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ISSN 2292-9754

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02.28.2019


सम्पादकीय
साहित्य कुञ्ज का आधुनिकीकरण
मार्च, 2019

 प्रिय मित्रो,

 इस बार साहित्य कुञ्ज परिवर्तन काल का अंक है। जैसा कि मैंने अपने एक संपादकीय में साहित्य कुञ्ज की नई आधुनिक वेबसाइट के निर्माण के बारे में लिखा था; वह स्वप्न अब साकार हो रहा है। इस अंक में नए लेखकों के फ़ोल्डर नई वेबसाइट पर बने हैं और पुराने लेखकों के फ़ोल्डर भी स्थानांतरित हो रहे हैं। कुछ लेखकों की नई रचनाएँ नई वेबसाइट पर खुलेंगी तो उनका फ़ोल्डर लगभग खाली दिखाई देगा जो कि अगले कुछ सप्ताहों में उनकी सारी रचनाओं को दिखाने लगेगा। वेबसाइट का होमपेज अभी बना नहीं है। उस पर कुछ परीक्षण के लिए पुरानी रचनाएँ लगी हुई हैं। ऐसा क्यों हो रहा है, इसका उद्देश्य भी बता रहा हूँ।

प्रायः होता है कि पूरी वेबसाइट बन जाने के बाद ही वह लोकार्पित की जाती है। परन्तु मैं ऐसा नहीं कर रहा क्योंकि मैं वेबसाइट निर्माण में आप लोगों के सुझाव चाहता हूँ। जो कुछ भी संभव होगा और व्यवहारिक होगा उस को अपना लिया जाएगा।

वेबसाइट में वीडियो और ऑडियो का भी प्रावधान है। अगर आप लोग चाहेंगे और आप लोगों का सहयोग मिलेगा तो यह स्तम्भ निरंतर चलेंगे। क्योंकि आधुनिक तकनीकी के कारण समय कि बचत होगी इसलिए संभावना है कि साहित्य कुञ्ज मासिक से पाक्षिक हो जाए। अगर आप लोगों का सहयोग बना रहा तो साप्ताहिक होने की भी संभावना है। इसके लिए मुझे और अनुशासित ढंग से काम करना होगा और लेखकों के लिए भी कुछ नियम बदलने होंगे।

मेरा अधिकतर समय टाईपिंग की ग़लतियों को निकालने, कृतिदेव, चाण्क्य इत्यादि फ़ांट से यूनिकोड फ़ांट में रचनाओं को बदलने में लगता है। अगले अंक से मैं यह प्रथा बन्द कर रहा हूँ। कृतिदेव में भेजी गई रचनाएँ स्वीकार नहीं की जाएँगी। यूनिकोड को प्रचलित हुए लगभग दस वर्ष बीत चुके हैं। अब समय आ गया है कि अगर आपने रचना इंटरनेट पर प्रकाशित करवानी है तो उसे आपको ही यूनिकोड में परिवर्तित करना होगा और परिवर्तन प्रक्रिया में आई ग़लतियों को संशोधित करना होगा। ऐसा न होने पर रचना को अस्वीकार कर दिया जाएगा। अगर यूनिकोड की रचना में अधिक ग़लतियाँ होंगी तो भी रचना को लौटा दिया जाएगा।

साहित्य कुञ्ज के पुराने पाठक जानते हैं कि हर अंक में कम लगभग छह शोध निबन्ध प्रकाशित करता था। इस बार के अंक में केवल दो हैं, क्योंकि इनमें एक-दो टाईपिंग की ग़लतियों के अतिरिक्त कोई त्रुटि नहीं थी। एक रहस्यमयी तथ्य तो यह है कि शोधार्थियों के निबन्ध प्राध्यापकों के निबन्धों की अपेक्षाकृत अधिक शुद्ध होते हैं।

लेखकों को विरामचिह्नों का भी उचित प्रयोग करना सीखना होगा। इसके बारे में कई बार लिख चुका हूँ और साहित्य कुञ्ज में इस जानकारी के लिंक भी दे रहा हूँ।

शायरी स्तम्भ का संपादन अखिल भंडारी जी कर रहे हैं, क्योंकि ग़ज़ल विधा के वह ज्ञाता हैं। मैं इस विधा को नहीं जानता इसलिए पहले मैं ग़लत-सलत रचनाएँ प्रकाशित करता रहा हूँ। अखिल जी उन लेखकों की सहायता करने के लिए तत्पर हैं जो स्वयं अपनी ग़ज़ल लेखन कला को निखारने का प्रयास कर रहे हैं। पिछले कुछ अंकों से केवल शुद्ध ग़ज़लें की प्रकाशित हो रही हैं। कुछ रचनाएँ ग़ज़लनुमा तो होती हैं पर किसी बहर पर खरी नहीं उतरतीं। उनका ले-आउट बदल कर उन्हें नज़्म की तरह प्रकाशित किया जा सकता है पर उसे ग़ज़ल कभी नहीं कहा जा सकता। यही बात हिन्दी के दोहों, हाइकु, तांका, चोका, माहिया इत्यादि छन्दों पर भी लागू होती है। अगर आप किसी छन्द में लिख रहे हैं तो उसके नियमों का पालन भी करें।

अंत में मैं 21Gfox.Ca के मालिक श्री स्टैनले परेरा और साहित्य कुञ्ज के निर्माता सॉफ़्टवेयर इंजीनियर श्री विपन सिंह का हार्दिक धन्यवाद कर रह हूँ कि वह नाममात्र की लागत से यह वेबसाइट बना रहे हैं। परन्तु मैं अपने कंधों पर चढ़े इस ऋण से मुक्त होना चाहता हूँ और वेबसाइट में गूगल के विज्ञापनों का प्रावधान रख रहा हूँ। अपने अनुभव से जानता हूँ कि तकनीकी निरन्तर बदलती है और इसके साथ क़दम मिला कर चलने के लिए निरन्तर पैसे की ज़रूरत भी बनी रहेगी।

आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी।

सादर -
सुमन कुमार घई


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