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ISSN 2292-9754

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10.08.2017


परिचर्चा
सुमन कुमार घई
संपादक, साहित्य कुंज.नेट

प्रिय मित्रो,

समय-समय पर हिन्दी साहित्य के प्रेमी, लेखक, पाठक कोई न कोई ऐसा विषय सोशल मीडिया, विचार मंचों या अन्य मंचों पर उठाते हैं, जिस पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक हो जाता है। जितना मनन की प्रक्रिया महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण है कि मनन-जनित समाधानों को सामूहिक मंच पर प्रस्तुत किया जाए ताकि अन्य पाठक भी इस विचार प्रक्रिया में सक्रिया भाग ले सकें।

प्रायः साहित्यक पत्रिकाओं में संपादकीय केवल अपनी बात ही कहते हैं। शायद मुझमें ऐसा करने की क्षमता नहीं है। बुद्धिजीवी न होकर अधिक व्यवहारिक होना ही मेरी नियति है - इसलिए अक्सर ऐसे साहित्यिक प्रश्न अपने संपादकीयों में उठाता रहता हूँ जो कि मुझे् कचोटते हैं। जीवन के पहले २० वर्षों के बाद बाक़ी का जीवन विदेश में बीता है। स्वाभाविक है कि मेरे अनुभव और विचारधारा पश्चिमी समाज से प्रभावित है। परन्तु मैं न तो भारतीय संस्कृति को भूला हूँ और न ही हिन्दी भाषा से कटा हूँ। क्योंकि हिन्दी और अँग्रेज़ी दोनों ही साहित्य में रुझान है तो समय-समय पर दोनों भाषाओं के साहित्य, उसकी लोकप्रियता, लेखकीय गुणवत्ता इत्यादि की तुलना भी करने लगता हूँ। खेद तो इस बात का होता जब हर दृष्टि से हिन्दी साहित्य को पिछड़ा हुआ पाता हूँ। यह तथ्य अन्तःस में पीड़ा पैदा करता है जो कि मेरे सम्पादकीयों में अक्सर उभरती है - और समाधान खोजने की ललक उत्पन्न होती है। लेखन, प्रकाशन और पाठक से सम्बन्धित सारे ढांचे को बदल डालने के लिए मन बेचैन होने लगता है। परन्तु अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। एक सामूहिक प्रयास की आवश्यकता है। एक सामूहिक विचारधारा का होना अनिवार्य है। इसी सोच के साथ यह स्तम्भ आरम्भ कर रहा हूँ।

आप सभी से विनय है कि साहित्य कुंज के सम्पादकीयों में उठाये गए विषयों पर विस्तृत चर्चा करे, अपने विचारों को क़लमबद्ध करें और प्रकाशन के लिए भेजें। यह आलेख, लघु-आलेख सदा साहित्य कुंज के इस स्तम्भ में रहेंगे। अगर आप किसी पुराने विषय पर भी लिखना चाहें, लिखें और भेजें। इस स्तम्भ में सभी विषय निरम्तर सामयिक रहेंगे।


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