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ISSN 2292-9754

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02.21.2016


सम्पादकीय
अंक प्रकाशन में विलम्ब क्यों होता है?
फरवरी (द्वितीय अंक), 2016

अंक प्रकाशन में विलम्ब क्यों होता है? इस प्रश्न से बरसों से उलझ रहा हूँ। कुंठित हो कर सिर धुनता हूँ कि क्या मैं साहित्य कुंज को कम समय दे पाता हूँ? क्या इसके प्रति मेरा समर्पण पूर्ण नहीं है? पारिवारिक या स्वास्थ्य संबंधी व्यस्तताओं को अगर ताक पर रख भी दूँ, तो भी इस उलझन का समाधान दिखायी नहीं देता था – या जानते हुए भी उसे व्यक्त नहीं करना चाहता था। प्रवृत्ति है कि किसी और पर दोष लगाने से पहले अपने-आप में दोष ढूँढने लगता हूँ और अपने आपको और बुरी तरह से झोंक देता हूँ उस आग में जो मेरे बुझाने से तो बुझेगी नहीं। इसलिए अंत में आज निर्णय करके बैठा हूँ कि अपनी पीड़ा की सलीब साहित्य कुंज के लेखकों के कंधों पर लाद ही दूँगा क्योंकि मैं और मसीहा नहीं बन सकता!

आप शायद विश्वास करें या न करें परन्तु साहित्य कुंज के प्रकाशन के लिए मैं प्रतिदिन चार से छह घंटे तक लगाता हूँ। इसमें लेखकों के साथ ई-मेल द्वारा वार्तालाप से लेकर रचनाओं को सँभालने तक का काम करता हूँ – फिर भी अंक प्रकाशन में देर हो जाती है। इतने समय में तो मैं साहित्य कुंज को साप्ताहिक करके अपनी पत्नी को ख़ुश भी रख सकता हूँ, जिसके लिए साहित्य कुंज एक सौतन की तरह हो चुका है। अक्सर सुनने को मिलता है "समय बरबाद कर रहे हो – तुम्हारे सिवाय किसी और को इसकी न तो कोई ज़रूरत है और न ही फ़िक्र!" फिर भी लौट कर अपने कमरे का दरवाज़ा बन्द करके अपने व्यसन में डूब जाता हूँ।

प्रकाशन में विलम्ब होने का सबसे बड़ा कारण है लेखकों द्वारा रचना टाईप करने में लापरवाही। ९०% लेखकों की रचनाओं में इतनी ग़लतियाँ होती हैं कि लगने लगता है कि वह टाईप करने के बाद अपनी रचना को पढ़ते ही नहीं। संपादन को क्या करूँगा – प्रूफ़रीड करने में ही मेरा भी ९०% समय लग जाता है। दुःख की बात तो यह है कि हम साहित्य शिल्पी होने का दम भरते हैं। साहित्य भी शिल्प है और यह केवल भावों की अभिव्यक्ति मात्र नहीं। इस शिल्प को निखारने के लिए इसके हर पक्ष के साथ न्याय करना अनिवार्य है। इसमें भाषा की शुद्धता, वर्तनी की ओर ध्यान, शब्दों का उचित चयन, व्याकरण और विराम चिह्नों का उचित प्रयोग और अन्य भी बहुत कुछ ऐसा है जो आँखों से ओझल नहीं किया जा सकता।

पिछले वर्ष से शोध पत्र निरन्तर साहित्य कुंज में प्रकाशित हो रहे हैं – शायद अब यह विश्वविद्यालयों की अनिवार्यता है। परन्तु कृपया शोध पत्रों को भेजने से पहले एक बार फिर से पढ़ तो लें। कई बार इतनी फूहड़ त्रुटियाँ होती हैं कि मन मानने को तैयार नहीं होता कि यह किसी विश्वविद्यालय के प्राध्यापक का लिखा है या शोधार्थी का शोध पत्र है। आप लोग तो भाषाविद् हैं और आप भाषा के नींव के पत्थर हैं जिन पर हिन्दी भाषा का भविष्य निर्भर करता है! मेरी समझ में तो इसका एक ही कारण आता है कि यह शोध पत्र किसी टाईपिस्ट को टाईप करने के लिए दे दिए गये थे जो शायद दसवीं पास ही होगा। आपका लिखा उसे जैसा समझ आया - उसने टाईप कर दिया और आपने उसे पढ़े बिना ही मुझे भेज दिया। ज़रा सोचिये इस शोध पत्र पर आपका नाम लिखा है उस टाईपिस्ट का नहीं! कई बार शोध पत्र लौटाये भी हैं। कई बार संदर्भ सूची का आलेख से ताल-मेल ही नहीं होता।

अब टाईपिंग की ग़लतियों की चर्चा भी करूँगा। यूनिकोड को छोड़ कर हिन्दी के अन्य जितने भी फ़ांट हैं उनके की-बोर्ड ले-आऊट अधिक नहीं हैं यानी कीबोर्ड लेआऊट लगभग छह प्रकार के हैं। मुद्रित पुस्तकों की पब्लिशिंग सॉफ़्टवेयर (पेजमेकर, इनडिज़ाईन, कुआर्क इत्यादि) के लिए यूनिकोड फ़ांट प्रयोग नहीं किया जा सकता। इसके लिए पारम्परिक फ़ांट (टीटीएफ़) ही ठीक रहते हैं। समस्या की जड़ यह है कि यह फ़ांट बनाते हुए टाईप करने की सुविधा की ओर ध्यान नहीं दिया गया। इसलिए हिन्दी के टाईपिस्टों ने अपनी सुविधा स्वयं तय कर ली। उदाहरण देता हूँ – वाक्य को कोटेशन मार्क में लिखा जाता है - यानी डबल इन्वर्टिड कॉमा। अंग्रेज़ी के लिए अपॉर्स्टफ़ी का चिह्न भी है। डबल कोटेशन मार्क के लिए टाईपिस्ट को ALT+282 और ALT+283 टाईप करना पड़ता है और अपॉर्स्टफ़ी के लिए केवल * टाईप करना पड़ता है। इसलिए वह प्रायः दो बार ** टाईप करके डबल कोटेशन मार्क बना देते हैं। इसी तरह "ऊ" के लिए भी चार की-स्ट्रोक लगाना पड़ता है इसलिए वह केवल "उ" से काम चला लेते हैं। इसी तरह "रु" टाईप करना आसान है "रू" की तुलना में तो "रूप" का "रुप" हो जाता है। इस तरह कई ग़लतियाँ केवल टाईपिंग की सुविधा के लिए टाईपिस्ट जानबूझ कर करता है जो आप नहीं पकड़ पाते क्योंकि आप अपनी रचना को ही नहीं पढ़ते।

अब आपकी रचना पर टाईपिस्ट के अंचल की हिन्दी का प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के लिए "ड" और "ड़" या "ढ" और "ढ़" में अन्तर है, जैसे की मेरे देश का नाम "कनाडा" है "कनाड़ा" नहीं। सही शब्द "ढूँढ" है "ढूंढ़" नहीं। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार वाले लिंग भेद में भी समस्या खड़ी कर देते हैं जैसे लिखेंगे "जगह ढूँढ़ा" जबकि होना चाहिए "जगह ढूँढी"। शब्दकोश में प्रत्येक शब्द के लिंग को परिभाषित किया गया है – जिसका संशोधन टाईपिस्ट कर देते हैं और आपकी रचना का सत्यानाश भी हो जाता है।

तीसरा कारण आलस है। टाईपिस्ट अपनी स्पीड को बनाए रखने के लिए कीस्ट्रोक बचाते हैं। जैसे कि अनुनासिका या अनुस्वार के लिए कम कीस्ट्रोक का चयन या फिर इसका प्रयोग ही न करना – उदाहरण है "तुम्हें, उन्हें" को "तुम्हे, उन्हे" टाईप कर देना। आवश्यकता "हैं" टाईप करने की है पर पूरी कहानी या आलेख में केवल "है" ही देखने को मिलता है।

अगली सबसे बड़ी समस्या विराम चिह्नों की है जिसके बारे में मैं पहले भी लिख चुका हूँ। अब इंटरनेट पर बहुत जगह पर (youtube पर भी) विराम चिह्नों के लिए बहुत अच्छे सबक हैं। कृपया उनका अनुसरण करें। क्योंकि आपकी रचना के उचित संप्रेषण के लिए विराम चिह्न अनिवार्य हैं।

अभी बहुत कुछ है कहने के लिए जो आने वाले सम्पादकीयों में आप से साझा करूँगा। अभी इसे यहीं पर विराम देता हूँ।

आशा है आप अपनी रचनाओं को "प्रूफ़रीड" करके ही भेजेंगे और मेरे कंधों का बोझ थोड़ा कम करेंगे।

सादर –
सुमन कुमार घई


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