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ISSN 2292-9754

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03.23.2016


सम्पादकीय
मार्च (द्वितीय अंक), 2016

प्रिय मित्रो,

पिछले कुछ अंकों में मैं निरंतर एक ही शिकायत करता आ रहा हूँ - लेखकों द्वारा भेजी जाने वाली रचनाओं की त्रुटियों के बारे में। आप सबको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि इस बार नवोदित लेखकों की जो रचनाएँ मिली हैं, उनमें सही लिखने का प्रयास स्पष्ट झलकता है। एक आशा की किरण दिखायी देने लगी है। इसी को सोचते हुए मन में विचार आया कि निरंतर शिकायत की अपेक्षा कुछ सहायता उपलब्ध करना अधिक उपयुक्त होगा। वैसे तो इंटरनेट पर हिन्दी व्याकरण और विराम चिह्नों की बहुत सी जानकारी उपलब्ध है - परन्तु खेद का विषय तो यह है कि उनमें भी कुछ त्रुटियाँ है; अंधे को अंधा ही रास्ता दिखा रहा है। इस बार के अंक में देखेंगे कि एक नया स्तंभ इसी उद्देश्य के साथ आरम्भ किया है। अभी उसका शीर्षक कोई "विचारपूर्ण" नहीं है बल्कि सीधा-साधा "लेखन सुधार साधन" रख दिया है। अगर आपको कोई अन्य शीर्षक सूझता है तो अवश्य लिख भेजें - आपका स्वागत होगा!

अभी इस स्तंभ के दो भाग ही हैं। पहला विराम चिह्नों के बारे में और दूसरा हिन्दी व्याकरण के बारे में। क्योंकि बहुत से अन्य हिन्दी प्रेमियों ने पहले से ही इन विषयों पर परिश्रम कर रखा है तो उन्हीं के परिश्रम का लाभ उठाते हुए उनकी वेबसाइट्स के लिंक दिये हैं मैंने। इन पर जायें और वहाँ से सहायता प्राप्त करें। भविष्य में अगर मुझे लेखन सुधार के बारे में इंटरनेट पर कुछ अन्य सामग्री मिली तो अवश्य ही उन्हें भी इसी स्तंभ में सम्मिलित कर लेंगे।

विराम चिह्नों का सही प्रयोग सीखना कठिन नहीं है। वास्तविकता तो यह है कि बचपन में पाठशाला में हम सभी को सही सिखाया-पढ़ाया जाता है, परन्तु जब हम बहुत अधिक बुद्धिमान हो जाते हैं तो अपने नियम स्वयं बना लेते हैं। अब आवश्यकता है वापिस लौट कर उन्हीं पाठों का पुनर्पाठ करने की जिनको पढ़ कर हमने लिखना सीखा था।

स्वयं मुझे अनुभव होता है कि निस्संदेह हिन्दी व्याकरण का प्रयोग तो सही कर रहा हूँ, परन्तु परिभाषाएँ भूल चुका हूँ। यह भी संभव है कि कुछ ऐसा भूल चुका हूँ जो कि मेरे लेखन को बेहतर बना सके। क्योंकि भूल चुका हूँ तो ऐसा क्या है वह भी मालूम नहीं। ऐसे में फिर से लौट कर व्याकरण को पढ़ना ही एकमात्र विकल्प सूझता है। परन्तु मुझे यह भी विश्वास है कि इस बार व्याकरण केवल रटा मार कर परीक्षा में अंक प्राप्त करने के लिए नहीं पढ़ूँगा, अपितु उसे अपने लेखन को सुधारने के लिये पढ़ूँगा।

हिन्दी व्याकरण के मैंने अभी तक तीन स्रोत खोजे हैं - पहला कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय का है, दूसरा भारतकोश का और तीसरा हिन्दी साहित्य वेबसाइट का। मैं इन तीनों स्रोतों के निर्माताओं का हार्दिक धन्यवाद करता हूँ। बंधुओ, जो भी लोग इंटरनेट पर हिन्दी के साधन जुटा रहे हैं, वह चाहे व्यवसायिक हों या अव्यवसायिक हमें उनके प्रति कृतज्ञ होना चाहिए, क्योंकि उनका परिश्रम हम सभी हिन्दी प्रेमियों के लिए लाभदायक है।

इस बार के अंक से कि आलेख स्तंभ में हिन्दी आलेखों में सामाजिक पक्ष को छूने वाले आलेख भी प्रकाशित करने आरम्भ किए हैं। हालाँकि इन्हें आप "साहित्यिक" तो नहीं कह सकते परन्तु यह हिन्दी की आलेख विधा का ही तो एक अंग हैं - इसलिए साहित्य कुंज में इनका प्रकाशित होना आवश्यक हो जाता है। अब यह मेरा दायित्व है कि यह आलेख स्तरीय हों, भाषा उचित हो और विषय ज्ञानवर्धक और सबका हित करने वाले हों।

डॉ. शैलजा सक्सेना ने अपनी आलेख शृंखला में इस अंक से कैनेडा के लेखकों का परिचय महाकवि हरिशंकर आदेश जी से आरम्भ किया है। आदेश जी का कुछ साहित्य साहित्य कुंज पर उपलब्ध है। मुख्य पृष्ठ पर उनका महाकाव्य शकुन्तला फिर से यूनिकोड में आरम्भ किया है। पहले साहित्य कुंज के लिए मैंने st01web फ़ाँट बनाया था। उसकी को अब यूनिकोड में परिवर्तित करके प्रकाशित कर रहा हूँ। इसी महाकाव्य को पढ़ कर मैं फिर से हिन्दी सीखा हूँ। हालाँकि नई पीढ़ी ऐसे गंभीर साहित्य से दूर भागती है परन्तु ऐसे साहित्य को पढ़ना और फिर मनन करना अनिवार्य है। चाहे आप अतुकांत लिखते हों परन्तु छंद ज्ञान से आपके लेखन में अवश्य निखार आएगा। महाकाव्य शकुंतला में आदेश जी ने विभिन्न छंदों का उपयोग किया है। इससे काव्य पाठ में विविधतता बनी रहती है और रुचिकर लगता है। आशा है कि आप सभी इसे निरंतर पढ़ते रहेंगे।

सादर –
सुमन कुमार घई


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