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ISSN 2292-9754

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03.06.2016


सम्पादकीय
मार्च (प्रथम अंक), 2016

इस समय कैनेडा में संध्या के लगभग सात बजे हैं और भारत में सोमवार, फरवरी ७ के सुबह के साढ़े पाँच। प्रयास कर रहा हूँ कि अगले एक घंटे में संपादकीय पूरा करके अंक को अपलोड कर दूँ- यानी इस बार दो सप्ताह के बाद सही समय पर साहित्य कुंज का नया अंक उपलब्ध हो जाए।

पिछले सम्पादकीय में अंक में विलम्ब होने के कारणों की चर्चा की थी। इस बार उस बात को नहीं दोहराऊँगा परन्तु एक सकारात्मक प्रतिक्रिया हुई, उसका उल्लेख अवश्य करूँगा। मुझे सहानुभूति बहुत मिली। विशेषकर वेब के अन्य प्रकाशकों/संपादकों से। यह सहानुभूति पाकर थोड़ा साहस तो आया कि मैं अकेला नहीं हूँ। परन्तु सबसे महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया मिली मुझे दो शोधार्थियों से जिनके शोध-निबन्ध मैंने त्रुटियों के कारण लौटा दिए थे। एक का कहना था कि पहली बार उसे किसी ने उसकी ग़लतियों की ओर ध्यान दिलाया है। मुझे बहुत आश्चर्य हुआ कि शोधार्थी स्तर तक पहुँचने के बाद यह प्रतिक्रिया! क्या इसमें दोष शोधार्थी का है, जिसने कभी अपने लेखन शिल्प की ओर ध्यान ही नहीं दिया; या दोष उन सभी अध्यापकों/प्राध्यापकों का है जिन्होंने उसे इस स्तर तक इस अवस्था में पहुँचने दिया; या उस व्यवस्था का जो ऐसा हो जाने की अनुमति देती है। अब किसे दोष दें?

उस शोधार्थी ने यह भी बताया कि मेरे द्वारा शोध पत्र लौटा देने के बाद उसने अन्य वेबसाइट्स पर जा कर देखा, जहाँ उसके अन्य शोध निबन्ध पहले प्रकाशित हो चुके हैं। उसने पाया कि उसकी अधिकतर त्रुटियाँ दूर करके प्रकाशित कर दिया गया है। इस कारण वह शोधार्थी इस तथ्य से अवगत ही नहीं थी कि वह ग़लतियाँ भी करती है। वह ख़ुश थी कि अब वह ठीक प्रकार लिखना सीखेगी।

यह वृत्तांत बताने का एक ही उद्देश्य है – वह कि अगर हम हिन्दी लेखन का स्तर सुधारना चाहते हैं तो हमें लेखकों को उनकी गलतियों के प्रति सचेत करना होगा। केवल रचना को रद्दी की टोकरी में या कंप्यूटर पर डिलीट करने से काम नहीं चलेगा। आरंभ में हमें समय लगाना पड़ेगा कि रचना में किए गए सुधारों को "लाल" करके एक प्रति लेखक/लेखिका को लौटा दें। सही की हुई रचना प्रकाशित कर दें। ताकि लेखक/लेखिका हतोत्साहित भी न हो और उसे भविष्य के लिए सही लिखने का प्रोत्साहन भी मिले।

अब एक नया विषय आरम्भ कर रहा हूँ। मुझे लेखकों से एक शिकायत है कि वह नई दिशाएँ, नए विषय, नई शैली खोजने में समय नहीं लगाते। बहुत सी रचनाएँ मिलती हैं जो उसी विषय/विमर्श को पीटते हैं जो वर्षों से चल रहा है, जो कुछ आसान था उसमें सब कई बार दोहराया जा चुका है। कृपया अगर आप अपने आपको उसी विमर्श पर लिखने के लिए विवश पाते हैं तो कोई नई बात कीजिये। पुरानी बात ही सही, नए ढंग से, नई शैली में कहिये। अगर हम हिन्दी साहित्य के पाठकवर्ग को बाँधे रखना चाहते हैं तो उसे कुछ नया देना होगा। मनोरंजन के दर्जनों साधन उपलब्ध हैं पाठक के लिए – अगर आप लेखन में समय लगाते हैं तो पाठक भी आपकी रचना को पढ़ने के लिए समय लगाता है।

अगला अनुग्रह पाठकों से है। साहित्य कुंज में बहुत कुछ नया, रोचक और साहित्यिक दृष्टिकोण से उत्कृष्ट होता है। अगर कोई रचना आपके मन को छूती है तो आपका दायित्व है कि अपनी प्रतिक्रिया लेखक तक पहुँचाएँ। इसका साधन बहुत सहज है। साहित्य कुंज में प्रत्येक रचना के नीचे इसका लिंक दिया गया है। आइकॉन पर क्लिक करके ई-मेल कर दें। आपका अधिक समय नहीं लगेगा एक दो शब्द कहने में परन्तु लेखक/लेखिका के लिए यह शब्द अमूल्य होते हैं। बंधु फ़ेसबुक पर भी तो आप लाइक करते ही रहते हैं चाहे कुछ भी लिखा हो!

सादर –
सुमन कुमार घई


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