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05.31.2008
 

झाँय झाँय करती दुपहरिया
[उस जनपद का कवि हूँ से]
 
त्रिलोचन शास्त्री
चयन : डॉ. शैलजा सक्सेना


झाँय झाँय करती दुपहरिया नाच रही थी

जलती हुई। भौर सी गर्मी की पगडंडी

मुझे ले गयी आमों की बारी में। की थी

नहीं अधिक की आशा। पा कर छाया ठण्डी,

आँख मूँद कर सोचा मन में, स्वर्ग यही है।

तब तक देखा तुम को। इस उस पेड़ के तले

आम बीनते। अनुभव किया, पुकार रही है

प्यास, सुखा कर तालू को। फिर पैर ले चले

पास तुम्हार। जा कर बोला, प्यास लगी है।

’कौन’, ’कहाँ से’ पूछा तुमने, और कहा, ’अब

यहाँ तुम्हें खाने को क्या दूँ? साफ़ जगी है

पपड़ी ओठों पर। ढेसर हैं गिरे आम सब।’

ढेसर आम खिला कर पानी मुझे पिलाया।

ये वे बातें — ’फिर आना’ कब मिला मिलाया।


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