अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
10.16.2016


सम्पादकीय
सपना पूरा हुआ, पुस्तक बाज़ार.कॉम तैयार है
अक्तूबर (प्रथम अंक), 2016

प्रिय मित्रो,

आज बरसों का सपना साकार हो गया। पुस्तक बाज़ार.कॉम से अब पुस्तकें खरीदी जा सकती हैं। पुस्तक बाज़ार.कॉम की अपनी निर्मित फ़ोन ऐप (एंड्रॉयड) भी तैयार है जो कि गूगल प्ले से निःशुल्क डाउनलोड की जा सकती है। हालाँकि पीसी पर ई-पुस्तक पढ़ने के लिए अभी हम लोग "सोनी" के निःशुल्क ई-रीडर को डाउनलोड करने का परामर्श दे रहे हैं परन्तु पुस्तक बाज़ार के भविष्य के उद्देश्यों में अपने ई-रीडर के डिवेलेपमेंट की योजना है।

जब से मैंने ई-रीडर पर अँग्रेज़ी की पुस्तकें पढ़नी शुरू की थीं, तब से मन में यह प्रश्न बार-बार उठता था कि क्या यह हिन्दी की ई-पुस्तकों के लिए भी संभव हो पायेगा? लगभग पाँच वर्ष पहले हिन्दी पुस्तकों के एक प्रमुख आर्थिक संसाधन सम्पन्न प्रकाशक ने घोषणा की थी कि वह शीघ्र ही हिन्दी की ई-पुस्तकें बाज़ार में ला रहे हैं। मैं अभी तक उनकी प्रतीक्षा कर रहा हूँ। इसके वास्तविक कारण क्या रहे होंगे, मैं तो अनुमान ही लगा सकता हूँ, जान नहीं सकता। परन्तु इस दौरान, स्वयं इस दिशा में प्रयास करने का मन में विचार भी उठा। उन दिनों अभी टैबलेट मार्केट में नहीं आया था। ई-पुस्तक केवल ई-रीडर या कंप्यूटर पर ही पढ़ी जा सकती थी। इस दिशा में बहुत देर तक अध्ययन करने के बाद प्रयास भी शुरू किए। बाज़ार में मिल रहे प्रोग्राम हिन्दी के फ़ांट के लिए उपयुक्त नहीं थे। इस समस्या का हल भी निकाल लिया। अगला क़दम वेबसाईट बनाने का था। साहित्य कुंज पीएचपी से पहले आयी एचटीएमएल पर आधारित है। सोचा पुस्तक बाज़ार.कॉम को पीएचपी में बनाना सही रहेगा। अगला चरण इस प्रोग्रामिंग को सीखने का था। ई-पुस्तक प्रकाशन के पहले विचार के बाद से तीन वर्ष बीत चुके थे।

उन दिनों में हिन्दी टाईम्स में संपादक का काम भी कर रहा था और हिन्दी टाईम्स की वेबसाईट भी मेरी देख-रेख में बन रही थी। इसी कारण मेरा परिचय २१जीफ़ॉक्स के मालिक स्टेनले परेरा से बढ़ा। उन्हें मालूम हुआ कि मैं कई वर्षों से अपने बल-बूते पर साहित्य कुंज चला रहा हूँ। एक दिन चाय के प्यालों के बीच उन्होंने कहा कि वह साहित्य कुंज के लिए कुछ करना चाहते हैं। मेरा उत्तर था कि स्टेनले जी प्रोग्रामिंग आपका व्यवसाय है और साहित्य कुंज मेरा शौक़। आपको इससे कोई आर्थिक लाभ नहीं होने वाला। उन्होंने जब बार-बार कुछ करने की इच्छा प्रकट की तो मैंने हिन्दी ई-पुस्तकों के बारे में चर्चा की। उनकी आँखों में चमक आ गयी और उन्होंने प्रस्ताव रखा कि हम मिल कर इसे व्यवसायिक तौर पर डिवेलेप करते हैं। मैंने फिर अपना संदेह प्रकट किया कि क्योंकि यह एक नई पहल होगी, तो कोई व्यवसायिक आँकड़े मिलने वाले नहीं कि बिक्री होगी भी या नहीं। अगर आप बिना लाभ की उम्मीद रखे कुछ करना चाहते हैं तो हम अनुबंधित व्यवसायिक समझौते की ओर बढ़ते हैं। उत्तर मिला, "सुमन जी, मैं कोई नयी चीज़ हिन्दी साहित्य को देना चाहता हूँ, मैं मिलियनर नहीं बनना चाहता। आप मार्गदर्शन कीजिए और हम प्रोग्रामिंग करते हैं। कम से कम हम यह तो कह सकेंगे कि कुछ नया किया!" मुझे उनकी बात भायी और लगा कि कोई मेरे जैसा जनूनी आदमी भी है। सो पुस्तक बाज़ार बनना शुरू हो गया। आज वही सपना पूरा हुआ है – अब इसके बाद की सफलता पाठकों और पुस्तकों की ख़रीदने वालों के हाथ में है।

जब पुस्तक बाज़ार बन रहा था, तो समय-समय पर अन्य स्थापित लेखकों से बातचीत का अवसर मिला। पुस्तक प्रकाशन में जो समस्याएँ मुझे सुनने को मिलीं, उनमें बहुत समानता थी। सबसे पहली समस्या यह थी कि प्रकाशक बहुत प्रसिद्ध लेखकों को छोड़ कर सभी लेखकों से पुस्तक प्रकाशन के लिए पैसा तो माँगते हैं परन्तु रॉयल्टी के नाम पर कुछ भी नहीं देते। हस्ताक्षरित अनुबंध अगर होता भी है तो वह प्रकाशक के अधिकारों की ही रक्षा करता है, लेखक के नहीं। कितनी पुस्तकें छपीं, और प्रकाशक ने कितनी बेचीं इसकी जानकारी लेखक को नहीं होती और न ही उसे दी जाती है। ऐसी और भी बातें सुनने को मिलीं।

क्योंकि मैं कैनेडा उन दिनों में आ गया था जब मुझे प्रकाशन उद्योग में कोई रुचि नहीं थी, इसलिये इसके बारे में जो कुछ भी जाना वह पश्चिमी साहित्य के संदर्भ में ही जाना। पश्चिम के कई लेखक तो करोड़ों कमाते हैं जबकि हिन्दी लेखक की छवि अभी भी खद्दर का कुर्ता पायजामा और कंधे पर खद्दर का झोला लटकाये प्रकाशकों के दरवाज़े खटखटाते हुए होने की है। दुःख तो इस बात का है कि प्रकाशक की व्यवसायिक सफलता इन्हीं लेखकों पर निर्भर करती है; जिन्हें रॉयल्टी के नाम पर रोटी के कुछ टुकड़े दे दिये जाते हैं और प्रकाशक के अहसान का बोझ भी उनके कंधों पर लदा रहता है कि उनकी पुस्तकें किसी ने तो छापीं। किस लेखक की रचनाएँ पाठकों तक पहुँच पाएँगी यह भी पुस्तक के प्रकाशकों, पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों पर निर्भर करता था। दूसरे शब्दों में, लेखक पूरी तरह से इन लोगों के रुझान और इच्छा पर निर्भर है।

इंटरनेट पर प्रकाशन और बाद में ब्लॉग की सुविधा होने पर कम से कम लेखक का सीधा सम्वाद पाठक के साथ तो होने लगा परन्तु आर्थिक लाभ अभी भी स्वप्न का स्वप्न ही रहा। इंटरनेट पर प्रकाशन की प्रक्रिया का लाभ भी हुआ और हानि भी। लाभ तो यह हुआ कि कुछ हिन्दी की कई साईट्स उभर कर आयीं जिन्होंने वास्तविक रूप में साहित्य को वैश्विक मंच प्रदान किया। हम सब लोग इन अंतरजाल के घरों को अच्छी तरह जानते हैं। परन्तु जैसे-जैसे इंटरनेट पर साईट बनाना आसान और सस्ता होता गया – साहित्य, भाषा और व्याकरण की गुणवत्ता भी न्यूनतम होती चली गयी। ब्लॉग ने तो इसे बिल्कुल समाप्त ही कर दिया। इसकी पीड़ा कई बार मैंने अपने सम्पादकियों में व्यक्त की है।
इस समय हिन्दी की ई-पुस्तकों के कई प्रकाशक हैं। मैंने उनमें से अधिकतर का अध्ययन किया है और मुझे निराशा ही हाथ लगी है। यह लोग भी साहित्यिक गुणवत्ता की ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं। पुस्तकों के चयन की कोई प्रक्रिया नहीं है। अधिकतर "सेल्फ़ पब्लिकेशन" पर आधारित हैं। यानी आप अपनी पाण्डुलिपि कट पेस्ट करें, कवर अपलोड करें और आपकी ई-पुस्तक तैयार है। इसकी कोई प्रूफ़रीडिंग नहीं, लेखक के साथ कोई संवाद नहीं, कोई परामर्श नहीं। ऐसे में इन साईट्स पर क़िताबों का न बिकना समस्या नहीं बल्कि अपेक्षित परिणाम है। इन्हीं समस्याओं को देखते हुए हम लोगों ने सोचा है कि पुस्तक बाज़ार पर केवल चयनित पुस्तकें ही प्रकाशित होंगी, प्रकाशन प्रक्रिया के दौरान लेखक से संवाद निरंतर होता रहेगा। और पुस्तक की गुणवत्ता के साथ कोई समझौता नहीं होगा। प्रकाशित पुस्तकों की संख्या अधिकतम रखना उद्देश्य नहीं है बल्कि हमारा उद्देश्य है कि पाठक चाहे कोई पुस्तक खरीदे, उसे वह इतनी अच्छी लगे कि वह बार-बार लौटना चाहे।

हमारी टीम का यही प्रयास है कि पुस्तक खरीदने की प्रक्रिया और उसे पढ़ने की प्रक्रिया सहज हो। इस दिशा में हम हमेशा प्रयासरत रहेंगे। भविष्य में हमारी योजना अँग्रेज़ी ई-पुस्तकों की तरह "ऑन क्लाउड" करने कि है, अर्थात् आप खरीदी हुई पुस्तक को अपने किसी भी उपकरण पर पढ़ सकेंगे और जिस पन्ने पर पढ़ना छोड़ेंगे, दूसरे उपकरण पर भी वहीं से खुलेगी।

पुस्तक बाज़ार.कॉम की सफलता लेखकों और पाठकों पर निर्भर करती है। आपसे अनुरोध है कि आप इस दिशा की ओर हमारी सहायता करें ताकि हम हिन्दी की पुस्तकों को विश्व मंच पर पश्चिमी ई-पुस्तकों के बराबर खड़ा कर सकें। पुस्तक बाज़ार-कॉम पर लेखक के हितों को ध्यान में रखते हुए व्यवसायिक निर्णय लिए गए हैं और नीतियाँ निर्धारित की गयी हैं। "बुक पब्लिशिंग एग्रीमेंट" भी पढ़ कर देखें तो आप पाएँगे पुस्तक बाज़ार.कॉम ने कम से कम शर्तें अपनी रखीं है और लेखके के अधिकारों को स्पष्ट लिखा है ताकि लेखक को पुस्तक बिकने होने वाली अपनी आय पर कोई संदेह न हो। एकाउंटिंग की प्रक्रिया पूर्ण रूप से पारदर्शी है। लेखक अपने "माई एकाउंट" पन्ने पर अपनी पुस्तकों की बिक्री और उसे हो चुके भुगतान की जानकारी किसी भी समय पर देख सकता है। क्योंकि मैं स्वयं एक लेखक हूँ और व्यवसायिक तौर पर यह साईट बनाने से पहले पिछले दस वर्षों से साहित्य को विश्व मंच देने का परिश्रम कर रहा हूँ, इसलिए आपके समर्थन और सहायता की आशा करता हूँ।

सादर –
सुमन कुमार घई


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें