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ISSN 2292-9754

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12.17.2015


सम्पादकीय
अप्रैल (प्रथम अंक), 2015

समय-समय पर भारत से प्रवासी साहित्य के संकलनों को प्रकाश होता रहता है। परन्तु एक बार रचनाएँ वहाँ पहुँचने के बाद कब पुस्तक प्रकाशित होगी – इस पर किसी का भी कोई नियन्त्रण नहीं होता। क्योंकि प्रकाशक व्यवसायिक दृष्टि से साहित्य को तौलता है जब कि लेखक किसी भी जुगत के साथ अपनी रचनाओं का प्रकाशन चाहता है। प्रायः यह भी होता है कि कुछ तथाकथित लेखक भारत जाकर अपनी पुस्तक को छपवा लेते हैं और प्रकाशक "प्रिंटिंग पैकेज" में पुस्तक का विमोचन भी करवा देता है और लेखक/लेखिका को सम्मानित भी कर देता है – शॉल ओढ़ा कर। ऐसे लेखक/लेखिकाएँ विदेशों में लौट कर इस खरीदे हुए सम्मान के तमगे टाँक कर केवल गर्व ही नहीं अनुभव करते परन्तु अपने से बेहतर साहित्यकारों को तुच्छ भी समझने लगते हैं। पिछले दिनों यह भी देखने में आया है कि भारत के शोधार्थी प्रवासी साहित्य को खोजते हुए ऐसे ही लेखकों/लेखिकाओं की पुस्तकों पर शोध-निबन्ध भी लिखने लगे हैं। यानी विदेशों में हिन्दी में कैसा साहित्य सृजन हो रहा है – इसकी छवि इन्हीं पुस्तकों पर निर्भर करती है। अगर अच्छे लेखक/लेखिकाएँ भारत से प्रकाशित ही नहीं होंगे तो शोधार्थियों को भी दोष नहीं दिया जा सकता। एक प्रश्न अवश्य मन में उठता है कि शोधार्थियों का यह भी तो दायित्व है कि गधे को घोड़ा मत बनाएँ। अगर रचना में कोई दम नहीं है तो उसकी आलोचना करने से मत डरें। शोध निबन्ध के पाठक भी तो अच्छे-बुरे साहित्य को समझते हैं। ऐसे में शोधार्थी अपने शत्रु स्वयं हो जाता है।

इस समस्या के हल का एक साधन इंटरनेट पर प्रकाशन है। यह बिलकुल सही है कि इंटरनेट पर प्रकाशन के समीकरण में प्रकाशक अलोप हो जाता है जिसका लाभ भी है और हानि भी। लाभ यह है कि विदेशों में बैठे साहित्यकार अपनी रचनाओं और पुस्तकों का तुरंत प्रकाशन कर सकते हैं। परन्तु इससे सबसे बड़ी हानि यह है कि पुस्तक प्रकाशक की चयन प्रक्रिया से नहीं गुज़रती। यानी जिसका जो मन हुआ – इंटरनेट पर प्रकाशित कर दिया और संपादन, प्रूफ-रीडिंग किस चिड़िया का नाम है – के बारे में सोचा भी नहीं। विदेशों में रचे जा रहे ऐसे ही साहित्य को भारत के साहित्यकार देखते ही खारिज कर देते हैं और गेहूँ के साथ घुन भी पिस जाता है। प्रवासी साहित्य या बेकार साहित्य एक दूसरे के प्रायय बन जाते हैं।

ऐसी बातों को सोचते हुए कैनेडा की प्रमुख साहित्यिक संस्था हिन्दी राइटर्स गिल्ड ने "पूर्वा : कैनेडा" मासिक पीडीएफ़ प्रत्रिका प्रकाशन का निर्णय लिया है। पहले अंक पर काम चल रहा है। इस पत्रिका को बेशक हिन्दी राइटर्स गिल्ड प्रकाशित करेगा परन्तु इसमें पूरे विश्व के लेखकों का स्वागत है। इस पत्रिका का उद्देश्य अन्य श्रेष्ठ पत्रिकाओं की तरह केवल अच्छे साहित्य को पाठकों के समक्ष रखना है।

सादर –
सुमन कुमार घई


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