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ISSN 2292-9754

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09.07.2017


भीगे पंख
 मोहित और रज़िया/दो/-2 

 एक दिन मोहित अपने कार्यालय में बैठा उस दिन की डाक देख रहा था। सरकारी डाक के साथ पोस्ट आफ़िस में बिकने वाले लिफ़ाफ़े में रखी एक लम्बी सी चिटठी मोहित को मिली। चिटठी भेजने वाले ने अपना नाम और पता लिफाफ़े के ऊपर नहीं लिखा था, परंतु उस पर यह लिख दिया था कि यह प्रायवेट है और इसे सिर्फ़ कलेक्टर साहब ही खोलें। उस दिन माह का दूसरा शनिवार होने के कारण शासकीय छुट्टी थी और मोहित अपने आवासीय कार्यालय में ही आवश्यक काम निबटाने हेतु बैठा था। विशिष्ट व्यक्तियों को छोड़कर आज के दिन साधारण मुलाक़ातियों का आना मना था। अतः मोहित और दिनों की अपेक्षा फ़ुर्सत में था। मोहित ने अपने स्टेनो-बाबू को आदेश दे रखा था कि यदि कोई लिफ़ाफ़ा उसका व्यक्तिगत लगे अथवा किसी लिफ़ाफ़े पर मोहित को स्वयं खोलने का आग्रह किया गया हो, तो उसे बिना खोले ही उसके समक्ष प्रस्तुत किया जावे। लिफ़ाफ़ा खोलकर पत्र में "मोहित जी" सम्बोधन देखकर उसे बड़ा अनोखा लगा था क्योंकि उसके सम्बंधियों के पत्रों में अनौपचारिक सम्बोधन हुआ करते थे और फ़रियादी प्रायः हुज़ूर, श्रीमान, सर, सरकार, माई-बाप, आदरणीय जैसे सम्बोधन लिखते थे। इसलिये उर्दू मिली हिंदी में लिखे उस पत्र को पढ़ने से पहले मोहित को जिज्ञासा हुई कि प्रेषक का नाम देख ले। उसने पत्र के अंतिम पृष्ठ को खोलकर जब अंत में रज़िया लिखा देखा तो उसका हृदय बल्लियों उछलने लगा। ताल्लुक़ेदार साहब की कोठी का मंज़र देखकर मोहित ने इसकी कल्पना भी नहीं की थी कि रज़िया उसे पत्र लिखेगी। उसका रोम-रोम उस पत्र में लिखे एक-एक शब्द को पढ़ने को बेचैन हो उठा था।

"मोहित जी,

रोज़ा इफ़्तार की पार्टी में आप कोठी पर तशरीफ़ लाये और चले भी गये। मुझे तो आप के आने का इल्म भी न होता, अगर घर की नौकरानी अल्लाहरक्खी बिस्तर लगाते वक़्त अचानक न बोल पड़ी होती कि इस बार के कलेक्टर साहब तो बिल्कुल छोकरे जैसे हैं। उससे बात करने के इरादे से मेरे मुँह से निकल गया था "अच्छा! उनका नाम क्या है?"। इस पर उसने कहा कि लोगों के मुँह से मोहित शर्मा कहते सुना है। यह नाम सुनकर मेरा दिल धड़का और आप का ख़याल आया, पर फिर मन में शुबहा हुआ कि आप के नाम का कोई और भी हो सकता है। रात में सोते वक़्त असलियत जानने को दिल में बेचैनी बढ़ी, और दूसरे दिन सबेरे मैंने वह काम कर डाला जिसके खुल जाने पर पता नहीं मेरी कौन सी दुर्गति की जा सकती है। मैंने इस कोठी में दाख़िल होने के पंद्रह साल बाद पहली बार अल्लाहरक्खी से गुपचुप इल्तिजा की कि वह आप की मौसी के पास जाकर आप के बारे में पूछ आये। उसी ने आकर बताया कि आप ही इस ज़िले के कलेक्टर हैं और उनसे मिलने आये भी थे। आप की शादी हो जाने और एक बच्चा होने की बात भी बताईं। कलक्टरी और शादी दोनों आप को मुबारक हों।
मैं अपने बारे में क्या बताऊँ? अपनी ज़िल्लत भरी ज़िन्दगी की दास्तान कहने में झिझक तो लगती है पर फिर भी इस उम्मीद पर बयां कर रही हूँ कि आप ने चाहे मुझे भुला दिया हो, पर फिर भी आप की हमदर्दी की हक़दार तो मैं हूँ ही। एक हमदर्द से अपना ग़म बाँट लेने पर शायद धधकते जिगर को कुछ सुकूं मिल सके। आख़िरी बार मज़हबी दंगे के दौरान गर्मियों की छुट्टियों में जब आप आये थे और जल्दी लौट गये थे, उसके बाद पाँच गर्मियाँ और आईं और हर बार आप के आने की आस जागी थी। उसी आस को लेकर मैं मौसी से मिलने चली जाती थी। एक बार गर्मियाँ आने पर आप के आने के ख़्यालों में खोई हुई मैं मौसी के यहाँ जा रही थी कि पीछे से आते ताल्लुक़ेदार साहब के घोड़े की टाप न सुन सकी थी और रास्ता ख़ाली किये बिना बीचोबीच चलती रही थी; वही बेअदबी मेरी ताज़िंदगी क़ैद का सबब बन गई। ताल्लुक़ेदार साहब को घोड़े की रफ़्तार धीमी करनी पड़ी थी और उन्होंने मुझे घूरकर देखा था। फिर मेरे अब्बा पर चुग्गा डालकर शिकार फाँस लिया था। मैं क्या करती? किसके बूते पर लड़ती? काँटे में फँसी मछली सी तड़पती रही और थक-हार कर चुपचाप इस कोठी में चली आयी थी। ग़रीब और बेसहारा होने की वजह से यहाँ मैं दूसरी बेगम बनकर कम आई हूँ बल्कि लौंडी बनकर ज़्यादा- इस बात का एहसास मुझे लम्हां-लम्हां कराया जाता रहा है। पहले दिन से ही मुझे वह ख़रीदी हुई इस्तेमालिया चीज़ समझते रहे हैं और मैं भी अपने को इंसानियत से ठुकराई हुई कोई ऐसी चीज़ समझने लगी हूँ कि जिसके दिल को धड़कने भर की इजाज़त है, महसूस करने की नहीं।

शुरू से मैं उनके लिये एक वहिशियाना नोंच-खसोट की चीज़ रही हूँ- इंसानी जज़्बात की नहीं। पता नहीं उनमें किसी के लिये इंसानी जज़्बात हैं भी या नहीं? क्योंकि जज़्बातों के मामले में बड़ी बेगम की दास्तान मुझसे अलग नहीं है, बस बड़े घर की होने की वजह से उनकी खुलेआम तौहीन नहीं की जाती है। मेरी तो दो बार हड्डियाँ भी तोड़ी जा चुकी हैं- उनकी नोंच खसोट में ना-नुकुर करने पर। अपनी जान पर बन आने पर मैंने कई बार तलाक़ की इल्तिजा भी की है पर इस पर वह और आगबबूला हो जाते हैं। इस कोठी में एक अल्लाहरक्खी ही ऐसी है जो मुझसे हमदर्दी रखती है- एक दिन वह रोते हुए कहने लगी थी,

"बेगम आप तो फिर भी किस्मत वालीं हैं- आप के आने के पहले मेरी बेटी एक रात उठा ली गई थी, और उसी रात वह दुनियाँ जहान के सुख-दुख से बरी हो गई थी। और मैं अभागिनी अपनी बेटी के जल्लाद की गुलामी करने को मजबूर हूँ।"

अब तक उन्हें मुझसे औलाद की उम्मीद थी, पर अब वह भी ख़त्म हो गई है और वह तीसरी बेगम की तलाश में हैं। तब से नौकरानियों के सामने भी मुझे ज़लील किया जाने लगा है।

हो सकता है कि जल्दी ही किसी दिन आप को मेरी इस जहाँ से रुख़्सती की ख़बर मिले, तो मेरी मय्यत पर ज़रूर आइयेगा। मेरी रूह को तसल्ली मिलेगी।

अगर कुछ ज़्यादा लिख गई होऊँ तो माफ़ कीजियेगा।

-रज़िया"

पत्र पढ़कर मोहित की आँखों में आँसू आ गये थे और ताल्लुक़ेदार के प्रति उसके हृदय में क्रोध का ज्वार उमड़ पड़ा था। कलक्टरी की अधिकार-भावना ने भी ज़ोर मारा था और उसके मन में आया था कि वह ताल्लुक़ेदार के विरुद्ध अभियोग दर्ज़ करा दे और उसके यहाँ रेड डलवाकर रज़िया को आज़ाद करा दे। परंतु कुछ कर गुज़रने से डरने की मानसिकता ने उसकी इन उड़ानों पर लगाम लगा कर उसके समक्ष कई भीमकाय प्रश्न खड़े कर दिये थे- क्या ताल्लुक़ेदार साहब के ज़नानख़ाने में पुलिस के घुसने से बखेड़ा नहीं खड़ा हो जायेगा, ख़ासकर तब जब कि ताल्लुक़ेदार को सत्तादल का समर्थन प्राप्त है? क्या मुस्लिम पर्सनल ला के अंतर्गत ताल्लुक़ेदार के विरुद्ध कोई कानूनी कार्यवाही वैध भी होगी? और क्या रज़िया को आज़ाद कराके वह उसे समाज में सम्मान के साथ जीने का अवसर दिला पायेगा? दो दिन तक उधेड़बुन में पड़े रहने के बाद वह मुख्यमंत्री से मिलने इस आशय से चला गया था कि अल्लाहरक्खी की बेटी की हत्या और बेग़मों की प्रताड़ना की बात से उन्हें अवगत कराकर उन्हें विश्वास में लेकर आगे की कानूनी कार्यवाही की जावेगी। मुख्यमंत्री महोदय उसकी बात सुनकर कड़ुआ सा मुँह बनाकर बोले थे,

"तुम्हें किसी की बहू-बेटियों में इतनी रुचि क्यों हैं? क्यों किसी के घरेलू मामलों में टाँग अड़ाते हो? हमारे पास और हज़ारों समस्यायें नहीं हैं क्या?"

मोहित को यह सुनकर गहरा आघात लगा था और वह साहस कर कह बैठा था,

"पर सर पत्नी पर इस प्रकार का अत्याचार और अल्लारक्खी की बेटी की हत्या तो गम्भीर अपराध हैं?"

यह सुनकर मुख्यमंत्री महोदय का मुँह लाल हो गया था और उन्होंने इतना कहकर बात ख़त्म कर दी थी,

"जाओ, अपना काम करो।"

दूसरे दिन जब मोहित अपने ज़िले में पहुँचा, तो उस जनपद के कलेक्टर के पद से सचिवालय में संयुक्त सचिव, गज़ेटियर के पद पर अपने स्थानांतरण का आदेश अपनी मेज़ पर रखा हुआ पाया था।



यद्यपि ऐसी सम्भावना कम ही थी कि रज़िया के पत्र का उत्तर मोहित द्वारा उसके पास पहुँचाया जा सकेगा, परंतु मन की प्रकृति है कि असम्भव परिस्थिति में भी आस नहीं छोड़ता है- रज़िया द्वारा मोहित को पत्र लिख देने के बाद उसके मन में भी एक आस बन गई थी कि मोहित उसके लिये कुछ न कुछ करेगा अथवा किसी न किसी प्रकार उस तक अपना संदेश अवश्य पहुँचायेगा। लम्बी प्रतीक्षा के पश्चात भी मोहित की कोई प्रतिक्रिया न प्राप्त होने पर रज़िया गहन अवसाद की स्थिति में जाने लगी थी। रज़िया ने एक ऐसे व्यक्ति के समक्ष अपना दुखड़ा रो दिया था, जिसकी आत्मीयता पर उसे अटूट विश्वास था परंतु उस व्यक्ति से कोई सहायता तो दूर किसी प्रकार की संवेदना भी न प्राप्त होने पर रज़िया के घायल मन में असह्य चोट लगी थी। मोहित की आत्मीयता पर विश्वास का आधार उसके बचपन की स्मृतियाँ थीं, जिन्हें मोहित से विलग होने के पश्चात भी रज़िया सदैव एक रुचिकर स्वप्न के समान सँजोये रही थी और उस स्वप्न के नायक को रज़िया अपने सर्वस्व का नायक मानती रही थी- उस नायक पर से उसकी श्रद्धा कभी भी कम नहीं हुई थी। इसी विश्वास के कारण उसने मोहित को वह पत्र लिख दिया था और अब उसके द्वारा लिखा प्रत्येक शब्द उसकी स्मृति में बार-बार आकर उसके अहं को कचोट रहा था।

ऐसी अवसाद की स्थिति में एक सायं रज़िया बरामदे में देर से अन्यमनस्क बैठी थी। डूबते सूरज का प्रकाश जो आकाश को अभी तक विभिन्न रंगों में भरता रहा था अब लुप्त हो रहा था। आकाश में प्रकट हो रहे तारों की झिलमिलाहट के अतिरिक्त सर्वत्र अँधेरा छा रहा था। अल्लारक्खी नौकरों वाले अपने कमरे में खाना बनाने चली गई थी। बरामदे की छत से लटकता लम्बी सी जंज़ीर से बंधा पिंजड़ा शांत था क्योंकि उसमें बंद हीरामन तोता अमरूद को कुतर कुतर कर खाने के बाद दिवले में रखे पानी को पीकर ऊँघने लगा था। बड़ी बेगम ताल्लुक़ेदार के तिरस्कार से रूठ कर अपने मायके चली गईं थीं और काफ़ी दिनों से वापस नहीं आईं थीं। अतः उनका कमरा बंद था और भुतहा सा लग रहा था। मानसिक अवसाद की स्थिति में रज़िया उस कमरे को एकटक देखे जा रही थी, परंतु उसके विचारों में वह कमरा नहीं था। वह ऐसी मनःस्थिति में थी जिसमें मनुष्य स्थान विशेष पर उपस्थित होते हुए भी अपने आस-पास घटित होने वाली घटनाओं से तब तक अनभिज्ञ रहता है जब तक उसे झकझोर कर वर्तमान में वापस न लाया जावे।

"हाय मरा। बचाओ, बचाओ!"

रज़िया को पहले लगा कि किसी लम्बी सुरंग के दूसरे कोने से आर्तध्वनि आ रही है, परंतु वह जैसे जैसे स्थितिप्रज्ञ होती गई, वैसे वैसे वह समझ गई कि यह अल्लाहरक्खी के बेटे जु़बेर की हृदयविदारक चीखें हैं और रज़िया के कमरे से ही आ रहीं हैं। जु़बेर बड़ा सीधा-साधा संवेदनशील बच्चा था- रज़िया को अवसाद की स्थिति में देखकर प्रायः वह उसके पास आकर खड़ा हो जाता था और उसे चुपचाप घूरा करता था। रज़िया के मन को उसकी मूक संवेदना से बड़ी राहत मिलती थी।

"अम्मी बचाओ, बचाओ........... छोड़ो, छोड़ो..." जु़बेर की पुकार क्षीण होती जा रही थी जैसे कोई उसका मुँह बंद कर रहा हो। रज़िया को परिस्थिति समझते देर न लगी और उसे जु़बेर की ये चीखें वैसी ही लगीं जैसी उसके मुँह से उसकी सुहागरात पर निकलीं थीं और जिन्हें बरबरता से दबा दिया गया था। आज वह अपने आपे में न रह सकी और उठकर ज़ोर-ज़ोर से अपने कमरे का दरवाज़ा भड़भड़ाते हुए ताल्लुक़ेदार के लिये गालियाँ बकने लगी,

"दरवाज़ा खोल हरामी के पिल्ले! देखती हूँ तू जु़बेर की कैसे लेता है.......आज मैं तेरी में डंडा घुसेड़ूँगी।....................."

आज रज़िया की जु़बान पर अपने अब्बा का भूत बैठ गया था और उसके अब्बा शराब के नशे में धुत होकर जो जो गालियाँ घर में बका करते थे वे सभी गालियाँ फर्राटे से उसके मुँह से निकल रहीं थीं। उसका मुँह अपने अब्बा के मुँह की तरह लाल हो रहा था और उसने अपने हाथ में अपनी जूती ले रखी थी। यह हंगामा सुनकर अल्लारक्खी भी अपने कमरे से आ गई थी और रज़िया की गालियाँ सुनकर समझ गई थी कि उसका छोटा बेटा ताल्लुक़ेदार के कब्ज़े में फँसा है। आज वह भी डर से सिसकने के बजाय रज़िया के साथ कमरे का दरवाज़ा भड़भड़ाने लगी थी और अपनी जूती लेकर ताल्लुक़ेदार से भिड़ने को तैयार हो गईं थी।

"क्या हंगामा मचा रखा है?"- दरवाज़ा खोलते हुए ताल्लुक़ेदार साहब ने दोनों को अपने रोब में लेना चाहा। परंतु वह जब तक सम्हल पाते, उनके मुँह और सिर पर जूतियों की जड़ापड़ मच गई थी। तब तक अन्य गुमाश्ते भी आ गये थे और उन्होंने रज़िया और अल्लाहरक्खी को बड़ी कठिनाई से खींचकर अलग किया था।

ताल्लुक़ेदार सलाहुद्दीन की कोठी पर ऐसी नाकाबिलेबरदाश्त हरकत पहली बार घटित हुई थी।

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दूसरी सुबह ताल्लुक़ेदार साहब की कोठी के सामने सैकड़ों की भीड़ इकट्ठा थी। मुँहअँधेरे से जैसे जैसे यह ख़बर फैल रही थी कि कोठी की पीछे की गली में दीवाल के किनारे छोटी बेगम बेहोश अवस्था में और अल्लाहरक्खी मृत अवस्था में पड़ी पाई गईं हैं, भीड़ बढ़ती जा रही थी। दोनों को उठाकर अंदर लिटा दिया गया था। आने वाले लोग ताल्लुक़ेदार साहब से अफ़सोस ज़ाहिर कर रहे थे और कुछ सम्भ्रांत दिखने वाले व्यक्ति घटना को अल्लाह का लिखा मानकर सहने हेतु उन्हें दिलासा भी दे रहे थे; परंतु घटना का कारण पूछना बेअदबी न समझा जाये, यह मानकर कुछ पूछने का साहस कोई नहीं कर रहा था। वैसे भी ताल्लुक़ेदार साहब अत्यंत ग़मगीन लग रहे थे और किसी की बात का उत्तर केवल सिर हिलाकर ही दे रहे थे। सरकारी अस्पताल के डॉक्टर अन्सारी और थाने के बड़े दरोगा जी भी आ चुके थे। डॉ. अन्सारी ने दोनों का परीक्षण करने के पश्चात अल्लाहरक्खी को मृत घोषित कर दिया था और सिपाही लोग उसका पंचनामा तैयार करने लगे थे। छोटी बेगम की चोटें गम्भीर पाकर डॉ. अन्सारी ने उन्हें तुरंत मेडिकल कालेज ले जाने की सलाह दी थी। ताल्लुक़ेदार साहब पुलिस की जाँच-पड़ताल हेतु रुक गये थे और बेग़म साहब को अपने ख़ास आदमियों के साथ कार से मेडिकल कालेज भेज दिया था। बड़े दरोगा जी ने काग़ज़ी खानापूरी के उद्देश्य से घर के कुछ लोगों से पूछा कि बेग़म साहिबा और अल्लारक्खी छत से कैसे गिरीं थीं परंतु कोई कुछ भी नहीं बता रहा था। उस भीड़ में जु़बेर भी मौजूद था पर वह बदहवास सा अपनी अम्मा की क्षतविक्षत लाश और उसके आस-पास उपस्थित पुलिसवालों को देख रहा था- पिछले दिन ताल्लुक़ेदार साहब ने उसकी जो हालत बनाई थी उस भय से उसकी बोलने की शक्ति ही समाप्त हो गई थी।

कुछ देर बाद ताल्लुक़ेदार साहब ने थानेदार साहब को अलग बुलाकर कहा,

"आप जानते हैं कि मै एक सियासी शख़्सियत हूँ और ऐसे हादसे का सियासी फ़ायदा उठाने में मेरे दुश्मन नहीं चूकेंगे। इसलिये आप जल्दी ही इस मामले को निबटा दें, तो मेहरबानी होगी। जो सबूत ज़रूरी हो, मिल जायेगा।"

तभी ताल्लुक़ेदार साहब के एक कारिंदे ने थानेदार साहब को अलग ले जाकर एक मोटी सी नोटों की गड्डी उनके हाथ में थमा दी थी। फिर एक ख़ास नौकरानी सब के सामने यह बताने के लिये उपस्थित हो गई थी कि छोटी बेग़म ने मुँह अँधेरे अल्लारक्खी को अपने साथ ऊपर छत पर हवा में टहलने के लिये बुलाया था। इस बयान से थानेदार साहब को यह प्रकरण आकस्मिक दुर्घटना का होना साबित करने के लिये वह वांछित सबूत मिल गया था जिसे पाने के लिये पुलिस इतनी देर से कसरत कर रही थी।

पुलिस की कार्यवाही पूरी होने पर ताल्लुक़ेदार साहब छोटी बेग़म की "देखभाल" हेतु मेडिकल कालेज के लिये रवाना हो गये थे। वहाँ यह जानकर कि छोटी बेग़म की बेहोशी यथावत बनी हुई थी और डॉक्टर की इस राय पर कि बेगम के दिमाग़ में इतनी गहरी चोट है कि उनके होश में आने या बचने की सम्भावना अधिक नहीं है, उन्हें दिली तसल्ली हुई थी। परंतु प्रकटतः वह डॉक्टर से बोले थे,

"सब अल्लाह मालिक है। इंसान तो बस कोशिश ही कर सकता है।"

वहाँ कुछ देर रुककर ताल्लुक़ेदार साहब अपने गुमाश्ते को यह हिदायत देकर चले आये थे,

"बेग़म साहब को सिर में चोट है और ठीक होने के लिये आराम की सख़्त ज़रूरत है, इसलिये किसी भी मुलाक़ाती को उनके पास न जाने दिया जाये। अगर बेग़म साहब के होश में आने के इम्कान हों तो सबसे पहले उन्हें इत्तिला की जाय।"



"मोहित, तुम्हें पता चला कि सलाहुद्दीन की छोटी बेग़म मेडिकल कालेज में भर्ती हैं?"- मोहित सचिवालय में अपने कार्यालय में एक पत्रावली को पढ़ रहा था जब उस कलेक्टर, जिसे अपने स्थानांतरण पर वह जनपद का चार्ज देकर आया था, ने उसे फोन पर यह सूचना दी थी। चार्ज देते समय मोहित ने अपने उत्तराधिकारी को सलाहुद्दीन की करतूतों के विषय में संक्षेप में अवगत करा दिया था और अपने स्थानांतरण का कारण सलाहुद्दीन की राजनैतिक पहुँच होना बता दिया था। इसी कारण से उसे सलाहुद्दीन की कोठी में घटित इस घटना के विषय में मोहित को बताने का ध्यान आया था। मोहित का हृदय एक क्षण को धक से रह गया था। रज़िया के साथ अघट के घटने की आशंका उसके मन में पहले से बैठी हुई थी, उसके मन में यह चोर भी छुपा हुआ था कि रज़िया द्वारा अपनी व्यथा कथा उस तक पहुँचाने पर भी वह रज़िया के लिये कुछ भी नहीं कर पाया था। तमाम नौकरीपेशा लोगों की मनोवृत्ति की भाँति ज़िला कलेक्टर के पद से स्थानांतरण कर दिये जाने पर वह यह सोचकर चुप बैठ गया था कि इस राजनैतिक माहौल में वह इससे अधिक कर भी क्या सकता है। अपनी मनोग्रंथियों के कारण कोई क्रांतिकारी क़दम उठा लेना उसके साहस की सीमा के बाहर की बात थी और फिर प्रशासकीय सेवा के नियम एवं प्रलोभन ऐसे होते हैं कि किसी क्रांतिकारी व्यक्ति को भी लकीर का फ़कीर बना दें। मोहित इस पारिवारिक एवं सामाजिक भय से भी ग्रस्त था कि छोटी बेग़म में अधिक रुचि दिखाने पर कोई उनके सम्बंधों पर उँगली न उठा दे। फोन सुनकर अपने को संयत रखने का प्रयास करते हुए मोहित ने कहा,

"क्यों क्या हुआ?"

"कल सुबह छोटी बेग़म और अल्लाहरक्खी कोठी के पीछे की गली में छत से गिरी हुई पाई गईं थीं। अल्लारक्खी तो पहले ही दम तोड़ चुकी थी, पर छोटी बेगम को बेहोशी की हालत में मेडिकल कालेज ले जाया गया है। यद्यपि पुलिस की रिपोर्ट में रात में छत पर टहलते समय अंधेरे में गिर जाने का मामला बताया गया है, परंतु आप ने ताल्लुक़ेदार साहब के विषय में जो बातें मुझे बताईं थीं, उससे मुझे दाल में काला लगता है। पर आप जानते ही हैं कि ताल्लुक़ेदार के विरुद्ध कोई गवाही मिलना कितना कठिन है।"

फोन के तार पर तरंगित हर स्वर के साथ मोहित का हृदय कम्पित हो रहा था। वह थोड़ी देर की चुप्पी के बाद बोला,

"यार फिर भी सही बात पता लगाने की कोशिश करना। ज़रूर यह उस साले ताल्लुक़ेदार की ही करतूत होगी। ऐनीवे थैंक्स फ़ॉर दी इन्फ़ॉर्मेशन।"

टेलीफोन को वापस क्रैडिल पर रख देने के पश्चात रज़िया की चोट की गम्भीरता का आभास मोहित के मानस में समाने लगा- रज़िया जो उसके बचपन की साथी है, रज़िया जो मोहित की किशोरावस्था में उसकी स्वप्नसंगिनी रही है, रज़िया जो मोहित को सदैव अपना मानती रही है, रज़िया जिसने उस पर भरोसा कर अपने दैत्य को उसके समक्ष उजागर कर दिया था, आज मोहित की अकर्मण्यता के फलस्वरूप जीवन और मृत्यु के बीच झूल रही है। फिर यह सोचकर कि कोई कुछ कहे देखा जायेगा, उसने मेडिकल कालेज जाने का निश्चय कर ड्राइवर को गाड़ी लगाने को कह दिया।

सचिवालय से मेडिकल कालेज के रास्ते में प्रतिदिन की भाँति काफ़ी भीड़ थी- बसें, कारें, रिक्शे, स्कूटर, सायकिलें और गायें-भैंसें सड़क पर अपना एकछत्र प्रभुत्व मानकर हार्न, घंटी आदि बजाते हुए अथवा सामने वाले को ठेलते हुए चले जा रहे थे, परंतु उस समय मोहित के लिये ये सब अस्तित्वहीन थे। वह बस रज़िया के उस साहचर्य में खोया हुआ था जो उसने बचपन में उसके साथ भोगा था। गर्मियों में मोहित के आने पर मोहित की मौसी तलैया किनारे जामुन के पेड़ की डाल पर झूला डलवा दिया करतीं थीं। एक दिन रज़िया को उस पर बिठाकर मोहित पेंग से पेंग बढ़ा रहा था। पेंगों के बढ़ने के साथ रज़िया खिलखिलाकर हँसती थी और मोहित उसकी खिलखिलाहट पर उतने अधिक ज़ोर से पेंग बढ़ाता था, कि तभी एक पेंग के साथ रज़िया झूले से खिसककर नीचे गिर गई थी। मोहित ने झूला रोककर देखा कि रज़िया के घुटने से ख़ून निकल रहा है और आँखों से आँसू। उसको रोता देखकर मोहित का हृदय भर आया था और उसके नेत्र छलछला आये थे। मोहित रज़िया को चुप कराने लगा था और अपनी उँगलियों से उसके आँसू पोंछने लगा था। फिर उसे सहारा देकर मौसी के पास ले गया था जिन्होंनें रज़िया का घाव धोकर उस पर मलहम लगा दिया था। उस दिन मोहित बड़ा दुखी रहा था, और उसे सांत्वना तभी मिली थी जब दूसरे दिन उसने रज़िया को मुस्कराते हुए अपने सामने पाया था..... "आज जब रज़िया को इतने बड़े बड़े घाव लगे हैं तब उसके आँसू पोछने वाला उसके पास कौन होगा? वहाँ पहुँचकर भी वह उसे क्या सांत्वना दे सकेगा? पता नहीं वह रज़िया के निकट जा पायेगा भी या नहीं...... रज़िया को कितनी गहरी चोटें लगीं हैं और पता नहीं कि वह बचेगी भी या नहीं?..... यह ज़रूर उस साले ताल्लुक़ेदार की ही करतूत होगी, उसी ने रज़िया को छत से ढकेल दिया होगा...... पर मैंने भी उसकी क्या सहायता की? हो सकता है कि मेरी ओर से कोई आश्वासन न पाकर उसी के जीने की इच्छा समाप्त हो गई हो और वह छत से कूद पड़ी हो तथा अल्लारक्खी उसे बचाने में गिर गई हो..... पर हुआ सब कुछ उस साले ताल्लुक़ेदार की करतूतों से ही है; मेरी चले तो साले को ज़िदगी भर जेल में सड़ाऊँ। पर इन साले पोलिटिशियन्स की वजह से बदमाशों को कहाँ सज़ा मिल पाती है?"

"सर, किस वार्ड में चलना है?" ड्राइवर की आवाज़ सुनकर मोहित ने चौंककर देखा कि मेडिकल कालेज आ गया है और सामने सफ़ेद जैकेट पहने, गले में स्टेथोस्कोप डाले कुछ नवयुवक डॉक्टर तेज़ी से चले जा रहे हैं।

"प्रायवेट वार्ड नम्बर पाँच।" मोहित ने उत्तर दिया।

गाड़ी से उतरकर मोहित ज्यों ही प्रायवेट वार्ड नम्बर पाँच के दरवाज़े की ओर बढ़ने लगा, एक मुस्टंडा सा आदमी उसके सामने आ गया। वह मोहित को रोकने के लिये कुछ कड़ी बात कहने वाला था कि मोहित को पहचानकर भीगी बिल्ली बनकर बोला,

"हुज़ूर, आप यहाँ कैसे?"

मोहित समझ गया कि ताल्लुक़ेदार का कोई आदमी है और बोला,

"सुना है कि छोटी बेग़म छत से गिरकर घायल हो गईं हैं और यहाँ भर्ती हैं। मैं उन्हें देखने और ताल्लुक़ेदार साहब से अफ़सोस जताने आया हूँ।"

"पर ताल्लुक़ेदार साहब तो यहाँ हैं नहीं और बेग़म अभी बेहोश हैं।" वह आदमी कोई बहाना बनाकर मोहित को कमरे में जाने से रोकना चाहता था परंतु मोहित के पद का ध्यान कर हिम्मत नहीं कर पा रहा था।

उसकी मनोदशा भाँपकर मोहित ने कहा,

"कोई बात नहीं। मैं दो मिनट ही देखूँगा" और बिना उत्तर की प्रतीक्षा किये कमरे में अंदर घुस गया।

लोहे के पलंग पर रज़िया बेहोश पड़ी थी- उसके सिर में अस्पताली पट्टी बँधी थी और उसका चेहरा मुर्झाया हुआ और पीला था परंतु उस चेहरे में भी रज़िया के बचपन वाले चेहरे की झलक मोहित को दिखाई दे रही थी। रज़िया की दाहिनी बाँह में सुई लगी हुई थी जिससे ग्लूकोज़ की बोतल से टपकता ग्लूकोज़ बूँद-बूँद रज़िया के रक्त में प्रवेश कर रहा था। बायें हाथ में पट्टी बँधी थी जो ख़ून से काफ़ी लाल थी और पैरों पर चादर पड़ी हुई थी। उस क्लांत शांत चेहरे को मोहित एकटक देखता रहा और उसका मन हुआ कि वह रज़िया को पुकारे और उसके निकट बैठकर उसका हाथ अपने हाथ में लेकर उसे सांत्वना दे, परंतु उस मुस्टंडे आदमी की उपस्थिति के कारण वह वर्जनाग्रस्त हो गया था। पता नहीं मोहित के अंतर्मन से प्रवाहित तरंगों के स्पर्श से अथवा अन्य किसी कारण से रज़िया ने अपने नेत्रों की पुतलियाँ कुछ हिलाईं, परंतु फिर वे ऐसे शांत हो गईं जैसे पुतलियों के हिलाने का कष्ट सहा न जा रहा हो। उसकी यह दशा देखकर मोहित अपने नेत्रों में उमड़ते अश्रुओं को रोकने हेतु कमरे से बाहर आ गया और डॉक्टर के पास जाकर अपना परिचय देते हुए पूछा,

"ह्वाट इज़ हर कंडीशन?/ उसकी दशा क्या है?"

"देयर इज़ डीप ब्रेन इंजरी बिसाइड्स अदर मल्टीपुल फ्रै़क्चर्स। प्रौग्नौसिस इज़ नॉट गुड / अन्य हड्डियों के टूटने के अतिरिक्त मस्तिष्क में गहरी चोट है, लक्षण अच्छे नहीं हैं।" डॉक्टर ने स्पष्टता से उत्तर दिया।

"प्लीज़ डू योर बेस्ट टु सेव हर / कृपया उसे बचाने का हर सम्भव प्रयास कीजियेगा।"

डॉक्टर ऐसे अनुरोध प्रायः सुनता रहता था और उसने रटा रटाया उत्तर दे दिया,

"रेस्ट एश्योर्ड, आई शैल डू माई बेस्ट /निश्चिंत रहिये, मैं अपनी क्षमता भर पूरा प्रयास करूँगा"

 

मोहित जब वापस अपने कार्यालय पहुँचा तो एक नपुंसक ग्लानि एवं क्रोध से ग्रस्त था। वह जानता था कि प्रदेश का कोई भी न्यायतंत्र ताल्लुक़ेदार के विरुद्ध कुछ भी करने वाला नहीं है। अतः उसने प्रधानमंत्री के नाम ताल्लुक़ेदार के विरुद्ध एक शिकायती पत्र लिखा जिसमें अल्लाहरक्खी की पुत्री से बलात्कार और हत्या, छोटी बेग़म पर अमानुषिक अत्याचार और जनसाधारण पर निरंकुश शासन की घटनाओं का उल्लेख करते हुए केन्द्रीय एजेंसी को जाँच सौंपने का अनुरोध किया गया था। उसमें यह भी लिख दिया था कि अपनी कलेक्टरी के दौरान उसने मुख्यमंत्री महोदय को विश्वास में लेकर ताल्लुक़ेदार के विरुद्ध कार्यवाही की योजना बनाई थी, परंतु मुख्यमंत्री महोदय से बात चलाने पर उसका अविलम्ब स्थानांतरण कर दिया गया था। अतः केन्द्र शासन से ही ताल्लुक़ेदार के विरुद्ध कार्यवाही की आशा की जा सकती हे।

दो दिन बाद मोहित पुनः अपने को न रोक सका ओर रज़िया को देखने मेडिकल कालेज चला गया, परंतु जब वह वहाँ पहुँचा तो ताल्लुक़ेदार के उसी मुश्टंडे ने उसे सामने खड़े होकर रोक दिया और अकड़ से बोला,

"हुज़ूर! माफ़ कीजियेगा, ताल्लुक़ेदार साहब किसी भी बाहरी आदमी को बेग़म साहब के कमरे में जाने की सख़्त मुमानियत कर गये हैं।"

मोहित को क्रोध तो बहुत आया परंतु अपने पास रज़िया को देखने जाने का कोई स्वीकार्य बहाना न होने के कारण वह अपने क्रोध को पी गया था। डॉक्टर से मिलने पर उसने बताया था,

"शी इज़ एट दी टर्मिनल स्टेज /वह आख़िरी साँसें गिन रही है"

मोहित के मुँह से अनायास उच्छवास निकल गया था।

अगले सप्ताह मोहित को उसका देहली के लिये स्थानांतरण किये जाने एवं अविलम्ब प्रस्थान करने का आदेश प्राप्त हो गया था।

दिल्ली जाने हेतु रात्रि की गाडी पकड़ने के लिये स्टेशन जाते समय वह एक बार फिर मेडिकल कालेज गया।

उस समय रज़िया का शव वार्ड से बाहर निकाला जा रहा था।

- क्रमशः


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