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06.07.2008
 

श्रद्धाञ्जलि (हरिवंश राय बच्चन जी को)
नागेन्द्र दत्त वर्मा
प्रस्तुति : शकुन्तला बहादुर


खूब सजायी, खूब सँवारी मधुशाला बच्चन जी ने ।
"मधुबाला" "मधुकलश" लुटाया मस्ती से उस जनकवि ने ।।

जो भी आता छककर पीता लेकर हाला का प्याला ।
जाते जाते कहता जाता अमर रहे यह मधुशाला ।।

ककड़ी के खेतों से होकर जब देहाती स्वर आया ।
कवि ने उसमें भी जीवन का एक नया दर्शन पाया ।।

"निशा-निमंत्रण" दिया जगत को उन्मन भावों को लेकर ।
मिलता है "एकांत संगीत" में कवि का कुछ एकाकी स्वर ।।

"मधुशाला" तो सदा रहेगी नहीं रहा देने वाला ।
भावलोक से सबको देगा भरकर मदिरा का प्याला ।।

बच्चनजी तो अमर हुए पर उक्ति अभी तक सच उनकी ।
"पाठकगण हैं पीने वाले, पुस्तक मेरी मधुशाला"।।

सौम्य, सरलता और साधना की जीवित प्रतिमा वे थे ।
युवा-हृदय की ध़ड़कन थे वे, कोटि कोटि जन के प्रिय थे ।।

सादर नमन तुम्हें हे कविवर,स्नेहसुमन वर्षा करना ।
अपनी रचनाओं की धुन में मानस प्रवर पगा देना ।।


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