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ISSN 2292-9754

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01.31.2019


नाटक ’उधार का सुख’ की सफलता:
हिन्दी राइटर्स गिल्ड की उपलब्धियों में नया मील का पत्थर
डॉ. शैलजा सक्सेना


डॉ. श्रीधर की भूमिका में विद्याभूषण धर और मीता की भूमिका में डॉ. शैलजा सक्सेना

हिन्दी राइटर्स गिल्ड ने नवंबर 18, 2018 को सेंट्रल पील हाई सेकेंड्री स्कूल, ब्रैम्पटन, कनाडा के ऑडिटोरियम में नाटक ’उधार का सुख’ की प्रस्तुति द्वारा प्रबुद्ध, जागरूक हिन्दी प्रेमियों के सामने रंगमंच का एक नया मानक गढ़ा।

नाटक का प्रारंभ संचालक श्री संजीव अग्रवाल जी ने हिन्दी राइटर्स गिल्ड का संक्षिप्त परिचय देने से किया और स्वयंसेवकों, प्रायोजकों (स्पांसर्स) और मीडिया सहयोगियों को धन्यवाद दिया। उन्होंने ओटवा से मिले महामहिम हाई कमिश्नर श्री विकास स्वरूप जी की शुभकामनाओं और बधाई संदेश के लिये उनका धन्यवाद किया। तत्पश्चात नाटक के कुछ विचार-सूत्र, प्रश्न रूप में श्रीमती कृष्णा वर्मा जी ने दर्शकों के सामने रखे और फिर भरत मुनि की नाट्य-परंपरानुसार रंगभूमि और रंग-देवता की वंदना से यह नाटक प्रारंभ हुआ। इस नाटक में हमारी करनी और कथनी के बीच की खाई और इस से उपजी संवेदनशील मन की व्याकुलता को अनेक स्थितियों और पात्रों के माध्यम से दिखाया गया है।


बायें से विद्याभूषण धर (डॉ. श्रीधर), संदी्प कुमार (सदा्शिव दास वर्मा) और लता पांडे (नर्स)

“दीवार पर गाँधी जी का फोटो लगा कर मेज़ के नीचे से घूस लेने का युग है यह”! “जीने के लिये हमेशा दो स्तर! बातें करनी हैं भ्रष्टाचार के विरुद्ध लेकिन दूसरी तरफ डोनेशन देने लिये बराबर पैसे जमा करते रहना!” “पार्वती कहती थी, आधा ही सही, पर वेतन तो मिलता है, उसी से संतोष करो पर पागलपन तो मेरे ही सिर पर सवार था, कहता, ऐसा क्यों? कब तक चलेगा ऐसा? बस, मन को खिलौना मिल गया! पूछता रहता है, ऐसा क्यो?’ ऐसे प्रभावशाली संवादों और अनेक उतार-चढ़ाव से भरी अपनी कहानी से इस नाटक ने तीन घंटे तक लगभग ३०० लोगों को बाँधे रखा।

रमा जोशी (मिसेज प्रधान)
लता पांडे (नर्स कमलाबाई)

स्किज़ोफ्रेनिक रोगी सदाशिव दास वर्मा के रूप में संदीप कुमार ने खंडित व्यक्तित्व का बहुत प्रभावशाली रूप प्रस्तुत किया। उनके हँसने और रोने, सामान्य और बीमार रूपों ने दर्शकों के मन को भीतर तक छू लिया। सायकाइट्रिस्ट डॉक्टर श्रीधर के रूप में विद्या भूषण धर का अपने पात्र-चरित्र पर अद्भुत नियंत्रण रहा, अपने रोगी से प्रभावित होकर, अपने सपनों के खोज की उनकी यात्रा को दर्शकों ने बहुत सराहा। डॉक्टर श्रीधर की पत्नी मीता के रूप में डॉ. शैलजा सक्सेना, एक कड़क पत्नी और माँ के रूप में नज़र आईं जो सदाशिव से उसके आदर्शवाद पर बहस करती है। सब कुछ पर नियंत्रण करने वाली से टूट कर बिखरने वाली स्त्री तक के रूप की उन्होंने सटीक और बढिया प्रस्तुति की और दर्शकों की प्रशंसा ली। नर्स कमलाबाई के रूप में लता पाँडे और धनी रोगी मिसेज़ प्रधान के रूप में रमा जोशी ने दो विपरीत वर्गों का प्रतिनिधित्व करते हुये बहुत ही अच्छा काम किया और सोचने के लिये कुछ सूत्र देते हुये, हास्य की मिठास भी पैदा की। दर्शकों ने दोनों के काम को बहुत सराहा। भारत छोड़ कर अमरीका रहने का निर्णय लेने वाले आधुनिक बेटे के रूप में रोहन झुमानी के संवाद और व्यवहार के अभिनय को भी बहुत प्रशंसा मिली। माँ के रूप में कृष्णा वर्मा का एक ही लंबा संवाद था पर उनकी ममता से भीगी आवाज़ में जीवन की सीख, लोगों की आँखॆं नम कर गई। नाटक के सार को प्रस्तुत करता उनका वह संवाद लोगों को बहुत समय तक याद रहेगा। डिंपी शाह झुमानी का डॉक्टर श्रीधर की पूर्व प्रेमिका, सुमन के रूप में किया हुआ एक ही नृत्य था पर डिंपी का लयात्मक नृत्य, गीत में स्त्री-मन का उल्लास तथा छोड़ दिये जाने की पीड़ा का प्रस्तुतिकरण लोगों को बहुत पसंद आया।

रोहन झुमानी (युवा श्रीधर)
डिम्पी शाह झुमानी (सुमन)

यह नाटक मराठी नाटक ’सुखांशी भाडंती आहि’ (लेखक: अभिराम भडकमकर) का हिन्दी रूपांतरण है। रूपांतरणकार: डॉ. शैलजा सक्सेना और श्री प्रकाश दाते; निर्देशन और प्रकाश व्यवस्था: श्री प्रकाश दाते; संगीत: दीपक संत;रंग-सज्जा और मंच सज्जा श्री प्रकाश दाते की इंजीनियरिंग का कमाल थी जो घर और क्लिनिक के दृश्यों को सैंकंडो में बदल सकी। स्टेज मैनेजर के रूप में अनुराधा कानून गो और उनके छह सहायकों ने इस कार्य को बखूबी किया। ध्वनि- नियंत्रक का काम नीला चिंसालकर ने सुचारु रूप से निभाया। वेशभूषा और प्रसाधन का कार्य नमिता दाँडेकर और लीना देवधरे ने कुशलता से किया।

इस तरह लगभग आठ-नौ महीनों की अथक मेहनत का परिणाम यह तीन घंटे का नाटक था, जो लोगों के मन पर छा गया। प्रत्येक कलाकार के सही और प्रभावी काम ने दर्शकों को समय का पता ही नहीं लगने दिया। हिन्दी राइटर्स गिल्ड की सलाहकार निदेशिकाओं श्रीमती पूनम चंद्रा ’मनु’ और श्रीमति आशा बर्मन ने इस नाटक के सुन्दर निर्देशन के लिये श्री प्रकाश दाते जी का धन्यवाद करते हुये उन्हें उपहार दिये। इसी अवसर पर “इन्डीड वी कैन” संस्था ने भी पूर्व घोषित “मिरेकल मॉम” का अवार्ड डॉ. शैलजा सक्सेना को उनकी साहित्यिक उपलब्धियों के लिये दिया।

हिन्दी राइटर्स गिल्ड के सह-संस्थापक निदेशक श्री विजय विक्रांत और श्री सुमन कुमार घई ने नाटक बनने की पूरी प्रक्रिया को बहुत मेहनत से सँभाला। श्री सुमन घई जी ने कार्यक्रम पुस्तिका बना कर कलाकारों के परिचय को लोगों तक पहुँचाया तो श्री विजय विक्रांत जी ने टिकट का काम सँभाला। श्रीमती पूनम चंद्रा ’मनु’ ने मीडिया द्वारा नाटक की सूचना लोगों तक पहुँचाई तो श्रीमती आशा बर्मन जी ने संस्थाओं और लोगों से संपर्क किया। श्री दीपक राज़दान ने कैमरे से वे अद्भुत पल सँभाले। अनेक स्वयंसेवकों की मदद से यह नाटक अपने उत्तम रूप को पा सका। यह उल्लेखनीय है कि इस नाटक में अनेक युवाओं ने स्वयंसेवकों के रूप में अपना समय दिया और नाटक को सराहा भी। गिल्ड ने उन सबका मंच पर बुला कर धन्यवाद दिया।

यह दिन कलाकारों, दर्शकों और हिन्दी राइटर्स गिल्ड के लिये अत्यधिक संतुष्टि और उपलब्धि का दिन रहा। इस नाटक की कहानी और संस्था की गतिविधियों को जानने के लिये देखें, वेबसाइट: www.hindiwritersguild.com


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