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ISSN 2292-9754

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01.02.2016


सम्पादकीय : उलझे से विचार
जनवरी प्रथम - 2016

गत दिनों से कई उलझे से प्रश्न मन में उठ रहे हैं हिन्दी साहित्य को लेकर। इन्हीं उलझे विचारों को आपके समक्ष रखते हुए प्रतिक्रिया की आशा भी कर रहा हूँ। क्योंकि १९७३ से कैनेडा में आवास के कारण यह स्वाभाविक है कि प्रत्येक वस्तुस्थिति को पश्चिमी परिप्रेक्ष्य में देखता हूँ। क्या यह करना उचित है? पहला प्रश्न तो यही है। मेरा मानना है कि इंटरनेट के प्रभावस्वरूप विश्वग्राम की कल्पना अब कल्पना नहीं रही है। विचारों का आदान-प्रदान, संस्कृतियों का आपस में घुल-मिल जाना बहुत तीव्र गति से हो रहा है। इसकी गति को कम करना या रोक पाना असंभव है। हम लेखक लोग प्रायः अपनी शक्ति को अधिक आँकते हुए युग की दिशा को बदलने की बात करते हैं, परन्तु ऐसा कभी हुआ है क्या? लेखक मात्र साक्षी है युग का और युगीन भोगे हुए अनुभवों को पन्नों पर उकेरता है। यह लेखक की अपनी इच्छा है कि वह अपने सुखद अनुभवों से जन्मे आशाजनक साहित्य को पाठकों के समक्ष रखे या केवल समाज की बुराइयों को देखते हुए निराशाजनक साहित्य सृजन करे। एक मध्य मार्ग भी है जो बुराइयों का बखान करने के साथ समाधान भी सुझाता है। क्या यह युग परिवर्तन के लिए पर्याप्त होता है? यद्यपि यह साहित्य युग परिवर्तित करने में चाहे अक्षम रहे परन्तु युग को सुधारने की बीज पाठकों के मानसिकता में अवश्य बोने में सफल होता है।

अगर संस्कृतियाँ घुल-मिल रही हैं तो हमारा यह दायित्व है कि हम पश्चिमी संस्कृति को सूक्ष्मता से समझें और उसकी केवल निन्दा ही न करें बल्कि उसके अच्छे गुणों को अपनाने का भी प्रयास करें।

जानता हूँ कि बहुत से भारतीय विद्वान इसी तुलना पर ही आस्तीन चढ़ाते दिखाई देते हैं। "भारतीय संस्कृति महान है, भारत जगद्गुरु है" इत्यादि के आदर्श-वाक्यों से उनकी बातचीत आरम्भ होती है और वहीं पर समाप्त भी हो जाती है। हम लोग भूतकाल में कभी भी, कहीं भी नहीं जी सकते। वर्तमान को समझते हुए हमें भविष्य के लिये मनन करना आवश्यक है और उसके लिए योजनाबद्ध तरीके से काम करना भी।

दूसरा प्रश्न मेरे मन में यह उठता है कि हिन्दी का लेखक अंग्रेज़ी भाषा के लेखक की तुलना में अपनी पुस्तकें क्यों नहीं बेच पाता। प्रकाशक तो पुस्तकें बेचता है; उसका व्यवसाय है, परन्तु क्या लेखक को उचित अंश मिलता है? हो सकता है कि स्थापित लेखकों को उचित हिस्सा मिलता हो परन्तु वह हैं ही कितने? अगर साहित्य से धनोपार्जन नहीं होगा तो लेखक रोज़ी-रोटी के संघर्ष में उलझ कर लेखनी को ताक पर रख देता है। और बहुत सा उतकृष्ट साहित्य जीवनयापन की चक्की में पिस कर रह जाता है।

पश्चिमी देशों में अक्सर लोग उपन्यास या अन्य पुस्तकें पढ़ते दिखाई देते हैं, चाहे वह खरीदी हुई हों या पुस्तकालयों की हों – पढ़ते अवश्य हैं। यह भी नहीं है कि बुद्धिजीव वर्ग ही पाठक है। हर वर्ग और क्षेत्र के लोग पाठक हैं। इसी चलन की वज़ह से पुस्तकें बिकती हैं और ख़ूब बिकती हैं, और लेखक को इससे आय भी होती है। तीसरा प्रश्न उठता है कि ऐसा क्या है इस समाज में कि पुस्तकें पढ़ी जाती हैं? भारत में इससे विपरीत धारा चल रही है – युवा वर्ग मनोरंजन के लिए पढ़ने से कोसों दूर होता जा रहा है। इसकी दोषी शिक्षा प्रणाली है। मैं पूरे पश्चिमी जगत की बात न करते हुए केवल कैनेडा की ही बात करूँगा। इस देश में स्कूल के आरम्भिक वर्षों से ही बच्चों को पाठ्यक्रम के अतिरिक्त, अन्य मनोरंजक पुस्तकें पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। प्रायः स्कूल के काम में उन्हें "बुक रिपोर्ट" लिखने का काम दिया जाता है। यह काम उसी कक्षा से आरम्भ हो जाता है जिस कक्षा से बच्चे पढ़ना सीख चुके होते हैं यानी कि ग्रेड दो-तीन से ही। अब आप ही सोच कर देखिये कि उस उम्र के बच्चे यानी आठ-नौ साल के बच्चे को प्रोत्साहित किया जाता है कि वह बच्चों के लिए लिखे गए उपन्यास पढ़े, उन के बारे में सोचे और अपने शब्दों में रिपोर्ट लिखे। क्या ऐसा भारत में होता है, या यह संभव है? यहाँ यह पुस्तकें बच्चों को खरीदनी नहीं पड़तीं बल्कि वह पुस्तकालय में जाकर स्वयं "इशु" करवाते हैं। यानी परोक्ष ढंग से उन्हें पुस्तकालय जाने की आदत भी डाली जाती है। सुविधा के लिए विद्यार्थियों को चुने हुए उपन्यासों की सूची दी जाती है और स्थानीय पुस्तकालय भी उन उपन्यासों को प्रचुर मात्रा में रखते हैं। ऐसी व्यवस्था द्वारा शिक्षित बच्चे अवश्य ही प्रबुद्ध पाठक बन जाते हैं, और जीवन भर पुस्तक को मनोरंजन का साधन मानते हुए खरीदते भी हैं और पढ़ते भी हैं।

मुझे इस समय याद आ रहे हैं मेरी चौथी कक्षा के अध्यापक। नाम तो याद नहीं आ रहा परन्तु उनका चेहरा सामने है। वह हर रोज़ अंतिम दो पीरियड कहानियों को पढ़ने के लिए देते थे। छोटी-छोटी पंजाबी की कहानियों की किताबों का उनका अपना व्यक्तिगत पुस्तकालय था। यह पुस्तकें विद्यार्थी घर भी ले जा सकते थे। हमें दोपहर की छुट्टी के बाद, अखबार के कागज़ से कवर चढ़ी पुस्तकों की प्रतीक्षा रहती थी। ध्यान देने योग्य बात यह है कि उन दिनों अध्यापकों के वेतन बहुत कम थे – कठिनाई से ही जीवनयापन हो पाता था। उस समय तो समझ नहीं थी परन्तु अब सोचता हूँ कि ऐसी आर्थिक अवस्था में बच्चों के लिए पुस्तकों को अपनी जेब से खरीदना और इतना समर्पित होना शिक्षा के प्रति! अब मेरा मस्तक श्रद्धा से झुक जाता है। उनको याद केवल इसलिए कर रहा हूँ कि इस पद्धति को अपनाने के लिए सरकारी धनपोषण की कोई आवश्यकता नहीं है। आज भारत एक समृद्ध देश है – स्थानीय उद्योगपति, व्यवसायी लोग ऐसे पुस्तकालयों की स्थापना आसानी से कर सकते हैं। आवश्यकता है केवल संकल्प की।

सस्नेह –
सुमन कुमार घई


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