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05.31.2008
 

भूमिका - केदारनाथ सिंह
(त्रिलोचन की प्रतिनिधि कविताएँ)
प्रेषक : डॉ. शैलजा सक्सेना


 

(यह भूमिका १९८५ के वर्ष में लिखी गयी थी)

 

त्रिलोचन का काव्य-व्यक्तित्व लगभग पचास वर्षों के लम्बे काल-विस्तार में फैला हुआ है। परन्तु यह तथ्य कि वे हमारे समय के एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कवि हैं लगभग एक अद्वितीय कवि अभी पिछले कुछ वर्षों में उभर-कर सामने आया है और उनके प्रत्येक नये काव्य-संकलन के साथ और गहरा तथा और पुष्ट होता गया है। इसका एक बहुत सीधा और स्थूल कारण तो यह है कि उनकी बहुत-सी महत्त्वपूर्ण काव्य-कृतियाँ पिछले पाँच-छह वर्षों में ही पाठकों के सामने आयी हैं। पर जैसा कि मैंने कहा, यह सिर्फ एक स्थूल कारण है। असली कारण है समकालीन हिन्दी-कविता पाठकों की अभिरुचि में धीरे-धीरे घटित होनेवाला मूलभूत परिवर्त्तन। हमारे समय के सामाजिक यथार्थ की प्रक्रिया के समानान्तर चुपचाप घटित होनेवाले इस परिवर्त्तन की छानबीन अलग से की जानी चाहिए और जाहिर है, ऐसा करते समय हमें कविता से बाहर की सचाइयों की पड़ताल भी करनी होगी। परन्तु यहाँ न तो उसकी अपेक्षा है, न ही अवकाश। पर कुछ बातों को साफ़-साफ़ लक्ष्य किया जा सकता है जैसे यह कि पिछले कुछ वर्षों में हमारी सांस्कृतिक चेतना पर पश्चिम का औपनिवेशिक दबाव कम हुआ है, आधुनिकतावाद द्वारा स्थापित तथा प्रस्तावित बहुत-से काव्यमूल्य सन्दिग्ध या अस्वीकार्य लगने लगे हैं और कुल मिलाकर कविता में और किसी हद तक साहित्य की अन्य विधाओं में भी यथार्थ के मूल स्रोतों से जुड़ने की आकांक्षा प्रबल हुई है। फलतः नगर-केन्द्रित आधुनिक सृजनशीलता और हमारी ग्रामोन्मुख जातीय सृजन-चेतना के बीच का अन्तराल कम हुआ है। इसी बदले हुए माहौल में त्रिलोचन की कविता ने अपनी अर्थवत्ता नये सिरे अर्जित की है और बृहत्तर पाठक-समुदाय का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया है।

त्रिलोचन एक विषम धरातलवाले कवि हैं। साथ ही उनके रचानात्मक व्यक्तित्व में एक विचित्र विरोधाभास भी दिखायी पड़ता है। एक ओर यदि उनके यहाँ गाँव की धरती का-सा ऊबड़खाबड़पन दिखायी पड़ेगा तो दूसरी ओर कला की दृष्टि से एक अद्‌भुत क्लासिकी कसाव या अनुशासन। सृजनात्मक अनुशासन का सबसे विलक्षण और रंगारंग रूप उनके सॉनेटों में दिखायी पड़ता है। शब्दों की जैसी मितव्ययिता और शिल्पगत कसाव उनके सॉनेटों मिलताहै, वैसा निराला को छोड़कर आधुनिक हिन्दी कविता में अन्यत्र दुर्लभ है। त्रिलोचन के सॉनेटों के बारे में बहुत कुछ कहा-सुना गया है। परन्तु इस महत्त्वपूर्ण तथ्य की ओर ध्यान कम दिया गया है कि सॉनेट जैसे विजातीय काव्यरूप को हिन्दी भाषा की सहज लय और संगीत में ढालकर त्रिलोचन ने एक ऐसी काव्य-विधा का आविष्कार किया है, जो लगभग हिन्दी की अपनी विरासत बन गयी है।

त्रिलोचन जितने मानव-संघर्ष के कवि हैं, उतने ही प्रकृति की लीला और सौन्दर्य के भी। इसीलिए प्रकृति बहुत गहराई तक उनकी कवित अमें रची-बसी है। प्रकृति के बारे में त्रिलोचन का दृष्टिकोण बहुत कुछउस ठेठ भारतीय किसान के दृष्टिकोण जैसा है जो कठिन श्रम के बीच भी उगते हुए पौधों की हरियाली को देखकर रोमांचित होता है। निराला की तरह त्रिलोचन ने भी पावस के अनेक चित्र अंकित किये हैं और बादलों के कठोर संगीत को अपनी अनेक कविताओं में पकड़ने की कोशिश की है। परन्तु ऐसा करते हुए वे किसी विलक्षण सौन्दर्य-लोक का निर्माण नहीम करते, बल्कि अपनी चेतना के किसी कोने में दबे हुए किसान का मानो आह्वान करते हैं – ’उठ किसन ओ, उठ किसान ओ, बादल घिर आये। प्रकृति और जीवन के प्रति यह किसान-सुलभ दृष्टि त्रिलोचन की एक ऐसी विशेषता है, जो सिर्फ़ उनकी अलग पहचान ही नहीं बनाती, बल्कि उनकी विश्व-दृष्टि को समझने की कुंजी भी हमें देती है।

लगभग यह मान लिया गया है कि त्रिलोचन एक अत्यन्त सहज-सरल कवि हैं बहुत कुछ अपने व्यक्तित्व की तरह ही। इससे एक बहुत सीधा-सा निष्कर्ष यह निकाल लिया गया है कि उनके यहाँ आधुनिक बोध की जटिलता का एकान्त अभाव है। जो लोग ऐसा मानते हैं, उनसे मैं आग्रह करूँगा की इस संकलन में छपी रैन-बसेरा कविता को ध्यान से पढ़ें। वस्तुतः त्रिलोचन एक समग्र चेतना के कवि हैं, जिनके अनुभव का एक छोर यदि चम्पा काले काले मच्छर नहीं चीन्हती जैसी सीधी-सरल कविता में दिखायी पड़ता है तो दूसरा रैन-बसेरा जैसी कविता की बहुस्तरीय बनावट में। वास्तविकता यह है कि त्रिलोचन की सहज-सरल-सी प्रतीत होनेवाली कविताओं को भी यदि ध्यान से देखा जाय तो उनकी तह में अनुभव की कई पर्तें खुलती दिखायी पड़ेंगी।

त्रिलोचन के यहाँ आत्मपरक कविताओं की संख्या बहुत अधिक है। अपने बारे में हिन्दी के शायद ही किसी कवि ने इतने रंगों में और इतनी कविताएँ लिखी हों। पर त्रिलोचन  की आत्मपरक कविताएँ किसी भी स्तर पर आत्मग्रस्त कविताएँ नहीं हैं और यह उनकी गहरी यथार्थ-दृष्टि और कलात्कम क्षमता का सबसे बड़ा प्रमाण है। त्रिलोचन अनुभव के इस धरातल तक पहुँचनए के लिए जिस  कौशल का इस्तेमाल करते हैं, वह खासतौर से ध्यान देने योग्य है। वे अपनी आत्मपरक कविताओं में त्रिलोचनका प्रयोग प्रायः अन्य पुरुष में करते हैं और इस तरह बड़ी कुशलता से अपने आत्मसे एक कलात्मक दूरी प्राप्त कर लेते हैं। अपने आत्मके प्रति यह गहरी  निर्मम दृष्टि उन्हें एक ऐसी शक्ति प्रदान करती है; जिसके चलते वे मानो अपनी ही धज्जियाँ उड़ाते हैं और फिर उनके मुँह से ऐसी बेलाग और तिलमिला देनेवाली पंक्ति निकलतई है – ’भीख माँगते उसी त्रिलोचन को देखा कल। अपने प्रति यह अचूक निर्मम दृष्टि समकालीन साहित्य में कम ही मिलेगी।

भाषा के प्रति त्रिलोचन एक बेहद सजग कवि हैं एक ऐसे कवि जो अपनी भाषा की समस्त गूँजों और अनुगूँजो को बखूबी जानते हैं और एक रचनाकार की हैसियत से उनके प्रति गहरा सम्मान का भाव रखते हैं। यही कारण है कि उनकी कविता में भाषा के विविध धरातल दिखायी पड़ते हैं। वे ठेठ अवध के कवि हैं और फलतः अवधी बोली की सर्जनात्मक क्षमाअ से खड़ी बोली को अधिक आत्मीय और अधिक व्यंजनाक्षम बनाने के आग्रही कवि भी। परन्तु वे लोकबोली और पण्डितों की भाषा के बीच कोई सुविधाजनक सेतु निर्मित करने की कोशिश कभी नहीं करते। इस मानी में उनके आदर्श तुलसीदास हैं, जहाँ कविता एक साथ बोली के सारे ठाट और अभिव्यक्ति की सारी परिचित-अपरिचित भंगिमाओं को अपने भीतर समेटकर चलती है। इसीलिए आप पायेंगे कि त्रिलोचन की कविता में बोली के अपरिचित शब्द जितनी सहजता से आते हैं, कई बार संस्कृत के कठिन और लगभग प्रवाहच्युत शब्द भी उतनी ही सहजता से कविता में प्रवेश करते हैं और चुपचाप अपनी जगह बना लेते हैं। वस्तुतः त्रिलोचन हिन्दी शब्द से जिस विपुल भाषिक सम्पदा का बोध होता है उसकी सम्पूर्णता को अपनी रचनाशीलता के विविध स्तरओं पर पकड़ने और उद्‌घाटित करनेवाले कवि हैं एक ऐसे कवि जिनके यहाँ भाषा की श्रेणियाँ नहीं बनायी जा सकती।

त्रिलोचन ने बहुत लिखा है। जहाँ तक मुझे ज्ञात है, उनका जितना प्रकाशित है, उतना या कदाचित्‌ उससे अधिक ही अप्रकाशित। जाहिर है; यहाँ केवल उनके प्रकाशित कृतित्व (धरतीसे तुम्हें सौंपता हूँ तक) को ही चयन का आधार बनाया गया है। एक ऐसे कवि के सम्पूर्ण कृतित्व से उसकी प्रतिनिधि कविताओं को छाँट निकालना एक कठिन काम है और चुनौती-भरा भी। मैं यहाँ स्पष्ट करूँ कि इस संकलन को तैयार करने में मेरी पहली कसौटी मेरी अपनी पसन्द ही रही है। मैंने यहाँ कवि के लगभग पचास वर्षों के विस्तार में फैले कृतित्व से उसके सर्वोत्तम को छाँटकर अलग कर लिया है, ऐसा दावा मेरा कदापि नहीं है। हाँ, मैंने एक संकलनकर्ता की पूरी जिम्मेदारी के साथ यह कोशिश ज़रूर की है कि इस पुस्तक के इस छोटे-से आकार में, त्रिलोचन की कविता के जितने रंग हैं, उनकी थोड़ी-बहुत प्रामाणिक झलक और आस्वाद पाठक को मिल सके।

 


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