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05.31.2008
 

अपराजेय
 ['दिगन्त' से]
त्रिलोचन शास्त्री
चयन : डॉ. शैलजा सक्सेना


हिन्दी की कविता, उनकी कविता है जिन की

साँसों को आराम नहीं था, और जिन्होंने

सारा जीवन लगा दिया कल्मष को धोने

में समाज के, नहीं काम करने में घिन की

 

कभी किसी दिन। हिन्दी में सतरंगी आभा

विभव भूति की नहीं मिलेगी; जन जीवन के

चित्र मिलेंगे, घर के वन के सब के मन के

भाव मिलेंगे, बोये हुए खेत में डाभा

 

जैसे एक साथ आता है, कुछ ऐसे ही

वातावरण एक से भावों से छा जाता

है, फिर प्राणों प्राणों में एकत्व दिखाता।

नेह उमड़ आये तो दूर कहाँ है नेही।

 

भाव उन्हीं का सब का है जो थे अभावमय,

पर अभाव से दबे नहीं जागे स्वभावमय।


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