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ISSN 2292-9754

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12.17.2015


सम्पादकीय
दिसम्बर प्रथम - २०१५

आज लगभग दस महीने के बाद फिर से साहित्य कुंज को पुनर्जीवत करने का प्रयास कर रहा हूँ। मैं उन लेखकों से क्षमायाचना भी कर रहा हूँ जो उत्सुकता से अपनी रचनाओं के प्रकाशन की प्रतीक्षा कर रहे थे। मैं उनको विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि यह अंतराल उनके लिए जितना खिन्नता पैदा करने वाला था उतनी कुंठा मुझे भी हो रही थी – क्योंकि साहित्य मेरा प्रथम प्रेम है और प्रेम जीवन की आत्मा होती है। कारण कई थे। अप्रैल के महीने से कुछ अस्वस्थता चल रही थी। उचित औषधि के मिलते ही स्वास्थ्य तो सँभल गया परन्तु इस दौरान जो व्यक्तिगत कामों का ढेर लग गया उन्हें तो निपटाना ही था।

पिछले वर्ष के अंत में घर बदला था। उत्तरी अमेरिका में प्रायः हर व्यक्ति जीवन में तीन-चार घर बदलता है। पहला घर आरम्भिक घर यानी “स्टार्टस होम” कहलाता है। शादी के तुरंत बाद या उससे पहले ही एक छोटा सा घर बनता है। जब तक बच्चे छोटे रहते हैं यह घर भी घोंसले की तरह चहकता रहता है। जब छोटे पंछी थोड़ा फुदकने लगते हैं तो घर छोटा पड़ जाता है तो दूसरा घर खरीदा जाता है। फिर वह समय आता है जब पंछी घोंसला छोड़ कर उड़ जाते हैं और पीछे रह जाते हैं बूढ़ाते हुए माता-पिता जिनके लिए यह घर बड़ा लगने लगता है तो फिर जीवन का चक्र समेटने की और मुड़ जाता है। मैं भी इसी अवस्था में हूँ। छोटे घर को अपने अनुसार बनाने के लिए भी व्यस्त रहा। कैनेडा का मौसम भी ऐसा है कि मई के अंत से सितम्बर के पहले सप्ताह तक ही बाहर का काम यानी लॉन, फूलों की क्यारियाँ, पेड़-पौधों की देख-भाल हो सकती है। वह सँभले तो हिन्दी राइटर्स गिल्ड के वार्षिक कार्यक्रम की तैयारियाँ शुरू हो गईं। अगर कुछ पिछड़ा तो वह था साहित्य कुंज।

कैनेडा में हिन्दी साहित्य का सृजन अभी शैशव काल में है। हिन्दी राइटर्स गिल्ड की स्थापना का उद्देश्य हिन्दी साहित्य की सभी विधाओं को उचित मंच देने का था ताकि इसका स्वाभाविक विकास हो सके। पिछले सात वर्षों में अंतर दिखाई देने लगा है, तेरह पुस्तकों का प्रकाशन भी हो चुका है। परन्तु हम संस्थापक निदेशक यानी, मैं, डॉ. शैलजा सक्सेना और विजय विक्रान्त जी इसकी नींव को मज़बूत करने में व्यस्त हैं। हालाँकि हम लोगों का अपना लेखन पिछड़ रहा है परन्तु जो बीड़ा हम लोगों ने उठाया है उसे तो किसी भी तरह पूरा करना ही है। अब हम लोगों के आसपास एक समूह जुटना आरम्भ हो चुका है जिसमें युवा लोग भी हैं। यह नया ख़ून हम लोगों के लिए आशाजनक है कि अब हम थोड़ा पीछे हट कर इन लोगों के हाथ में बागडोर दे सकते हैं और संभव है कि पुनः लेखन की ओर भी ध्यान दे पाएँ।

यह तो थी मेरी व्यथा। एक अन्य व्यस्तता है जिसका मैं भरपूर आनन्द ले रहा हूँ वह है पुस्तक बाज़ार.कॉम का सृजन। वेबसाईट और एंड्रॉयड ऐप्प पर काम चल रहा है और अधिकतर पूरा हो चुका है। अगर और कोई रुकावट नहीं आयी तो आशा है कि अगले दो महीने में वेबसाईट ऑन लाईन हो जाएगी। वेबसाईट की संरचना में कोई भी समझौता नहीं किया जा रहा यानी अंग्रेज़ी की ई-बुक्स की तुलना में यह किसी भी तरह से कम नहीं होगी। समय आने पर आपको सूचित करूँगा और आशा है कि आप का सहयोग उसी तरह मिलेगा जिस तरह से साहित्य कुंज को मिलता रहा है।

सस्नेह –
सुमन कुमार घई


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