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ISSN 2292-9754

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08.29.2016


संघर्षरत चेतना और विद्रोह का कवि
सुशील कुमार शैली की कविताओं पर राहुल देव
राहुल देव

समीक्ष्य पुस्तक: समय से संवाद (कविता संग्रह)
लेखक: सुशील कुमार शैली
प्रकाशक: अयन प्रकाशन,
नयी दिल्ली 2015
पृष्ठ: 118
मूल्य: 240 रु.

कवि कविता रचने की प्रेरणा अपने परिवेश में ही रहकर प्राप्त करता है। परिवेश में व्याप्त दुःख, दर्द, पीड़ा और अनुभवों से गुज़रकर, संस्कारित होकर साहित्य या कह लें कविता अभिव्यक्त होती है। संवेदनशील होने के कारण कवि की अनुभूति गहरी एवं पैनी होती है। कुछ ऐसे ही भावों को अपने तार्किक विचारों को सामने रखने वाले एकदम युवा कवि हैं सुशील कुमार शैली। शैली पंजाब राज्य से हैं। इसलिए हिंदी कविता में उनकी यह सुखद उपस्थिति विशेष रूप से रेखांकित किये जाने योग्य है। उनका पहला संग्रह है "समय से संवाद"। यह संग्रह उन्होंने "संघर्षरत चेतना व विद्रोह में तनी मुट्ठियों के नाम" समर्पित किया है। इस तरह संग्रह के प्रारंभ होने से पहले ही वे कविता में अपने तेवरों की घोषणा कर देते हैं। इस संग्रह में उनकी 62 कवितायें हैं। जिनसे गुज़रकर इस कवि की कविताई की पड़ताल काफ़ी हद तक की जा सकती है।

इस संग्रह की प्रारंभिक कविताओं में एक छोटी सी कविता है "गाली" इसमें शैली लिखते हैं,

"बता नहीं सकता
कितना दुखी हूँ मैं
भूखा देखकर तुम्हें
मन में आता है
आग लगा दूँ दुनिया को..."

कवि के विद्रोही स्वरों को इस कविता में बख़ूबी देखा-सुना जा सकता है। सुशील इस कविता में समाजवाद के सैद्धांतिक और ज़मीनी हक़ीक़त के बीच के अंतर को पाठक के सामने रखते हैं। अगली कविता "अंतराल" ठीक उसके आगे जुड़ती है। यह उन कारणों की पड़ताल करती है जिसके कारण आज यह स्थिति हुई। इस कविता में कवि कहता है,

सुना है, आदमी की शिनाख्त
उसका व्यवहार नहीं
अंगों और जूतों के बीच का है अंतराल
और नागरिकता वक्षस्थल पर पाले
अजायब-घर के कानूनों का है उपहार"

और

"चलो, अब चलें बाज़ार
देखें कितना है...
भूख और भावों के बीच का अंतराल
रेस्तरां में बैठे रईस
और फुटपाथ पर बैठे
भिखारी के लिए
भोजन को लेकर
जितना है दूरी का एहसास
उतना ही है, मेरे भाई
तुम्हारी जुबान और पेट का अंतराल"

यहाँ सर्वहारा वर्ग की दयनीय स्थिति और शोषण के दुश्चक्र की दयनीय परिणतियाँ देखकर कवि व्यथित हो उठता है। जहाँ पूँजीपति सत्ता से गठजोड़ कर टैक्स में छूट प्राप्त कर मुनाफ़ा कमाता है लेकिन ग़रीबों की मूलभूत आवश्यकताएँ भी मयस्सर नहीं होतीं। सुशील का कवि मन इस बाज़ारवाद और पूँजीवाद की खुली आलोचना करता है।

"बात कभी शुरू न होगी" शीर्षक कविता में कवि "पहल कौन करे" इस प्रश्न को कविता में लाता है। वह कहते हैं,

"बात कभी शुरू न होगी
तुम कहते हो-
बात तुम्हारे पड़ोसी की है
पड़ोसी कहता है-
बात उसके पड़ोसी की है
उसका पड़ोसी कहता है-
बात उसके पड़ोसी की है
उसी की जुबान से शुरू होगी
इस तरह तो शहर के शहर
सुविधा के छल्ले से
आहिस्ता-आहिस्ता निकल जायेंगें
और बात कभी शुरू न होगी"

आतंक और आधुनिकता के दुष्प्रभावों पर भी कवि की नज़र है। "दस्तूर-उल-अमल दुनिया का" शीर्षक कविता। तो वहीँ "दिनचर्या" जैसी कविता समाज की अकर्मण्यता और यथास्थितिवाद को दिखाती है। इस संग्रह की कवितायें अपने शीर्षक को सार्थक करती हुई वास्तव में "समय से संवाद" शैली में ही लिखी गयी हैं। संग्रह की तमाम कविताओं को पढ़ते हुए धूमिल की याद आ जाना स्वाभाविक है। कवि पर धूमिल की कविताई का प्रभाव स्पष्ट नज़र आता है। "अँधेरे कुवें में" और "हाशिये में कविता" जैसी कुछेक कवितायें बहुत साहसपूर्ण तरीक़े से लिखी गयी स्पष्टवादी कवितायें हैं। कवि यहाँ अपने पाठकों से रूबरू होता है, उसे अन्य किसी की कोई परवाह नहीं। "दो टूक और स्पष्ट" शीर्षक कविता में आये कुछ शब्दों को देखें मसलन लोकतंत्र, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, संसद, खेत, मिट्टी। आप देखें यह कवि कविता में किस तरह शब्दों के मायने तलाशने की कोशिश करता दिखता है। कवि जो देखना चाहता है, कवि जो खोजना चाहता है वह उसे मिल नहीं रहा इसलिए कवि बेचैन है।

अपने मन की बात कहने के लिए सुशील कहीं-कहीं प्रतीकों का इस्तेमाल करते हैं। पाठक से संवाद स्थापित करने का यह भी एक तरीक़ा है। उदाहरण के लिए "बरगद" जैसी कविता। शैली की भाषा सरल, सहज है। वह साफ़ शब्दों में सच्ची बात कहना जानते हैं। इसलिए कवि समय और समाज की तमाम विसंगतियों को पकड़कर कथ्य का काव्यात्मक निर्वहन करने में सफल सिद्ध हुआ है।

संग्रह की "हालांकि मैं साक्षी था", "पूरी घृणा के बावजूद" और "मौनावलंबन" कविता में चीखती मानवता का आर्तस्वर सुनाई देता है। कवि ने अपनी तरह से वर्जनाओं को भी तोड़ने की हिम्मत दिखाई है।

"भाषा के सम्पूर्ण खुरदुरेपन के साथ
सारे परिभाषित शब्दों को दरकिनार कर
उपस्थित हूँ आपके समक्ष
वर्जित शब्दों की सम्पूर्ण मर्यादाओं के साथ"

कवि ने इन कविताओं में तटस्थ रहने वाले कथित बुद्धिजीवी लोगों को कविता मे करारा जवाब दिया है। वह हाशिये पर रहने के बावजूद केंद्र की ख़बर लेते हैं। मुखर शब्दों में व्यवस्था का विरोध करती ये कवितायें प्रतिरोध की परम्परा को आगे बढ़ाती प्रतीत होती हैं। शैली की कविता समय के भीषण सच से साक्षात्कार कराने वाली कविता है। "भूख के गलियारों से" शीर्षक कविता में शैली विद्रोह के उत्स तक जाते हैं और कहते हैं,

"पेट की जलन
जहाँ सन्तोष का बाँध तोड़ती है
वहीँ से विद्रोह की कविता की
शुरुवात होती है।"

भूख व्यक्ति से क्या-क्या करा सकती है कविता उसका मार्मिक शब्दचित्र खींचती है। कविताओं में लय और प्रवाह निरंतर बना रहता है। समाज की पुरानी और घिसी-पिटी अवधारणाओं का नकार भी सुशील दृढ़ता से करते हैं। लगभग सभी कवितायें बहुत विश्वसनीय हैं।

संग्रह की एक और बहुत छोटी सी कविता है "विक्षिप्तता"। यह कविता छोटी होते हुए भी अपने अर्थों में बहुत दूर तक जाती है। सब कुछ पता होते हुए भी बेख़बर होने का अभिनय करना, भयावह स्थिति का द्योतक है। महात्मा गाँधी ने भी कहा था कि जो सो रहा है उसे तो जगाया जा सकता है लेकिन जो सोने का बहाना कर रहा है उसे कैसे जगाओगे! कुछ इसी तरह की एक छोटी कविता और है उसका शीर्षक है "प्रतिबद्धता"। इसको पढ़कर कवि की प्रतिबद्ध दृष्टि का पता चलता है। वह अभिव्यक्ति का हर ख़तरा उठाने को तैयार है जैसा कभी हमारे पुरखे कवि ने भी कहा था। उत्तरआधुनिकता के नाम पर सांस्कृतिक साज़िशों के तर्कों के पीछे का वास्तविक मर्म वे जान रहे हैं, यह एक अच्छे कवि की निशानी है। ऐसे कवि ही अपनी कविताओं और साहित्य के माध्यम से पाठकों में नयी उम्मीद और लोक को सही राह दिखाते हैं।

सुशील विषयों को केवल छूकर नहीं निकल जाते बल्कि विषय की गहराई तक उतरते हुए सच के हर संस्तर तक पहुँचने का, उसे जान लेने का, उसे प्रस्तुत कर पाने का उपक्रम करते दिखते हैं जोकि समकालीन कविता में अमूमन कम ही कवि कर पाते हैं। देखें,

"अखबार की सुर्खियाँ नहीं
सुर्ख़ियों के बीच गिरे
आदमी को पढ़ो
या फिर
उस छद्म को पढ़ो
जो शब्दों की ओट में
तुम्हारी पीठ थपथपा कर
रीढ़ गायब कर देता है"

इनकी कविता में भरपूर संवेदना है। वह आक्रोश को व्यक्त करते हुए भाषा और विषय से भटके नहीं हैं। जैसे "फटी चादर" शीर्षक कविता। देखें तो लगभग सभी कविताओं में वे अपने इस जुझारू तेवर को क़ायम रख पाए हैं। परिवेश के जैसे चित्र उनकी कविता में देखने को मिलते हैं, युवा कवियों में अन्यत्र दुर्लभ हैं। देखें "दिग्भ्रमित" शीर्षक कविता। वे पाठक को बनी-बनाई स्थितियों पर पुनर्विचार करने के लिए विवश कर देते हैं। अपनी "विज्ञप्ति" शीर्षक कविता में शैली ऐतिहासिक चीज़ों के वर्तमान उपयोग से पहले उनके पुनरावलोकन की आवश्यकता पर बल देते हुए कहते हैं,

"डाल लो विज्ञप्तियों की माला गले में
या इतिहास के पन्नों की नए सिरे से जाँच शुरू करो।"

इस संग्रह में साहित्य, राजनीति, समाज का विश्लेषणात्मक विवेचन मिलता है। कवि की राजनीतिक समझ साफ़ है, उसका पक्ष मानवता का पक्ष है। कविताओं में विषयगत विविधता और कहन का नयापन देखने को मिलता है। जीवन संघर्ष और यथार्थ के अंतर्विरोधों से उपजी इस नयी ऊर्जा का स्वागत होना ही चाहिए।

राहुल देव
संपर्क सूत्र- 948 साहित्य सदन,
कोतवाली मार्ग, महमूदाबाद (अवध),
सीतापुर, उ.प्र. 261203
मो.– 09454112975
ईमेल- rahuldev.bly@gmail.com


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