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03.15.2015


इक उम्मीद से दिल बहलता रहा
अभिजीत

समीक्ष्य पुस्तक : टुकड़ा काग़ज़ का
लेखक : अवनीश सिंह चौहान
प्रकाशक : बोधि प्रकाशन
मूल्य : 90.00 रु.

कविता की सबसे बुनियादी ज़रूरत होती है उसका प्राणवान होना। कठोर या कोमल वह इसके बाद ही हो सकती है। जब रस को ब्रह्मानन्द सहोदर (रसो वै सः) कहा गया था तो इसके पीछे काव्य के उसी प्राणतत्व के प्रतिपादन की मंशा थी जिसे हम ईश्वरत्व, ब्रह्मत्व आदि कहते हैं। कुछ सूत्रों को जोड़ा जाए तो बात और साफ होगी। दिनकर के ‘रश्मिरथी’ में कृष्ण भी जब कहते हैं कि - ‘पड़ जाती मेरी दृष्टि जिधर! हँसने लगती है सृष्टि उधर।’ - तो वो अपने ईश्वरत्व के इसी प्राणसान तत्व की व्याख्या कर रहे होते हैं। अवनीश सिंह चौहान का गीत संग्रह ‘टुकड़ा कागज का’ भी काव्य के प्राणतत्व का सुन्दर उदाहरण है। इस ‘कागज के टुकड़े’ पर अवनीश ने वो सब कुछ लिख दिया है जिसमें ‘कविता मरे! असंभव है’ की परिकल्पना साकार हो उठती है।

इस संकलन में संकलित गीतों से यह अनुमान लगाना सहज हो जाता है कि अवनीश बहुआयामी कलम के धारक हैं। उनकी कलम में यथार्थ और भावुकता का संतुलन बड़ा सुंदर दिखाई पड़ता है। इनके गीतों में एक तरफ सामाजिक यथार्थ का जीवंत चित्रण दिखता है तो दूसरी तरफ अवनीश अपने परिवेश के भावपक्ष के प्रति भी रुझान व्यक्त करते हैं। अवनीश समाज को उसकी समग्रता में देखते हैं लेकिन समाज की इकाई के प्रति उनकी चिन्ता इस बात की ओर साफ इशारा करती है कि वे समाज के प्रति कितनी सूक्ष्म दृष्टि रखते हैं - ‘कभी कोयले-सा धधक,/फिर राख बना, रोया/माटी में मिल गया/ कि जैसे/ माटी में सोया/चलता है हल/उड़ता जाए/टुकड़ा कागज का।’ (टुकड़ा कागज का) ये पंक्तियाँ दरअसल समाज की इकाई के रूप में एक अदने आदमी की कहानी कहती हैं। एक संघर्षरत आदमी जो सारी ज़िन्दगी उतार-चढ़ावों के बीच गुज़ार देता है- उसकी महत्ता का प्रतिपादन नहीं है ये पंक्तियाँ, बल्कि उससे भी आगे जाकर अवनीश एक आम आदमी के संघर्ष की सार्थकता पर बात करते हैं।

ये जीवन अवनीश के गीतों में हर तरफ बिखरा हुआ है। गतिशील जीवन की कठिनाईयों से अवगत गीतकार यह लिखना नहीं भूलता कि - ‘मीलों लम्बा अभी सफर/साँसें हैं कुछ शेष बचीं/बाकी है उत्साह अभी/थोड़ी सी है कमर लची।’ (नदिया की लहरें) कहना न होगा कि गतिशील व संघर्षशील जीवन में संघर्ष का हमेशा बचे रह जाना ही असल मायनों में जीवन को प्राणवान बनाता है और ये समझ ही अवनीश के गीतों की काव्यगत ईमानदारी का प्रतीक है।

अवनीश अपने गीतों में समाज में व्याप्त विषमता को भी पकड़ते हैं। ये विषमता जाति या अर्थ आधारित ही नहीं स्थान आधारित भी है। जिस सड़क और संसद का भेद धूमिल की कविताओं में दिखता है उसकी टीस अवनीश की इन पंक्तियों में भी देखी जा सकती है - ‘पगडंडी जो/मिल न सकी है/राजपथों से, शहरों से।’ (पगडंडी) इन पंक्तियों से इस बात का भी संकेत मिल जाता है कि गीतकार की दृष्टि जनता और प्रशासन के बीच एक खाली स्पेस पर भी है जिसे गीतकार समाज के लिए अच्छा संकेत नहीं मानता। ‘केन्द्र’ और ‘परिधि’ की चर्चा साहित्य में बहुत अरसे से होती आई है। इसकी सबसे बड़ी विडम्बना ये है कि ‘परिधि’ सदा के लिए अछूता रह जाता है - ‘जहाँ केन्द्र’ से/चलकर पैसा/लुट जाता है रस्ते में/और परिधि/भगवान भरोसे/रहती ठण्डे बस्ते में।’ (पगडंडी)

महाकवि निराला ने भी ‘तोड़ती पत्थर’ नामक कविता में इसी परिधि और केन्द्र की बात की थी जिनके बीच ‘तरुमालिकाएँ और अट्टालिकाएँ’ थी। अवनीश इस संबंध को बखूबी पहचानते हैं। वे जानते हैं कि परिधि की जनसंख्या अपना जीवनयापन किन बद्तर स्थितियों में करती है। वे लिखते हैं - ‘इनके-उनके/ताने सुनना/दिन भर देह गलाना/तीन रुपैया/मिले मजूरी/नौ की आग बुझाना।’ (किसको कौन उबारे) जाहिर है तीन रुपए की मजूरी में नौ जनों की भूख नहीं मिटती इसलिए अवनीश इस विषमतापरक स्थिति को दर्शाने से भी नहीं हिचकते - ‘बड़ी-बड़ी/‘गाला’ महफिल में/कितनी ही भोगों की बातें/और कहीं टपरे के नीचे/सिकुड़ी हैं मन मारे आँतें।’ (सर्वोत्तम उद्योग)

अवनीश के गीतों की सबसे बड़ी खासियत है उनका किसी प्रकार के आग्रह से या बंधन से मुक्त रहना। अवनीश अपने गीतों में कब परिवेश संचरण करते हैं यह जानना बड़ा कठिन है। इसका कोई पूर्वाभास भी नहीं होता और संचरण इतनी नज़ाकत से होता है कि पाठक किसी प्रकार का झटका भी महसूस नहीं करता। शहरीकरण ने ग्रामीण परिवेश को किस कदर ग्रस लिया है और उसकी मासूमियत खत्म कर दी है इसकी चिंता हमें अवनीश की इन पंक्तियों में साफ देखने को मिलती है - ‘कंकरीट के मकड़जाल ने/फाँस लिया है सादा जीवन/कभी पकड़ना अपनी छाया/कभी छाँह से डर कर रहना/कभी चाँद तारों को चाहें/कभी धूप के मोती चुनना।’ (लौटे बचपन) जाहिर है ये पंक्तियाँ प्रकृति प्रेम से ज्यादा ग्रामीण बाल्यकाल की मासूमियतों की ओर इशारा करती हैं, लेकिन ‘कंकरीट के मकड़जाल’ की समस्या को भी अवनीश अनदेखा नहीं कर पाए हैं। एक कवि की सबसे बड़ी खासियत सिर्फ सुन्दर का स्वप्न दिखाना भर नहीं होता बल्कि उन कारणों की ओर भी इशारा करना होता है जो समाज के सुन्दर तत्व को उसकी मासूमियत को ग्रहण लगाना चाहते हैं। कहना न होगा कि अवनीश इस धरातल पर सफल गीतकार के रूप में सामने आते हैं। सियासत की चालबाजियों से अवनीश भली-भाँति परिचित हैं और अपने पाठकों को भी परिचित कराना नहीं भूलते - ‘सत्ता पर काबिज होने को/कट-मर जाते दल/आज सियासत सौदेबाजी/जनता में हलचल।’ (चिंताओं का बोझ-जिंदगी)

ये तथ्य किसी से छुपा नहीं कि सियासत के ठेकेदार सत्ता में काबिज़ होने के लिए कैसे-कैसे पैंतरे आजमाते हैं लेकिन फिर भी आम भोली-भाली जनता उनके षड्यंत्रों की शिकार बनती है। इस प्रसंग में वो लोककथा याद आती है जिसमें बूढ़ा कबूतर अपने जवान कबूतर साथियों को चेतावनी देता है कि ‘शिकारी आएगा, जाल बिछाएगा, दाना डालेगा, फँसना मत’। वो कबूतर उसकी यह बात रटते-रटते अंततः फँस जाते हैं। यही हाल बेचारी जनता का भी है कि कइयों बार इस तरह के षड्यंत्रों की साक्षी होते हुए भी सत्ताधारियों के नए-नए पैंतरों में आए दिन फँसती रहती है। सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि जाति, मजहब, वर्ग जैसे पैंतरे आदिकालीन युग से आजमाए जा रहे हैं लेकिन जनता आज भी इनमें फँस कर अपनी सामाजिक शान्ति को भंग करती है और ‘गर फिरदौस जमीनस्त’ की अवधारणा के प्रति शंका उत्पन्न कर देती है। इन स्थितियों की ओर इशारा करते हुए अवनीश स्पष्ट शब्दों में लिखते हैं - ‘आँख लाल है/झूम चाल है/लगते कुछ बेढंगे/इज्जत इनसे दूर कि इनकी/जेबों में हैं दंगे।’ (पंच गाँव का)

फ़ैज़ की पंक्ति थी ‘इक उम्मीद से दिल बहलता रहा।’ - ये उम्मीद ग़ालिब के ‘दिल बहलाने के खयाल’ से अलग थी। यहाँ सर्वेश्वर की ‘दिए में तेल से भीगी बाती’ की उम्मीद थी। अवनीश अपने गीतों में चाहे जितनी क्रूर स्थितियों का वर्णन करें लेकिन उम्मीद का दामन नहीं छोड़ते। मैथ्यू ऑर्नाल्ड का मानना था कि ‘सभ्यता के संक्रांति काल में कविता ही अंततः मानव सभ्यता और संस्कृति को पोषित कर सकती है’ - तो अवनीश के गीत भी इस भाव से अलग नहीं हैं। उनके कुछ गीतों में जीवन और समाज की निर्मलता और मासूमियत के ऐसे चित्र देखने को मिलते हैं जो निश्चित ही ऐसी उम्मीद जगाते हैं जिनसे दिल को आने वाले सुखद समय के इन्तजार में बहलाया जा सकता है।

जैसा कि हम पहले ही बात कर आए हैं कि अवनीश के लेखन में परिवेश संचरण की अद्भुत विशेषता है। वे जब एक परिवेश के बारे में लिख रहे होते हैं तो नेपथ्य से उनका इशारा दूसरे परिवेश की ओर भी होता है - ‘बड़े चाव से/बतियाता था/अपना गाँव-समाज/छोड़ दिया है/चौपालों ने/मिलना-जुलना आज।’ (अपना गाँव समाज) यह चिंता वाजिब है जिसमें व्यक्ति, व्यक्ति से कटता जा रहा है और इसी कविता के अंत में यह प्रश्न कि - ‘तोड़ दिया है किसने/आपसदारी का/वह साज।’ (अपना गाँव-समाज) - सीधे-सीधे हमारे देश-समाज में विकसित हो रही उस संस्कृति की ओर इशारा कर रहा है जहाँ सहकारिता की भावना को नष्ट करके व्यक्तिवाद का उत्थान किया जा रहा है। व्यक्ति सिर्फ ‘स्व’ तक सीमित होता जा रहा है।

समाज में पनप रहे इसी स्वार्थ और व्यक्तिवाद की भावना के प्रतिरोध में गीतकार अपनी लोक-संस्कृति की ओर रुख करता है। वह जानता है कि लोक-संस्कृति समाज में आपसी तालमेल और सहकारिता के भाव से लबरेज है। इसीलिए यदि समाज में क्षीण हो रही मानवता को बचाना है और उसकी पुनःस्थापना करनी है तो लोक-संस्कृति से बड़ा और कोई दूसरा टूल नहीं - ‘हर कड़वाहट पर/जीवन की/आज अबीर लगा दे/फगुआ-ढोल बजा दे।’ (फगुआ-ढोल बजा दे) लोक-संस्कृति की यही गंध अवनीश के गीतों को उम्मीदों से भर देती है। लेकिन बतौर जिम्मेदार लेखक अवनीश में समस्या को परखने, उसके यथार्थ को देखने और उसके उपाय सुझाने की समझ - इन सबका बड़ा संतुलन देखने को मिलता है जो उनके लेखक को किसी प्रकार से ‘नॉस्टेल्जिक’ नहीं होने देता। उनके गीतों में एक तरफ सुलेखा, मुनिया, छबिया, जखई बाबा, चिड़िया-चिरौटे और गुड़-धानी की महक है तो दूसरी तरफ शहर, राजपथ, कंकरीट के मकड़जाल, चीलगाह और विज्ञापन की चकाचौंध भी है।

अवनीश के गीतों में कथ्य से अलग जब हम उसकी गीतितत्व और भाषा-शैली पर बात करें तो पाते हैं कि इनके गीतों में गेयता के गुण तो हैं ही साथ ही शब्दों का चयन और कहने की शैली इतनी बोल-चाल वाली है कि गाने वाले के लिए गीत का याद हो जाना बड़ा स्वाभाविक सा लगता है। यथा - ‘मीठी यादें उद्गम की/पानी में घुलती जातीं/सूरज की किरणें-कलियाँ/लहरों पर खिलती जातीं।’ (नदिया की लहरें) हम अवनीश के लेखन के आग्रहमुक्त होने की बात कर आए हैं- तो ये आग्रह मुक्तता सिर्फ कथ्य या विषय तक ही नहीं वरन् भाषा और शब्द चयन तक है। अवनीश अपने गीतों को लोकप्रिय बनाने के लिए भी ऐसा करते हैं इसमें संदेह नहीं लेकिन जैसा कि हम जानते हैं कि गीत गाने के लिए ही होते हैं ताकी उन्हें जनता के बीच गाया और सुनाया जा सके। इसलिए यह बहुत जरूरी हो जाता है कि गीत की भाषा किसी भी तरह कट्टर भाषायी मानसिकता से दूर रहे। लेकिन इसके और भी रास्ते हैं। कहना न होगा कि अवनीश ये सारे रास्ते जानते हैं। उनके गीतों में ‘अजुध्या’, ‘कुट्टी’, ‘नैया’, ‘परसना’, ‘परती’, ‘सेंदुर’, और ‘कनबतियाँ’ जैसे तमाम लोकपुट से लबरेज शब्द मिल जाएँगे।

कुल मिलाकर अवनीश के कागज के इस टुकड़े पर समाज का एक संतुलित सुन्दर आख्यान उकेरा गया है जो उम्मीद तो जगाता ही है कि समाज की नकारात्मक शक्तियों के प्रति किन प्रारूपों के तहत लामबन्द होने की ज़रूरत है और किस तरह हुआ जा सकता है। पीछे फैज की जिस पंक्ति का उल्लेख किया गया है उसी की अगली कड़ी है - ‘इक तमन्ना सताती रही रात भर’ - निश्चित ही उम्मीदों से तो दिल बहलते हैं लेकिन ये तमन्ना तो हर इन्सान को होगी कि समाज में ऐसे सकारात्मक तत्वों का सतत विकास होता रहे जो प्रतिरोध के रूप में हमें, हमारी संस्कृति, हमारी सभ्यता और अंततः मानवता को बचाए रखें और उन्हें आने वाली पीढ़ियों तक संचरित करती रहें। और कहना न होगा कि अवनीश के गीतों से जो उम्मीद बनती है उसका तमन्ना में बदल जाना गैरवाजिब नहीं।


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