अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
08.02.2017


भीगे पंख
मोहित और सतिया /दो/-3

 मोहित ने भौतिक विज्ञान में पढ़ा था- "आइंस्टाइन के सापेक्षता सिद्धांत के आधार पर यह निष्कर्ष निकला है कि जो वस्तु जितने अधिक वेग से चलेगी, समय उस पर उतने ही कम वेग से गुज़रेगा; और यदि कोई वस्तु प्रकाश के वेग / एक सेकंड में 3 लाख किलोमीटर/ से चलने लगे तो समय उस पर स्थिर हो जायेगा- अर्थात वह व्यक्ति एक ही समय में सभी स्थानों पर उपस्थित रह सकता है और अनंत काल तक जीवित रह सकता है, परंतु कठिनाई यह है कि इतना वेग प्राप्त कर लेने पर उस वस्तु का भार अनंत हो जायेगा और अनंत भार की वस्तु को अपने स्थान से हिलाना भी सम्भव नहीं है।" सतिया के घर से लौटने के बाद मोहित की मनोदशा कुछ ऐसी ही हो रही थी जैसे सतिया के घर में घटित घटना का प्रभाव उसके मन पर प्रकाश वेग से प्रवाहित हो रहा हो अर्थात असीम भार का होकर स्थिर हो गया हो। वह चाहे होस्टल में हो, क्लास में हो, या अन्यत्र हो, उसका मन इस चिंता एवं तद्जनित ग्लानि से मुक्त नहीं हो पा रहा था कि विमलसिंह ने उन्हें बंद कमरे में पाकर पता नहीं उनके बारे में क्या सोचा होगा और सतिया उसे स्खलित होते पाकर पता नहीं उसके बारे में क्या सोच रही होगी? तद्जनित ग्लानि के कारण वह सतिया के घर पुनः जाने का साहस न जुटा सका था।

उधर मोहित के जाने के बाद विमलसिंह ने सतिया से ईर्ष्या एवं द्वेष भरे स्वर में पूछा था,

"यह क्यों आया था?"

उत्तर में सतिया ने बस इतना कहा था कि मैंने बुलाया जो था। सतिया के स्वर में इतनी निर्भीकता और स्वच्छंदता का भाव तैर रहा था कि विमलसिंह आगे कुछ भी बोलने का साहस न कर सका था। सतिया के स्वर ने उन दोनों के आपसी सम्बंधों की सीमा रेखा को भी स्पष्ट कर दिया था। राजनैतिक क्षेत्र में विमलसिंह की सहायता से प्रगति पथ पर प्रशस्त सतिया अब विमलसिंह की छाया मात्र नहीं रह गई थी, वरन् एक स्वतंत्र राजनैतिक व्यक्तित्व के रूप में स्थापित हो गई थी। सतिया और विमलसिंह के व्यक्तित्व में इतनी समानतायें थीं कि वे एक दूसरे के समानांतर तो चल सकते थे परंतु एक दूसरे में समाहित नहीं हो सकते थे- दोनों अपनी प्रत्येक सोच और अपने प्रत्येक स्वार्थ को सर्वोपरि मानते थे, दोनों का सामाजिक उद्देश्य अगड़ी जातियों के अत्याचारों से दलितों को मुक्त कराना था और दोनों का राजनैतिक उद्देश्य येनकेन प्रकारेण स्वयं सत्ता, सम्पत्ति एवं शक्ति प्राप्त करना था। अपने उद्देश्य में सफलता प्राप्ति के लिये दोनों को सत्यनिष्ठा अथवा साधनों की शुचिता से कोई सरोकार नहीं था। उनकी मान्यताओं के अनुसार सफलता स्वयं ही साधनों के औचित्य को निर्धारित करती है और विफलता उनके अनौचित्य को।

मोहित सतिया और विमलसिंह की राजनैतिक गतिविधियों और उनके सवर्णों के प्रति किये जाने वाले विषवमन को ध्यान से समाचार पत्रों में पढ़ा करता था - उसे उनके सामाजिक उद्देश्य के औचित्य में कोई संदेह नहीं था परंतु उनके द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया सामाजिक वैमनस्यता एवं विघटन को बढ़ाने वाली लगती थी।

अगले वर्ष मोहित को आई. ए. एस. की प्रतियोगिता में बैठना था, अतः वह प्रयत्न कर अपना ध्यान प्रतियोगिता की पढ़ाई में लगाने लगा और प्रथम प्रयास में ही आई ए. एस. में चयनित हो गया था। तब अपनी सफलता की प्रसन्नता को सतिया से बाँटने का लोभ वह संवरण न कर सका था और नेशनल एकेडेमी आफ़ एडमिनिस्ट्रेशन, मसूरी में प्रशिक्षण हेतु जाने से पूर्व एक बार वह सतिया से मिलने उसके घर पर गया था, परंतु दरवाज़े पर ताला लटकता पाकर वह निराश होकर वापस लौट गया था।

सतिया से मिलन की इच्छा मन में दबाये हुए दूसरे दिन वह मसूरी चला गया था।

- क्रमशः


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें