ट था." रम्या ग़ुस्से से काँप रही थी। दीपंकर ने रोका नहीं। ये मवाद निकलना ज़रूरी था। 

“बुरा न मानो तो एक बात पूछूँ, ख़ुद से पूछना, क्या तुम उसे सच में बहुत प्यार करती थी, मुझे पता नहीं क्यों ऐसा लगता है कि शायद ऐसा नहीं था, शायद ये एक कांट्रेक्ट जैसा था, कहीं तुम अपनी जाति से, अपनी पुरानी पहचान से छुटकारा तो नहीं चाहती थी?” दीपंकर शायद इतनी कड़वी बात कहना तो नहीं चाहते थे, पर कह ही गए। उन्हें यह कहना शायद ज़रूरी लगा। इतना सुन कर रम्या की आँखों में आँसू भर आये। 

"काश तुम अपनी जाति की पहचान ना छिपाती, तब तुम्हें ऐसा लड़का मिलता, शायद कोई सवर्ण भी, जो तुम्हारी जाति के कारण तुम्हें नहीं तौलता, पर अफ़सोस कि मयंक ऐसा नहीं था। अगर तुम जाति न छिपाती तो तुम्हारा जनरल सीट पर हुआ सेलेक्शन भी, दूसरों के लिए मिसाल बनता। जब तक तुम्हारे-हमारे जैसे लोग जाति छिपा कर रहेंगे, तब तक हमारी पुरानी छवि कभी नहीं टूटेगी। हम ऐसे ही रिजेक्टेड होते रहेंगे समाज में।"

“ओह नो…!” वह रोने लगी और उस ने पहले अपना मफ़लर उतार कर फेंका, फिर अपना जैकेट और फिर स्वेटर भी उतार कर बेड पर फेंक दिया। उन्होंने उठ कर कमरे का दरवाज़ा आधा बंद कर दिया और हीटर ऑन कर दिया। अब वह सिर्फ़ पूरी बाज़ू की टी-शर्ट में थी। उस की आँखों से आँसू बहे जा रहे थे। दीपंकर ने उसे गले लगाया तो जैसे उस के सब्र का बाँध ही टूट गया और वह फूट-फूट कर रोने लगी। 

कुछ देर बाद दीपंकर ने उसके जूते उतार कर उसे बेड पर लिटा दिया और रजाई खोल कर उस पर डाल दी। वह दरवाज़ा खोल कर दूसरे कमरे में चले गए। कुछ देर बाद, जब वह लौटे तो रम्या रजाई ओढ़ कर निश्चिंत सो रही थी। वह लौट कर किचन में गए और अपने लिए चाय बनाई। वहीं ड्राइंग रूम में वह बैठ गए, शिमला और बॉक्सर के साथ खेलते रहे कुछ देर, फिर अश्वेत लेखिका टोनी मोरिसन का उपन्यास "बिलवेड" उठा कर पढ़ने लगे। 

लगभग साढ़े बारह बजे, रम्या उठ कर बाहर ड्राइंग रूम में आई। काफ़ी तरोताज़ा महसूस कर रही थी वह। सोफ़े पर बैठे दीपंकर की गोद में सिर रख कर वह पाँव मोड़ कर लेट गई– “आप बहुत ही अच्छे हैं।” 

उन्होंने उस के बालों में हाथ फेरना शुरू किया और कहा – “अंदर चलो यहाँ सर्दी है।" 

उन्होंने उसे उठाया और अंदर वाले कमरे में ले गए और उसे रजाई में ढँककर फिर से लिटा दिया। सामने बनी लकड़ी की आलमारी से उन्होंने दो बहुत कलात्मक, गोल गिलास और कोन्याक निकाली, जिसे वे फ्रांस से ख़रीद कर लाए थे। दोनों गिलासों में उन्होंने थोड़ी-थोड़ी कोन्याक डाल दी और एक गिलास रम्या को थमा दिया।"कोन्याक है, फ्रांस की है," गिलास ले कर बेड के दूसरी तरफ़ से वह भी रजाई में घुस गए। 

“खाना नहीं है घर में, बाहर चलेंगे। पन्द्रह मिनट मैं कमर सीधी कर लूँ,” कहते हुए उन्होंने रम्या को बाँहों में भर लिया। रम्या उनसे  लिपट गई। 

“आप से लगाव महसूस करने लगी हूँ,” रम्या ने बहुत स्पष्ट और दृढ़ शब्दों में कहा। यह बात वह कुछ वक़्त पहले ही कह देना चाहती थी, पर कुछ था, जो रोक देता था उसे। पहली बार जब उस ने उन्हें देखा और सुना था, तभी उसके दिल ने उसे अपनी सहमति दे दी थी, पर उसने फिर भी थोड़ा और वक़्त लिया, अपने मन को और उनके व्यवहार को समझने के लिए।

दीपंकर कुछ पल अपलक, किंकर्त्तव्यविमूढ़ से, उस के चेहरे को पढ़ते रहे– “अभी थोड़ा और वक़्त लो।” उन्होंने उस के होठों को चूम लिया। पर दोनों ही इस से आगे नहीं बढ़ सके उस दिन। आगे बढ़ने में जैसे अब भी कोई हिचक थी शायद, दोनों ही तरफ़। 

आधे घंटे बाद वे दोनों कॉलोनी के पास वाली स्लम से गुज़र रहे थे। वह जानबूझ कर उसे इस तरफ़ लाए थे। यहाँ लोग इस सर्दी में भी पानी के लिए लड़ रहे थे, एक दूसरे को गालियाँ दे रहे थे। पानी का एक टैंक वहाँ खड़ा था, जिस पर मोटे अक्षरों में क्षेत्रीय विधायक का नाम लिखा था। ये चेहरे निस्तेज थे, आँखों में पीलापन और आवाज़ में कर्कशता थी। कुपोषण की वज़ह से बीमारियों का अड्डा थी यह बस्ती। इंसानों की ही बस्ती थी यह भी। रम्या के चेहरे पर घृणा थी। 

“कितने गंदे रहते हैं ये!” रम्या ने नाक-भौं सिकोड़ी। काफ़ी बच-बच कर चल रही थी वह, कीचड़ से, पानी से, लोगों से। 

उस को ऐसा करते देख उन्हें कोई आश्चर्य नहीं हुआ। वह जानते थे कि जाति एक सच है परंतु उस के भीतर वर्ग भी साँस लेता है, किसी गर्भस्थ शिशु की तरह। 

“जब तक ये नहीं जागेंगे, तब तक कुछ बदलने वाला नहीं। इन को जगाने का काम हमारा है रम्या। ये जवाबदेही है दलितों के मध्यवर्ग की।” 

“उठिए, क्या सोच ही रहे हैं तब से, लंच पर नहीं चलना,” जाने कब रम्या कमरे में आ गई। वे अतीत के गलियारे से लौट आए।

यह एक छोटा सा पहाड़ी गाँव था, बामुश्किल सौ घर, पर सभी घरों में कुछ कमरे पर्यटकों के लिए बनवा लिए हैं। घर का खाना मिलता है। घर के जैसा ही अपनापन और कोई टोकाटाकी नहीं। बस खाने का बताना होता है, अगर कोई विशेष इच्छा हो, वरना वे ख़ुद ही अपनी मर्ज़ी से बना कर गर्मागर्म खिला देते हैं। आधुनिक सुविधाएँ लगभग सभी हैं पर मारकाट और आपाधापी नहीं है। 

“मैंने घर के मालिक को कहा कि हम खाने वाले कमरे में ही लंच लेंगे...अब उठिए।” रम्या उन की बगलों में हाथ फँसाकर उठाते हुए फुसफुसाई– "और उस के बाद हम...!"

“उस के बाद?” उन्होंने खड़े होते हुए उसके मुँह को चूम लिया। 

“उस के बाद हम बाहर चलेंगे, बाहर बर्फ़ गिरने वाली है। मकान-मालिक ने बताया कि कहीं दूर न जाइएगा।” 

“उस के बाद!” 

“उस के बाद हम लौट आएँगे।” रम्या उन की पीठ से लिपट गई – "अपने रूम में।"

“उस के बाद।” 

“उस के बाद आपका सिर,” वह हँस पड़ी। 

“नहीं बताओ ना, उस के बाद क्या?” दीपंकर ने रुआँसे होने का अभिनय करते हुए रम्या के कंधों को पकड़ लिया। 

उन्हें ऐसा करते देख वह मुस्कुरा कर बोली– “उस के बाद...स्विट्ज़रलैंड...पैराडाइज़ रीगेन...स्वर्ग!” 

दोनों गलियारा पार कर भोजन कक्ष में पहुँच गए। वहाँ दो परिवार और थे। एक नवविवाहित जोड़ा था और दूसरे के साथ तीन-चार साल की बच्ची थी। सभी ने एक-दूसरे को अभिवादन किया। इस घर में यही तीन मेहमान थे और पिछले चार दिनों में उनके बीच थोड़ी-बहुत बातचीत हुई थी, पर एक सीमा तक। किसी ने किसी से कुछ व्यक्तिगत नहीं पूछा। 

वे लोग खाना खा रहे थे और ये दोनों अपनी बारी का इंतज़ार करने लगे। यहाँ काफ़ी सर्दी थी। हवा के साथ कोहरा भीतर तक आ गया था। रम्या ने मफ़लर गले पर ठीक से लपेटा और उन्होंने अपने दोनों हाथ ओवरकोट की लंबी जेबों में डाल लिए। 

कुछ देर बाद दोनों बाहर निकले। बाहर दूर तक हरियाली ही हरियाली थी। पैदल चलते हुए पाँच मिनट बाद वे नदी के पास पहुँच गए। यहाँ हवा और भी ठंडी थी। नदी की रेत से थोड़ा आगे बढ़ उन्होंने नदी के पानी में कलाई तक हाथ भिगो दिए। 

“क्या कर रहे हैं, सर्दी लग जाएगी।” 

“इस नदी के मन को महसूस कर रहा हूँ,” दीपंकर ने रम्या की आँखों में झाँकते हुए कहा। 

"ऐसे महसूस नहीं होगा, आप को भीतर उतरना होगा, इतनी हिम्मत है आप में? आप बहुत डरपोक हैं, ऐसे ही मन महसूस करते रहिये बाहर खड़े हो कर," इतना कह कर रम्या आगे बढ़ गई, पुल की तरफ़। 

आधे घंटे बाद हल्की बर्फ़ गिरने लगी तो दोनों कमरे पर लौट आए। जब वे होटल के दरवाज़े पर पहुँचे, तब तक तेज़ हो गई थी बर्फ़बारी। उन्होंने आते ही इलेक्ट्रिक केतली पर पानी उबाला और दोनों के लिए चाय बनाई। 

कमरा गर्म था। रम्या उठी और उस ने कमरे के दरवाज़े की कुंडी लगा दी। बाहर से ठंडक आ रही थी। उस ने हीटर ऑन कर दिया। अब दोनों को उस पल का इंतज़ार था, जिस में "कुछ" घटित होना था, पर कब और किस तरह– ये दोनों ही नहीं जानते थे। दोनों चुपचाप चाय पीते रहे। बाहर से हवा की तेज़ आवाज़ें आती रही। 

इस बीच उन्होंने ओवरकोट उतार कर हैंगर में टाँग दिया। रम्या ने मफ़लर और जैकट उतार दी। वे फिर चाय पीने लगे। दोनों ने ठीक एक ही वक़्त जूते और मोज़े उतारने का चुना और ऐसा करते देख, मुस्कुरा गए। 

दोनों आमने-सामने की कुर्सियों पर थे। आज पहली बार उन्होंने रम्या को ध्यान से देखा। उस का चेहरा थोड़ा लम्बा, गालों की हड्डी उभरी हुई, नाक लम्बी और आँखें कुछ छोटी थीं, पर ज़्यादा छोटी नहीं, बहुत साफ़ और चमकदार। उस का निचला होंठ थोड़ा उठा हुआ था और भरा-भरा। उस के गेहुँए रंग में पर्याप्त चमक थी। 

“मैं आप को प्रेम करने लगी हूँ,” उन्हें ऐसे घूरते देख, आज रम्या ने फिर दोहराया। 

“हम्म...वे उठ खड़े हुए और रम्या का हाथ पकड़ कर उठाया। उनके कानों में बज रहा था– डरपोक, डरपोक, डरपोक। उससे लिपट कर वे उसे बुरी तरह चूमने लगे। कुछ देर बाद वे थोड़ा पीछे हटे और उन्होंने बहुत तेज़ी से अपनी कमीज़ के बटन खोले और कमीज़ उतार कर एक तरफ़ फेंक दी। पेंट की बैल्ट खोली और पेंट भी उतार फेंकी, फिर अंतःवस्त्र भी। अब वह एकदम निर्वस्त्र थे। कुछ क्षण वह उन्हें देखती रही और फिर उनसे  लिपट गयी। वह उन्हें बुरी तरह चूम रही थी और उनका शरीर तन गया, कठोरता से। 

“अब तुम उतारो।” 

“नहीं आप।” रम्या शर्मा गयी और उनके गले लग गई। 

“पहली बार तुम ख़ुद उतारो ये आवरण।” 

और सच में वह दृढ़ता से खड़े रहे। कोई हरकत नहीं की उन्होंने अपने हाथों से। रम्या कुछ देर उन्हें चूमती रही, शायद इंतज़ार करती रही, उनके हथियार डालने का। 

अब एक हाथ दूर रम्या खड़ी थी और सकुचाते-सकुचाते अपनी कमीज़ उतार रही थी, फिर जींस भी। 

"अब ये तुम्हारी भी मर्ज़ी हुई रम्या," दीपंकर धीमे से बुदबुदाए और आगे बढ़ कर रम्या को बहुत प्रेम से गोद में उठा लिया। रम्या के बाक़ी कपड़े भी अब लकड़ी के गर्म फर्श पर पड़े थे। वह उसे निहार रहे थे। सच में, इतनी सुंदर देह, उन्होंने अब तक साक्षात कभी नहीं देखी थी, सिर्फ़ यूनानी मूर्तिशिल्पों के अलावा। वह मंत्रमुग्ध थे जैसे। हर अंग जैसे अपने रूप और आकार में सम्पूर्ण। 

उस के स्तनाग्र को उन्होंने मुँह में भर लिया। “दीपंकर...” रम्या की सुलगती आवाज़ उनके बहरे हो चुके कानों तक आई। 

उन्होंने बहुत प्यार से रम्या के पूरे शरीर पर हाथ फेरा, बहुत ही स्निग्ध त्वचा। 

"ओह माँ..." रम्या धीमी आवाज़ में चिल्लाई। दस मिनट बाद ही रम्या की साँसें तेज़ चलने लगी, शरीर तनाव में आया और वह निढाल हो गयी। रम्या के कान के पास दीपंकर धीमे से फुसफुसाए– ‘सुखद गर्म’ लगभग आधे घंटे दोनों बेसुध पड़े रहे, शायद सो ही गए। 

“दीपंकर, आप बहुत मासूम दिखते हैं, पर हैं नहीं, राक्षस हैं आप," रम्या उन की आँखों में आँख डाल कर बोली। "आप पहले पुरुष हैं जिसे मैंने इतना नज़दीक आने दिया।” रम्या ने चादर की तरफ़ इशारा किया, मुचड़ी हुई सफेद चादर लाल हो गयी थी, जगह-जगह से। “और आप की जि़न्दगी में?"

इस सवाल से पशोपेश में पड़ गए दीपंकर। कुछ पल चुप बैठे रहे, फिर ऊँगलियाँ चटकाने लगे। वह तय नहीं कर पा रहे थे कि क्या कहें? 

“ये सवाल बिल्कुल निरर्थक है,” उन्होंने अपने पाँवों पर कम्बल डाल लिया। हल्की सर्दी महसूस होने लगी थी उन्हें। 
“मैं सिर्फ़ इतना कह सकता हूँ कि पिछले चार महीनों से, जब से तुम आयी, मेरी ज़िंदगी में कोई और नहीं है।” 

“मुझे यह सच सुन कर अच्छा लगा,” रम्या उनके पास सरकती हुई बुदबुदाई। 

“एक सच और कहूँगा… इतनी संपूर्ण लड़की मैंने आज पहली बार ज़िंदगी में देखी। तुम संसार की सुंदरतम लड़की हो, अभागा है तुम्हारा वह दोस्त।” 

“सच!” रम्या पुलकित हो गई।

“हाँ, आत्मा से कहता हूँ।” 

“अब उठो।” कहते हुए वह उठी और चादर उठाने लगी बेड से। चादर को उस ने बाथरूम में पानी से भरी बाल्टी में डाल दिया। दीपंकर ने उठ कर बैग से कोन्याक की बोतल निकाली और दो गिलासों में डाली। आधे घंटे बाद रम्या यह कह कर अपने कमरे में चली गई कि वह कुछ देर सोना चाहती है। दीपंकर ने अपना लैपटॉप निकाला और अपनी अधूरी कहानी को खोल कर बैठ गए। 

अगले दो-तीन दिन जाने कब फुर्र से उड़ गए, बिना आवाज़ के। उस दोपहर वे लंच के समय बाहर से लौट कर आए थे। उन्होंने देखा कि एक नया परिवार वहाँ खाने की मेज़ पर उपस्थित है। उन की उम्र पचपन से साठ के बीच थी। आदमी ख़ासा लम्बा, गोरा और रौबदार था। औरत पतली और गोरी थी। सर्दी से उस के दाँत किटकिटा जाते थे। वह भी वाश बेसिन पर हाथ धो कर उनके सामने बैठ गए। रम्या बाहर लॉन में माली से बात करने को रुक गयी थी। 
"नमस्कार जी..." उस नये आदमी ने बातचीत की शुरूआत की। 

"जी, मेरा नाम आर. सी. शर्मा है। मैं अंडर सेक्ट्ररी हूँ ऊर्जा मंत्रालय में। हमारी शादी की पच्चीसवीं सालगिरह है। सोचा कि पहाड़ पर मनाई जाए। मेरी वाईफ़ ने आज तक स्नोफ़ॉल नहीं देखा। इस बहाने स्नोफ़ॉल भी देख लेंगे, पर जी यहाँ तो बहुत ठंड है," कह कर अपनी पत्नी की तरफ़ देख कर वह हँसने लगे। 

"शादी की सालगिरह मुबारक हो शर्मा जी। सही वक़्त चुना है आप ने, रोज़ स्नोफ़ॉल हो रहा है आजकल," दीपंकर ने भी हँस कर जवाब दिया।

"जी आप का शुभ नाम?”

"दीपंकर... प्रो. दीपंकर"

"ओह तो आप प्रोफेसर हैं, हमारा बड़ा बेटा भी प्रोफेसर लग गया इस साल एक कॉलेज में...।"

ठीक उसी समय घर का मालिक एक लड़के के साथ उधर आ खड़ा हुआ। लड़के के हाथ में दो थालियाँ थीं जिन में खाना लगा हुआ था। 

"अरे शर्मा जी आप यहाँ!" रम्या ने भीतर आते हुए शर्मा जी की ओर देख कर चहकते हुए कहा। 

शर्मा जी और उन की पत्नी भी ख़ुशी से उठ कर खड़े हो गए। अजनबी शहर में अक़्सर कम जान-पहचान वाले लोग भी बहुत अपनेपन से मिलते हैं। 

रम्या ने दीपंकर की ओर देखा, वह मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे। "ये हमारे पड़ोसी हैं, वही शर्मा जी जिनके बारे में मैंने आप को एक बार बताया था," रम्या ने दीपंकर को बताया। 

शर्मा जी की पत्नी ने धीमे से शर्मा जी के कान में कुछ कहा तो वह ठठा कर हँस पड़े– "अरे भई ये बात तुम ख़ुद कह दो।" कुछ कहने की बजाय उन की पत्नी ने रोटी का कौर मुँह में डाल लिया। "ये शुरू की संकोची हैं। कह रही हैं कि जोड़ी बहुत अच्छी है। दोनों बहुत सुन्दर हैं राम जी और सीता जी की तरह।"

रम्या और दीपंकर यह सुन कर हँस पड़े।

"हम पति पत्नी नहीं हैं, दोस्त हैं मिसेज शर्मा, साथ आए हैं छुट्टियाँ मनाने," रम्या ने श्रीमती शर्मा की तरफ़ देख कर कहा। यह सुन कर एक पल को दोनों के चेहरे बदल गए पर जल्द ही उन्होंने ख़ुद को सँभाल लिया और खाना खाने लगे। घर का मालिक और नौकर लौट गए। कुछ ही देर में वह लड़का दो और खाने की थालियाँ ले आया और रख कर चला गया। 

शर्मा जी बातूनी आदमी थे और ज़्यादा देर चुप न रह सके– 

"आप की सही उम्र में नौकरी लग गई जी, जैसे हमारे बेटे की, आप ने तो देखा होगा उसे, वरना आजकल आरक्षण के दानव ने हमारे लिए छोड़ा ही क्या है।" शर्मा जी अब रम्या से मुख़ातिब हुए। "हैं जी, वो तो शुकर समझो कि कॉलेज के उस इन्टरव्यू पैनल में इन के ख़ास मौसा थे, वी.सी नॉमिनी। बस काम बन गया वरना सिर्फ़ एम.ए. और नेट पर कहाँ प्रोफेसरी मिलती है आजकल? तेईस साल का है अभी तो। अभी मौसा जी के रिटायरमेंट में चार साल बाक़ी हैं। देखो जी, हम तो उम्मीद कर रहे हैं कि छोटे बेटे की भी नैया वे पार करा ही जाएँगें," कौर चबाते हुए वे बोले। 

खाते-खाते दीपंकर का हाथ रुक गया– 
"आरक्षण को दानव मत कहिये शर्मा जी। क्या आप जातिवादी हैं?" 

"नहीं जी, हम तो जातिवाद के सख़्त ख़िलाफ़ हैं। हमारे ऑफ़िस के दो अफ़सर कोटे से हैं, पर हमारा उनके साथ खाना-पीना तक है। बस आरक्षण को हम ठीक नहीं समझते।" उन्होंने पीने के शब्द पर कुछ अतिरिक्त ज़ोर दिया और मुस्कुरा भी गए।

दीपंकर भी मुस्कुरा गए और खाने का कौर चबाते हुए बोले–

"क्या आप कोटे के किसी चपरासी या क्लर्क के साथ भी खा पी लेते हैं?"   

"अरे प्रोफेसर साहब, कैसी बातें करते हैं आप? स्टेटस भी कोई चीज़ होता है, ख़्याल रखना पड़ता है इन बातों का। यह कैसे मुमकिन है?"

"जी शर्मा जी इसीलिए तो मैंने कहा कि अगर आप जातिवाद के ख़िलाफ़ हैं तो आरक्षण को दानव मत कहिए, इसी की वज़ह से उन कोटे वाले अफ़सरों का स्टेटस बना हैं और आप और वे साथ बैठ कर खा-पी रहे हैं।" 

यह सुन कर शर्मा जी इस बार लम्बी चुप्पी खींच गए। वे ख़ामोशी से भोजन करने में व्यस्त हो गए। 

दीपंकर ने खीर की कटोरी उठाई और मुँह से लगा कर पी गए। उन्हें मग्न हो कर खाना खाते देख दीपंकर चुप नहीं रहे–

"शर्मा जी ऐसा नहीं है कि ये कोटे वाले उन जगहों पर नहीं हैं, जहाँ कोटा नहीं है। ये वहाँ भी हैं पर अपने काम के डर से अपनी जाति को छिपा कर, सवर्ण बने रहने को मजबूर हैं। फ़िल्म इण्डस्ट्री और व्यापार में ही मैं कई लोगों को जानता हूँ।" 

यह सुन कर भी शर्मा जी ने एक शब्द नहीं कहा और खाना खाते रहे।

"आरक्षण ही इस ऊँच-नीच को तोड़ेगा शर्मा जी। तभी आप को नए स्टेटस वाले नए लोग मिलेंगे। खीर ज़रूर खाइएगा शर्मा जी, बहुत टेस्टी है," कहते हुए दीपंकर उठ खड़े हुए। 

दीपंकर खाना खा चुके थे। उन्होंने ‘एक्सक्यूज़ मी’ कहा और वाश बेसिन पर हाथ धोने चले गए। हाथ धो कर वे सीधे अपने कमरे में चले गए। मन में थोड़ा खिन्न भाव आ ही गया था, इसलिए उन्होंने कमरे में जाना ही उचित समझा। 

उन को हाथ धो कर कमरे की तरफ़ जाते रम्या ने देख लिया। दो–एक ग्रास खाने के बाद वह भी उठ गयी। 

"बेटा एक बात पूछूँ, बुरा तो नहीं मानोगी ना तुम," शर्मा जी ने रम्या से आत्मीय रिश्ता बनाते हुए पूछा। 

"नहीं-नहीं पूछिए," रम्या ने खड़े-खड़े ही कहा। 

शर्मा जी ने गला खँखार कर धीमी आवाज़ में पूछा– "कहीं ये आप के दोस्त हरिजन तो नहीं हैं?" 

रम्या आत्मविश्वास से मुस्कुराई– "नहीं शर्मा जी, वे हरिजन नहीं हैं, दलित हैं और मैं भी ब्राह्मण नहीं हूँ, मैं भी दलित ही हूँ।" 

दोनों पति-पत्नी अवाक हो कर आत्मविश्वास से दमकता उस का चेहरा देखने लगे। 

"अच्छा नमस्कार। एन्जॉय योअर हॉलीडेज़!"

लगभग सात दिन वे वहाँ रहे और फिर लौट आए। इस बीच, इधर-उधर घूमते हुए या खाने की मेज़ पर कई बार शर्मा दम्पत्ति मिले और आपस में सामान्य शिष्टाचार की बातचीत भी हुई, हँसी मज़ाक भी हुआ। रम्या के कॉलेज का शीतावकाश ख़त्म हो गया था। इधर आसमान का सर्द गोला अपनी राशि बदल रहा था और अब कुछ गर्म होने लगा; सुखद गर्म।

“सुखद गर्म” रम्या तरंगित हो जाती यह सोच कर कि दीपंकर ने उस के लिए यह कहा था। बार-बार वह सोचती कि आख़िर क्यों दीपंकर की कही बात इतना असर पैदा कर देती है। वह ऊर्जा से भर जाती है, मुस्कुराने लगती है, शरीर में तरंगे उठने लगती है। ऐसा उसे कभी नहीं हुआ था। 

“तुम मेरा वही खाँचा हो, अभीप्सित, चिर-आंकाक्षित जिस की तलाश मुझे थी, इसी में समा सकता हूँ मैं पूरी तरह!” कॉलेज खुलने से ठीक एक दिन पहले कहा था दीपंकर ने, और यह बात भी, हफ़्ते भर तक, उस के पाँव की अँगुलियों तक में मचलती रही। 

मकर सक्रांति के दिन धूप अच्छी खिली थी और बॉक्सर उछल कूद मचा रहा था। शिमला सोफ़े पर बैठी देख रही थी उसे। उन्हें घंटे भर बाद शाहजहाँ पार्क निकलना था, जहाँ एक गैट-टुगेदर आयोजित की गई थी। सुलेखा गुप्ता ने उन्हें दस दिन पहले ही सपरिवार आमंत्रित किया था। सुलेखा एडमिन भी थी और कार्यक्रम की संयोजक भी। 

वह रम्या का इंतज़ार कर रहे थे और वह किसी भी क्षण पहुँचने वाली थी, ऐसा उसने फोन पर उन्हें बताया। वह रम्या को जानबूझ कर वहाँ ले जा रहे थे। 

“इन्हें क्यों ले आए आप?” रम्या को साथ देख उन्हें एक तरफ़ ले जाकर धीमी आवाज़ में सुलेखा बोली, “वह सवर्ण हैं!”

“तुम्हीं ने तो कहा था कि सपरिवार आईये,” उन्होंने कहा तो सुलेखा निरुत्तर हो गई। 

लगभग पन्द्रह लड़कियाँ आई थीं वहाँ। सभी कुछ ना कुछ बना कर लाई थीं। खाना एक तरफ़ रख दिया गया।

“आप जानते ही हैं आज हमारे साथ प्रो. दीपंकर सर हैं, प्रसिद्ध लेखक और साथ आई है, डॉ. रम्या भारद्वाज,” सुलेखा ने सभी लड़कियों को संबोधित करते हुए कहा। 

“डॉ. रम्या भारद्वाज नहीं, सिर्फ़ डॉ. रम्या, मैं भी दलित ही हूँ,” रम्या ने सुलेखा को बीच में ही टोक दिया। 

“ओह सच मैम...कॉलेज में कभी किसी ने बताया नहीं। ख़ैर, सर से हमारा अनुरोध है कि सर कुछ कहें यहाँ पर," सुलेखा ने अपनी बात पूरी की। 

“यहाँ भी भाषण?” उन्होंने हँसते हुए सुलेखा की तरफ़ देखा। 

“भाषण नहीं सर दो शब्द,” सुलेखा मुस्कुराई। 

“दोस्तों यह वाक़ई भाषण का वक़्त नहीं है। हम सभी एक दूसरे से मिलने आए हैं, एक शृंखला बनाने। यह बनना बहुत ज़रूरी है। बस यही कहूँगा कि हमारा संघर्ष इस बात के लिए होना चाहिए कि हमें हमारी पहचान के साथ इज़्ज़त मिले। आज बस इतना ही ....धन्यवाद।” 

सभी लड़कियों ने ख़ूब तालियाँ बजाई और फिर कुछ ने गाने भी गा कर सुनाए। समूह में तीन-चार आदिवासी समुदाय की लड़कियाँ भी थीं, उन्होंने सब के साथ मिल कर अपना पारंपरिक नृत्य भी किया। एक लड़की सुनयना यादव ने चैती और दूसरी ने कजरी सुनाई। हवा में सर्दी थी, पर धूप की ऊष्मा ने उसे बेअसर सा कर दिया था। कुछ देर बाद सभी ने आपस में बाँट कर खाना खाया। दीपंकर भी आलू-गोभी की सब्ज़ी और पराँठे लाए थे। 

उनके टिफ़िन को रम्या ने खोला। 

“सर खाना आप ने बनाया या रम्या मैम ने?” सुलेखा ने पूछा। 

“भई सब्ज़ी मैंने बनाई है और पराँठे मेरी मेड ने,” उन्होंने जवाब दिया। 

सभी की रुचि उनकी बनाई सब्ज़ी में थी। सभी ने उन की बनाई सब्जी को थोड़ा-थोड़ा खाया और प्रशंसा की। 

रम्या के चेहरे पर आज अपूर्व आभा थी, आश्वस्ति भी। 
 खाना खा कर कुछ दूर तक रम्या और दीपंकर टहलने निकल गए। रम्या ने पीकॉक ब्लू रंग का रैप अराउंड पहना था और ऊपर एक ऊनी कोट। आज वह और भी सुंदर लग रही थी, शायद उस की सुंदरता इन दिनों कुछ और अधिक बढ़ गई थी। दीपंकर ने उससे कहा भी– “बहुत सुंदर लग रही हो।” 

इतरा कर वह बोली– “जानती हूँ... मैं सुंदर हूँ।” 

कुछ दूर चलने के बाद रम्या ने धीमे से पूछा– “आप भी मुझे प्यार करते हैं ना?” और उनके हाथ से लिपट कर वह चलने लगी। 

दीपंकर ने उस हाथ में पकड़ी पानी की बोतल को दूसरे हाथ में ले लिया– “हाँ मुझे तुम यक़ीनन बहुत पसंद हो, बहुत ज़्यादा और अंतिम। जीवन भर हम अपने ‘आत्म’ के उस अंश को ही तलाशते रहते हैं, जिस के साथ होने पर हमें अपना ही होना लगे। तुम मेरे लिए, मेरा वही सेल्फ़ हो।” 

रम्या ने उनके कंधे पर सिर सटा दिया। 

“बहुत पहले मैंने तय किया था कि मैं सिर्फ़ दिमाग़ से चलूँगी और अब जा कर पाया कि बड़ी बेवकूफ़ी हो गयी। आप से जाना, आप की ज़िंदगी से कि भारी नुक़्सान हो गया। दिल से चलना था मुझे। वह नहीं थी मैं भीतर से… अफ़सोस कि मैं ख़ुद को बहुत देर में पहचान सकी। आप को पाया तो जैसे ख़ुद की उस सोच को सत्यापित किया, जो बेशक्ल सा उमड़ता-घुमड़ता तो था...पर पहचान में नहीं आता था,उसे धीरे-धीरे एक आकृति मिलने लगी, उस के नैन नक़्श दिखने लगे। अपने दलित होने को स्वीकार करने की हिम्मत मुझे मिली। ये काम आप की बातों, आप के बिहेवियर, कहानियों और उपन्यासों ने किया।” 

दीपंकर ख़ामोशी से उस की बातें सुनते रहे और चलते रहे। साथ की क्यारियों में फूल खिलने लगे थे। कुछ अभी खिलने की प्रक्रिया में थे। कुछ दूर चलने के बाद वे रुके और उन्होंने खिले हुए फूलों की पँखुरियों पर अँगुलियाँ फेरी, जैसे प्यार से किसी बच्चे के गाल पर फेरते हैं –

"तो आख़िर तुम्हारा भी जीते जी निर्वाण हो ही गया।" दीपंकर मुस्कुराए और रम्या के सिर पर हल्की चपत लगाई। 
 

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

इस विशेषांक में
कविता
गीत-नवगीत
साहित्यिक आलेख
शोध निबन्ध
कहानी
आत्मकथा
उपन्यास
लघुकथा
सामाजिक आलेख
बात-चीत
ऑडिओ
विडिओ