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ISSN 2292-9754

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08.02.2017


भीगे पंख
  मोहित और रज़िया/दो/-1

"मोहित तुम मौसी को तो भूल ही गये?"

मौसी के शब्दों में उलाहना थी परंतु उनकी आँखें आनंदातिरेक से झर रहीं थीं। वह अपने घर के आँगन में मोहित को सीने से लगाये खड़ीं थीं। इतने वर्षों बाद मोहित को देखकर उनका तन-मन पिघल रहा था।

आज बीस बरस बाद मोहित उनके यहाँ अचानक आ धमका था- साँकल खोलने पर पहले तो वह सामने खड़े व्यक्ति को पहचान ही नहीं सकीं थीं और बाहर कार के पास खड़े वर्दीधारी ड्राइवर और चपरासी को देखकर हतप्रभ थीं, पर जैसे ही पैर छूने को झुकते हुए मोहित बोला था "मौसी!" वैसे ही उसके स्वर ने उनके कर्णपट को झंकृत कर विस्मृति की खोह से मोहित के बचपन वाले भोले-भाले चेहरे को उनके समक्ष लाकर खड़ा कर दिया था। मोहित के मूँछ वाले चेहरे में बचपन की लुनाई अभी भी विद्यमान थी और पहचानते ही मौसी ने मोहित को उसी तरह बाँहों में भर लिया था जैसे बचपन में भर लेतीं थीं। संतानविहीन मौसी को मोहित से सदैव अपनत्व रहा था- उसमें उन्हें अपने जीवन के खोखलेपन को भरने का साधन दिखाई देता था। मोहित को भी मौसी में बड़ा अपनापन लगता था और उसे प्रायः ममतामयी मौसी की याद आती रहती थी, परंतु कुछ व्यस्ततावश, कुछ परिस्थितिवश और मुख्यतः अपने संकोची स्वभाव के कारण मोहित इस बीच मौसी से मिलने नहीं आया था। मोहित के विवाह के कुछ दिन पहले ही उसके मौसा की मृत्यु हो गई थी, अतः मौसी मोहित के विवाह में भी नहीं पहुँच सकीं थीं। अपनी सेवानिवृत्ति से पूर्व मोहित के मौसा ने फ़तेहपुर तहसील परिसर के निकट ही एक मकान बनवा लिया था और सेवानिवृत्ति के उपरांत सरकारी मकान छोड़कर उसी में रहने लगे थे।

सहज होने पर मौसी मोहित का हाथ पकड़कर उसे अंदर कमरे में ले गईं थीं, परंतु ममतावश उसका हाथ नहीं छोड़ पा रहीं थीं। मौसी का दो कमरे का साफ़-सुथरा मकान था। मौसा का पलंग आज खाली पड़ा था, जिसे देखकर मोहित के नेत्र छलछला आये थे। मोहित का मुँह देखकर मौसी उसके मन का दुख भाँप गईं थीं, पर मौसा की मृत्यु के विषय पर बोलकर वातावरण को बोझिल बनाना ठीक न समझकर मोहित को सामने रखी कुर्सी पर बैठने का इशारा कर स्वयं सामने पलंग पर बैठ गईं थीं। फिर बोलीं थी,

"बेटा, तुम्हारे मौसा ने रिटायर होने से पहले यह घर बनवा लिया था और रिटायरमेंट के बाद हम लोग सरकारी घर छोड़कर इसमें आ गये थे। तुम आजकल कहाँ तैनात हो? तुम्हारे आई. ए. एस. में चुने जाने की ख़बर जिज्जी से मिली थी, उसके बाद तुम्हारी ख़बर कभी-कभी अख़बार सें मिल जाती थी, पर इधर काफ़ी दिन से आँख में तकलीफ़ होने के कारण अख़बार पढ़ना भी बंद सा हो गया है अतः तुम्हारे बारे में कुछ नहीं पता चला।"

मोहित ने उत्तर दिया,

"मौसी, मैं आप के ही ज़िले में कलेक्टर के पद पर तैनात हो गया हूँ और मैंने कल ही कार्यभार सँभाला है।"

यह सुनकर मौसी गदगद हो गईं और बोलीं,

"बेटा, तब तो तुमसे मिलना होता रहेगा।"

मोहित हामी में मुस्करा दिया। फिर मौसी मोहित के लिये चाय बनाने लगीं और उससे उसके बीते जीवन के विषय में पूछतीं रहीं। मोहित उन्हें अपनी पढ़ाई, आई. ए. एस. में चयन, प्रशिक्षण एवं विभिन्न पदों पर नियुक्ति के विषय में बताता रहा। जब मौसी ने चाय का प्याला मोहित के हाथ में थमा दिया और स्वयं भी सामने बैठकर चाय पीने लगीं, तब मोहित ने झिझकते हुए पूछा था,

"मौसी! रज़िया अब कहाँ है?"

यह पूछते हुए मोहित का लज्जा से लाल होता हुआ चेहरा मौसी की निगाह से छिपा न रह सका था। उन्हें मोहित के रज़िया के प्रति बचपन के आकर्षण का भान तो था, परंतु अब स्वयं का विवाह हो जाने पर और कलेक्टर के पद पर आसीन हो जाने के पश्चात भी रज़िया के विषय में पूछने पर उसे झिझक का अनुभव होगा, ऐसा उनके अनुमान से परे था। मोहित की हिचकिचाहट से मौसी को उसमें अभी भी बाल-स्वरूप मन होने का आभास हुआ और उसके प्रति और प्यार उमड़ा, पर उसको प्रकट न करके वह मोहित से बोलीं थीं,

"रज़िया तो अब तालुक़दारिन बन गई है। एक दिन यहाँ के ताल्लुक़ेदार सलाहुद्दीन की नज़र उस पर पड़ गई थी और उन्होंने रज़िया के पिता को पैगा़म भेजकर उससे निक़ाह कर लिया।"

यह सुनकर मोहित के हृदय में एक अनचाही टीस सी उत्पन्न हुई थी क्योंकि उसे लगा था कि हो सकता है कि रज़िया इतने बड़े आदमी से विवाह कर उसे भूल गई होगी, परंतु तभी मौसी आगे कहने लगीं थीं,

"रज़िया विवाह से पूर्व बहुत रोती रही थी, पर न तो उसके मन की बात जानने की इच्छा उसके घरवालों की थी और न रज़िया कभी खुली कि उसके मन में क्या था।"

फिर अपने अनुमान को अप्रत्यक्ष ढंग से बताने के इरादे से मौसी आगे कहने लगीं थीं,

"हर साल गर्मी आने पर रज़िया तुम्हारे आने की आस में बार-बार मुझसे पूछने आती थी और तुम्हारा कोई समाचार न पाकर बुझी-बुझी सी हो जाती थी। कहते हैं कि अपनी शादी में रज़िया ने काज़ी के सामने अपने होंठों से शादी कुबूल भी नहीं की थी पर नक्कारखाने में तूती की आवाज़ की कौन परवाह करता है- उसके बिना बोले ही सबने उसकी हामी मान ली थी और उसके मौन को मुबारकों के शोर में डुबो दिया था। ताल्लुक़ेदार साहब का रज़िया से विवाह करने का मुख्य उद्देश्य उससे संतान पा लेना था क्योंकि पहली बेगमों से उनको कोई औलाद नहीं थी और किसी फ़कीर ने उन्हें बताया था कि किसी कमसिन से शादी करो तो संतान ज़रूर होगी। पर शादी को कितने साल बीत चुके हैं, अभी तक सतिया की गोद नहीं भरी है।"

यह सब सुनकर मोहित का मन न जाने कैसा-कैसा हो रहा था। परंतु अब रज़िया के विषय में मौसी से और पूछने का उसका साहस बढ़ गया था; मौसी के रुकने पर वह बोला था,

"क्या विवाह के बाद रज़िया कभी आप से मिलने आई थी?"

"नहीं विवाह के बाद ताल्लुक़ेदार साहब ने रज़िया को कभी मायके आने की इजाज़त नहीं दी- यहाँ तक कि मीरअली की मौत पर भी नहीं। अब तो उसके भाई लोग भी वह घर छोड़कर न जाने कहाँ चले गये हैं।"

यह सुनकर मोहित का मन निराशाग्रस्त हो रहा था क्योंकि ऐसी परिस्थिति में रज़िया के विषय में अन्य कोई जानकारी सम्भव प्रतीत नहीं हो रही थी। फिर मोहित और मौसी के बीच कुछ क्षण तक मौन का साम्राज्य छाया रहा- जैसे दोनों रज़िया की चिंता में खो गये हों। मौन असह्य हो जाने पर उसे तोड़ते हुए मौसी कहने लगीं थीं,

"ताल्लुक़ेदार साहब के ज़नानखाने की बात बाहर किसी को पता तो चलती नहीं है- कहा नहीं जा सकता कि रज़िया किस हाल में है?"

कुछ देर के उपरांत मोहित जब मौसी से विदा लेकर जाने लगा था तो उसको तीव्र उत्कंठा हुई कि वह उस तलैया की ओर जाये जहाँ वह रज़िया के साथ खेला करता था और रज़िया का घर भी देख ले जहाँ उसे देखकर रज़िया की अम्मी की बुझी-बुझी आँखों में प्रसन्नता की एक लहर आ जाती थी, परंतु वह तहसील वालों को अपने वहाँ आने की जानकारी नहीं कराना चाहता था। वह उन्हें बिना ख़बर किये चुपचाप मौसी से मिलने आया था। तहसील के और निकट जाने पर कलेक्टर के आने की बात जानकर वहाँ भीड़ लगने लगती, और वह ज़िले का कलेक्टर होकर अन्यों की उपस्थिति में अपनी इस सामान्य मानवों वाली कामना का प्रदर्शन कैसे कर सकता था?

घर्र की ध्वनि के साथ स्टार्ट होकर उसकी कार तलैया वाली उस दिशा की विपरीत दिशा में चल दी थी, जिस ओर जाने को मोहित का मन व्याकुल हो रहा था।



"आदाब, कलेक्टर साहब।"- कहते हुए ताल्लुक़ेदार सलाहुद्दीन मोहित के ड्राइंग रूम में घुसे थे।
"आदाब" कहकर मोहित ने उठकर उनसे हाथ मिलाया था और साथ ही उनके मुख पर गहन दृष्टि डाली थी। ताल्लुक़ेदार के सिर के बाल सफ़ेद हो रहे थे और उनके चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ने लगीं थीं। उनकी शेरवानी से उनकी तोंद बाहर निकलने को आतुर थी। मोहित को उनकी आयु पचास से अधिक लगी थी। ताल्लुक़ेदार को देखकर वह सन्न रह गया था क्योंकि उसके अनुमान से रज़िया तो अभी तीस के आस-पास ही होगी। उस पर ताल्लुक़ेदार के चेहरे पर मोहित को एक अजीब काँइयाँपन झलकता दिखाई दिया था। उनके होंठ तिरछा करके बोलने पर उनकी अधपकी मूछों के हिलने डुलने में भी उनकी मक्कारी उद्भासित होती थी। मोहित को उनके हाथ का स्पर्श भी केंचुए के स्पर्श सम लिजलिजा लगा था और उसने ताल्लुक़ेदार की पकड़ ढीली होते ही अपना हाथ खींच लिया था। तब तक चपरासी एक ट्रे में दो गिलासों में कोल्ड ड्रिंक ले आया था और पहले ताल्लुक़ेदार साहब को पेश किया था। वह एक गिलास उठाकर उसे ऐसे पीने लगे थे जैसे किसी सुंदरी के होंठ का रस पी रहे हों। मोहित के मन में वितृष्णा का एक ऐसा भाव जाग्रत हो रहा था कि उसकी इच्छा साथ पीने की नहीं हुई थी और उसने जु्काम होने का बहाना बनाकर कोल्ड ड्रिंक लेने से मना कर दिया था। उसे ताल्लुक़ेदार साहब में एक ऐसा प्रतिद्वंद्वी दिखाई दे रहा था जिसने न केवल मोहित के क्षेत्र को जीत लिया था वरन् उसे बेरहमी से तहस नहस भी कर रहा था। जल्दी छुट्टी पाने के निहित उद्देश्य से वह बोल पड़ा था,

"कहिये ताल्लुक़ेदार साहब, कैसे तकलीफ़ की?"

ताल्लुक़ेदार साहब अपनी जु़बान में चाशनी घोलते हुए बोले थे,

"हर साल मेरे ग़रीबख़ाने पर अलविदा की नमाज़ वाले जुमे पर रोज़ा इफ़तार होता है जिसमें जिले के कलेक्टर और दूसरे हुक्मरान शिरकत करते हैं। आप से गुज़ारिश है कि अगले जुमे को शाम सात बजे तशरीफ़ लायें।"

मोहित के "वाइब्ज़" ताल्लुक़ेदार से बिल्कुल नहीं मिल रहे थे और उसका मन हुआ कि कोई बहाना बना कर मना कर दे, परंतु रज़िया के मिल जाने अथवा उसके विषय में कुछ ज्ञात हो जाने की आशा ने मोहित को निमंत्रण स्वीकार कर लेने को विवश कर दिया था।

फिर दो दिन पश्चात ताल्लुक़ेदार सलाहुद्दीन के यहाँ रोज़ा इफ़तार में मुख्य मंत्री महोदय के सम्मिलित होने का कार्यक्रम मोहित को प्राप्त हो गया था। अब उसे औपचारिकतावश भी उसमें सम्मिलित होना आवश्यक हो गया था। जब मोहित ताल्लुक़ेदार साहब के यहाँ पहुँचा, तो वहाँ के प्रबंध देखकर दंग रह गया था। एक अच्छा ख़ासा जलसा था। मुख्य मंत्री महोदय के आने पर उसने देखा कि वह ताल्लुक़ेदार साहब से बड़े धुलमिलकर बात कर रहे थे- इससे उपस्थित व्यक्तियों पर ताल्लुक़ेदार साहब का रोब ग़ालिब हो रहा था और मोहित भी प्रभावित हुए बिना न रह सका था।

परंतु मोहित के नेत्र जिसके दर्शन को आकुल हो रहे थे, उसकी झलक भी नहीं मिल पा रही थी। पर्दा प्रथा इस सीमा तक लागू थी कि उपस्थित सैकड़ों लोगों की भीड़ में एक भी स्त्री नहीं थी। रज़िया के बारे में किसी से कुछ भी पूछने पर तो हज़ार सवाल खड़े हो सकते थे। रोज़ा इफ़तार का प्रबंध कोठी के बाहर स्थित विशाल चबूतरे पर था जहाँ से कोठी की छत के कंगूरे दिखाई पड़ते थे। पूर्णतः निराशाजनक परिस्थिति होने पर भी मानव मन में एक आशा लगी ही रहती है- इस दौरान मोहित की भी निगाह छत पर बने कंगूरों पर इस आशा में जाती रही थी कि रज़िया उनके बीच कहीं दिखायी पड़ जाय, पर हर बार उसे छत पर वीरानगी ही मिली।

मुख्यमंत्री महोदय अन्यत्र व्यस्त होने के कारण शीघ्र चल दिये थे, तब ताल्लुक़ेदार साहब ने विशेष आग्रह कर मोहित को रोक लिया था और बैठक में लाकर उसकी आवभगत में अपना पूरा ध्यान देने लगे थे। मोहित के मन में फिर आशा जागी थी कि शायद वह अब रज़िया को बुला लें, परंतु रज़िया अथवा ताल्लुक़ेदार की कोई बेगम सामने नहीं आई थीं। मोहित का ध्यान इस तथ्य पर विशेष रूप से आकृष्ट हुआ था कि ताल्लुक़ेदार साहब उसकी तो बड़ी आवभगत कर रहे थे, परंतु अपने नौकरों और अपनी रियाया से ऐसे व्यवहार कर रहे थे जैसे वे उनके क्रीतदास हों। एक नौकर को उन्होंने मोहित के सामने ही माँ-बहिन की गालियाँ सुना दीं थीं और उस बेचारे ने उन्हें ऐसे स्वीकार कर लिया था जैसे वे उसकी दिनचर्या का एक अंग हों। मोहित को इससे बड़ी वितृष्णा हुई थी और रोज़ा-इफ़्तार से लौटने पर मोहित को अपने पर गहरा क्षोभ हो रहा था कि उसने ताल्लुक़ेदार का निमंत्रण क्यों स्वीकार किया था। यह सोचकर भी वह अवसाद के सागर में गोते लगा रहा था कि अब इस जीवन में रज़िया से मुलाकात की कोई आशा नहीं है।

- क्रमशः


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