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05.31.2008
 

आरर- डाल 
[
'ताप के ताये हुए दिन' से] 
त्रिलोचन शास्त्री
चयन : डॉ. शैलजा सक्सेना


सचमुच, इधर तुम्हारी याद तो नहीं आयी,

झूठ क्या कहूँ। पूरे दिन मशीन पर खटना,

बासे पर आकर पड़ जान और कमाई

का हिसाब जोड़ना, बराबर चित्त उचटना।

इस उस पर मन दौड़ाना। फिर उठ कर रोटी

करना। कभी नम से कभी साग से खाना।

आरर डाल नौकरी है। यह बिलकुल खोटी

है। इसका कुछ ठीक नहीं है आना जाना।

आये दिन की बात है। वहाँ टोटा टोटा

छोड़ और क्या था। किस दिन क्या बेचा-कीना।

कमी अपार कमी का ही था अपना कोटा,

नित्य कुँआ खोदना तब कहीं पानी पीना।

धीरज धरो, आज कल करते तब आऊँगा,

जब देखूँगा अपने पर कुछ कर पाऊँगा।


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