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07.29.2007
 
हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में एक बार फिर हिन्दी की गूँज


बाएँ से - तेजेन्द्र शर्मा, नैना शर्मा, टोनी मैक्नलटी, महुआ माजी, रजत बागची, लॉर्ड किंग, मोनिका मोहता और राकेश दूबे

(लंदन) 20 जुलाई 2007 - कथा यू.के. का तेरहवाँ अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान आज हाउस ऑफ लार्ड्स में आयोजित एक गरिमामय समारोह में भारत की युवा लेखिका महुआ माजी को उनके पहले उपन्यास मैं बोरिशाइल्ला के लिए प्रदान किया गया। उन्हें यह सम्मान ब्रिटेन के आंतरिक सुरक्षा मंत्री टोनी मैकनल्टी ने प्रदान किया। इस अवसर पर लॉर्ड तरसेम किंग, भारतीय उच्चायोग में मंत्री (समन्वय) रजत बागची, नेहरू सेंटर की निदेशक मोनिका कपिल मोहता, पाकिस्तान की लेखिका नीलम अहमद बशीर सहित बड़ी संख्या में कई भाषाओं के लेखक पत्रकार उपस्थित थे। इसी अवसर पर ब्रिटेन में बसे हिन्दी लेखक को दिया जाने वाला आठवाँ पद्मानंद साहित्य सम्मान डा. गौतम सचदेव को उनके कहानी संग्रह साढ़े सात दर्जन पिंजरे के लिए दिया गया।

मुख्य अतिथि के पद से बोलते हुए श्री टोनी मैक्नलटी ने हिन्दी में भाषण शुरू करते हुए जीवन के हर क्षेत्र में शब्द की सत्ता को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि आतंकवाद से लड़ रही हमारी इस दुनिया में एक दूसरे को समझने के लिए सार्थक शब्द ही हमारा साथ देंगे। आज हमें संवाद की सबसे ज्यादा ज़रूरत है। साहित्य, चाहे किसी भी भाषा में लिखा जाये, यह हमें सहिष्णुता, प्रेम और एक दूसरे के प्रति समझदारी सिखाता है। उन्होंने स्वीकार किया कि कथा यू.के. का यह आयोजन इस दिशा में एक सार्थक पहल है और यह ब्रिटेन में विभिन्न जातीय समुदायों के बीच संवाद बनाने की कोशिश है।


बाएँ से- तेजेन्द्र शर्मा, टोनी मैक्नलटी, लॉर्ड तरसेम किंग, रजत बागची और नैना शर्मा

भारतीय मूल के ब्रिटिश लार्ड तरसेम किंग ने विभिन्न भाषाओं के साथ अपने अनुभव बाँटते हुए कहा कि हम यहाँ ब्रिटेन में अरसे तक प्राइमरी स्कूलों में हिन्दी की पढ़ाई के लिए कोशिश करते रहे हैं जबकि यहाँ की सरकार माध्यमिक स्तर पर हिन्दी पढ़ाने की बात कहती रही। ये बात अलग है कि आज इस देश की भारतीय पीढ़ी हिन्दी पढ़ने के लिए तैयार नहीं है। हमें अपने स्तर पर इस दिशा में प्रयास करने होंगे। भाषा ही तो जोड़ने का काम करती है। इससे दोनों देशों को भी आपस में और निकट लाने में मदद मिलेगी।

इस अवसर पर अपनी बात कहते हुए नेहरू सेंटर की निदेशक मोनिका मोहता ने कहा कि हम सब के लिए ये अत्यंत हर्ष की बात है कि जहाँ एक ओर संयुक्त राष्ट्र में हिन्दी को प्रवेश दिलाने की बात हो रही है, हमारी परिचित संस्था कथा यू.के. ने एक वर्ष पहले ही ब्रिटेन के हाउस ऑफ लार्ड्स में हिन्दी का परचम लहरा दिया था। कथा यू. के इसके लिए बधाई की हकदार है। उन्होंने महुआ माजी को मैं बोरिशाइल्ला जैसे महत्वपूर्ण उपन्यास के लिए बधाई देते हुए कहा कि हाल ही के इतिहास पर कोई बड़ी रचना लिख पाना इतना आसान नहीं होता लेकिन इन्होंने चार वर्ष के कठिन परिश्रम के साथ असंभव को संभव कर दिखाया है।

श्री रजत बागची ने महुआ माजी के चयन पर कथा यू.के. को बधाई देते हुए कहा कि वे इस देश में अपने सीमित साधनों से कई बरसों से हिन्दी साहित्य के प्रचार प्रसार की मशाल जलाये हुए हैं। उन्होंने आगे कहा कि विदेशों में बसे भरतीयों की पहली पीढ़ी तो अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़ी हुई है लेकिन दूसरी-तीसरी पीढ़ी के लिए इस दिशा में काम करने की ज़रूरत है। हम अपनी संस्कृति और कलाओं तक अपनी भाषाओं के जरिये ही पहुँच सकते हैं।

कथा यू.के. के महासचिव एवं कथाकार तेजेन्द शर्मा ने मेहमानों का स्वागत करते हुए कहा कि पिछले तेरह वर्षों से कथा यू.के. सक्रिय रूप से इन सम्मानों का आयोजन कर रही है। अब तक इस सम्मान से चित्रा मुद्गल, संजीव, ज्ञान चतुर्वेदी और असगर वजाहत जैसे लेखकों को सम्मानित किया जा चुका है। उन्होंने कहा कि कथा यू.के. का उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी भाषा एवं साहित्य को प्रतिष्ठित करना है।

महुआ माजी ने अपने उपन्यास का चयन किये जाने के लिए कथा यू.के.का आभार मानते हुए कहा कि हाउस ऑफ लार्ड्स में सम्मानित होना मेरे लिए एक सपने के सच होने की तरह है। मैं बोरिशाइल्ला की रचना प्रक्रिया पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम को अपने पहले ही उपन्यास का विषय बनाने का कारण था कि मैं नई पीढ़ी के लिए उसे एक दृष्टांत के रूप में पेश करना चाहती थी कि आज बेशक पूरी दुनिया में सारी लड़ाइयाँ धर्म के नाम पर ही लड़ी जा रही हैं, लेकिन सच तो ये है कि सारा खेल सत्ता का है। ये लड़ाइयाँ अब बंद होनी चाहिये।

तेजेद्र शर्मा ने मैं बोरिशाइल्ला के दो महत्वपूर्ण अंशों का पाठ करके समां बांध दिया। दिल्ली से विशेष रूप से पधारे अजित राय ने महुआ माजी के मानपत्र का पाठ किया। डा. गौतम सचदेव की कहानी अकेले पथ का जंगल का सरस पाठ किया गोविंद शर्मा ने जबकि उनका मानपत्र पढ़ा यॉर्क के डा. महेद्र वर्मा ने। कार्यक्रम का संचालन भारतीय उच्चायोग के हिन्दी और संस्कृति अधिकारी राकेश दूबे ने किया।

मुंबई से आये सूरज प्रकाश ने इन सम्मानों की प्रक्रिया की जानकारी दी। खराब मौसम और (अंडरग्राउण्ड) ट्रेन व्यवस्था के अस्त व्यस्त होने के बावजूद कार्यक्रम में बड़ी संख्या में साहित्यकार और साहित्यप्रेमी मौजूद थे। कार्यक्रम में भारत से श्रीमती निर्मला सिंह और श्रीमती लीना मेहेन्दले, श्री महेद्र राजा जैन, डॉ. सत्येद्र श्रीवास्तव, डॉक्टर दीप्ति दिवाकर, डॉ. नज़रुल बोस, डा. महिपाल और जय वर्मा, एअर इंडिया के शैलेद्र तोमर, श्रीमती दिव्या माथुर, प्रेम मौदगिल और राज मौदगिल, साजी पॉल, आनंद कुमार, मंजी पटेल वेखारिया आदि की उपस्थिति विशेष रूप से उल्लेखनीय रही।


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