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ISSN 2292-9754

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09.26.2017


यूके में हिंदी के 27 वर्ष: डॉ. पद्मेश गुप्ता और विजय राणा
वातायन द्वार प्रस्तुत:

बाएँ से दायें बैठे: डॉ. दाउजी गुप्त, कैलाश बुधवार, बैरोनेस फ्लेदर, दिव्या माथुर, मीरा कौशिक ओबीई
खड़े हुए: विजय राणा, ज़किया ज़ुबैरी, तेजेंद्र शर्मा, पद्मेश गुप्ता, शिखा वार्ष्णेय, तितिक्षा शाह, डॉ. केके श्रीवास्तव, डॉ. निखिल कौशिक, अरुण माहेश्वरी और जनार्दन अग्रवाल

७ सितंबर २०१७: लंदन के हाउस ऑफ़ लोर्ड्स में, बैरनेस फ्लैदर की मेज़बानी में वातायन ने हिंदी प्रसारक एवं सुप्रसिद्ध कवि डॉ. पदेमेश गुप्ता एवं बहु-पुरस्कार विजेता पत्रकार, लेखक और हैल्थ एंड हैप्पीनेस के संपादक, विजय राणा, के बीच "ब्रिटेन में हिन्दी के सत्ताईस वर्ष" विषय पर एक शानदार चर्चा का आयोजन किया। इस शुभावसर पर डॉ. गुप्त के कविता संग्रह, प्रवासी-पुत्र, का भी लन्दन-लोकार्पण संपन्न हुआ।

बैरनेस फ्लैदर ने अतिथियों का स्वागत किया और ब्रिटेन में भारतीय भाषाओं और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए वातयान के लगातार प्रयासों की प्रशंसा की। वातायन की संस्थापक और लेखिका दिव्या माथुर, द्वारा कार्यक्रम के परिचय और नवोदित गायिका और हिन्दी-शिक्षिका, पूनम देव के सरस्वती वंदना के साथ कार्यक्रम आरम्भ हुआ। बैरनेस फ्लैदर द्वारा डॉ. गुप्त को प्रथागत शाल ओढ़ाए जाते समय, मीरा कौशिक ओबीई ने वातायन की ओर से उन्हें प्रमाण-पत्र प्रस्तुत किया। इस अवसर पर विशेष अतिथियों में सम्मिलित थे: प्रसिद्ध विद्वान और लखनऊ के पूर्व मेयर श्री दाउजी गुप्त, वाणी प्रकाशन के प्रबंध निदेशक और वाणी फ़ाउंडेशन के अध्यक्ष श्री अरुण माहेश्वरी और श्री तरुण कुमार, अताशे (हिन्दी एवं संस्कृति), भारतीय उच्चायोग-लन्दन।

इस कार्यक्रम की अध्यक्षता "लन्दन से पत्र" नामक दो संस्करणों के लेखक एवं बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के प्रमुख (हिन्दी/तमिल), श्री कैलाश बुधवार ने की। उन्होंने कहा कि ब्रिटेन में पद्मेश का हिन्दी के लिए योगदान इतिहास में हमेशा दर्ज रहेगा। विजय राणा ने एक उत्कृष्ट बातची आरम्भ करते हुए कुछ चुने हुए अतिथियों से महत्वपूर्ण प्रश्न किए। कृति-यूके की संस्थापक और फ़ैशन-डिज़ाइनर तितिक्षा शाह ने इस देश में हिन्दी के अपने लंबे समय से प्यार, प्रतिबद्धता और विकास के लिए पद्मेश को शानदार शब्दों में सम्मानित करते हुए कहा कि निजी और व्यावसायिक-करियर में उनका व्यवहार एक आदर्श प्रस्तुत करता है। वेल्स से पधारे नेत्र-विशेषज्ञ एवं कवि डॉ. निखिल कौशिक ने पद्मेश के यू.के. में शुरुआती दिनों की यादें ताज़ा कीं तो डॉ. के.के. श्रीवास्तव ने कहा कि पद्मेश की कविता में एक सार्वभौमिक अपील है, जो सकारात्मक ऊर्जा से भरी है। उनमें अनेकों प्रतिभाओं के साथ-साथ मंच-संचालन की भी अद्भुत प्रतिभा है।

वाणी प्रकाशन दिल्ली के अरुण माहेश्वरी, जो इस कार्यक्रम में भाग लेने के लिए दिल्ली से विशेष तौर पर पधारे थे, ने कहा कि पद्मेश की कविताएँ - "पौधा", "ब्रेक्सिट" और "दोहरी नागरिकता" डायस्पोरा - प्रगतिशील लेखन का प्रतीक हैं।

भारत के राजनीतिज्ञ, विद्वान एवं पद्मेश के पिता, डॉ. दाउजी गुप्त ने कहा कि लखनऊ में उनके पुश्तैनी घर की दीवारें आज भी कबीरदास, मीरा और सूरदास जैसे प्राचीन कवियों के लेखन के साथ स्वर्ण-पाउडर से बने चित्रों द्वारा उत्कीर्ण हैं, जिनसे पद्मेश काफ़ी प्रभावित रहे। वातायन की अध्यक्ष और अकादमी की निदेशक मीरा कौशिक ओबीई ने बताया कि कैसे पद्मेश की गतिविधियों ने १९९० से ब्रिटेन में हिंदी साहित्य के लिए एक बेहतरीन वातावरण तैयार किया।

विजय राणा के विभिन्न प्रश्नों के उत्तर देते हुए डॉ. पद्मेश गुप्ता ने ब्रिटेन में हिंदी आन्दोलन के निर्माण, पुरवाई का प्रकाशन, ब्रिटेन, यूरोप और रूस में हिंदी छात्रों के लिए हिंदी ज्ञान प्रतियोगिता, वार्षिक कवि सम्मेलन शुरू करने में अपनी भूमिका के बारे में बात की। उनसे अपनी प्रसिद्ध कविताओं का पाठ करने का अनुरोध किया गया। "छड़ी, घड़ी और ऐनक" ने कई लोगों की आँखें नम कर दीं। अपनी भविष्य की योजनाओं के विषय में पूछे जाने पर, पद्मेश ने ब्रिटेन के विश्वविद्यालयों की साझेदारी में एक वार्षिक साहित्य एवं सांस्कृतिक उत्सव की घोषणा की और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युवाओं के साथ जुड़ने के लिए हिन्दी छात्रों के नेटवर्क निर्माण की भी बात की। उन्होंने यह विश्वास जताया कि यदि बड़े पैमाने पर धन जुटाने की बजाय, स्वैच्छिक स्तर पर, बिना किसी उम्मीद या मौलिक लाभ के, ऐसी गतिविधियों का आयोजन किया जाता है, तो वह ऐसा प्रभाव छोड़ेंगी जो दुनिया में भारतीय साहित्य और संस्कृति को अभियान का रूप प्रदान करेगा।

इस कार्यक्रम की सफलता का अंदाज़ इस बात से लगाया जा सकता है कि जहाँ अब तक यही सुनने में आता था कि हिन्दी की पुस्तकें नहीं बिकती, वे भी कविता की, किन्तु इस कार्यक्रम में किताबें कम पड़ गईं, बहुत से श्रोताओं को निराश लौटना पड़ा।

धन्यवाद-ज्ञापन देते हुए, शिखा वार्ष्णेय ने कुछ चुने हुए संदेशों को भी पढ़ा, जिनमें शामिल थे फिजी के अनिल जोशी और मानचेस्टर के डॉ. रंजीत सुमरा इत्यादि। कृति यूके-बर्मिंघम और वाणी पब्लिशर्स-दिल्ली द्वारा प्रायोजित पेय और स्वादिष्ट भोजन का प्रबंध मिलबैंक इंडियन स्पाइस रेस्तराँ के साथ इस कार्यक्रम का समापन हुआ।


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