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ISSN 2292-9754

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01.23.2019


हिन्दी टाईपिंग रोमन या देवनागरी और वर्तनी
शकुन्तला बहादुर

आदरणीय सुमन जी,

सर्वप्रथम नयनों में नव-ज्योति प्राप्त करने के लिये आपको हार्दिक बधाई !! प्रभु की कृपा के लिये हम सभी आभारी हैं। प्रभु आपकी नैनज्योति पर आजीवन कृपादृष्टि बनाए रहें - यही कामना और प्रार्थना है।

आपका सम्पादकीय पढ़कर लगा कि आपने जैसे मेरी ही दुखती रग को छू लिया है। हिन्दी लिखने में देवनागरी लिपि के प्रयोग में लोग मनमानी करने लगे हैं, जिससे मन आहत हो जाता है। अनुनासिक की ध्वनि के लिये ँ चन्द्रबिन्दु और अनुस्वार ं के प्रयोग में कोई अन्तर नहीं समझते हैं। “कादम्बिनी” जैसी पत्रिका भी वर्षों से चन्द्रबिन्दु को उड़ाकर सर्वत्र अनुस्वार का ही प्रयोग कर रही है। एक बार मैंने सम्पादक को लिखा भी था तो उनका उत्तर आया कि “कुछ समय पूर्व कुछ विद्वानों की समिति ने हमारे यहाँ ये निर्णय लिया था, हम उसी का पालन कर रहे है। इसमें हम कोई परिवर्तन नहीं कर सकते।” फिर सामान्य जन का तो कहना ही क्या? इसी तरह शब्द विकृत हो जाते हैं। हिन्दी सीखने वाले बच्चों को बोलकर दोनों नासास्थानी ध्वनियों का अन्तर न समझाने से वे अशुद्ध ही लिखेंगे और फिर वैसा ही बोलेंगे। जैसे - हंस सरोवर में तैर रहा है। बालक हँस रहा है। दोनों ध्वनियों और भिन्न अर्थों वाले शब्दों को कैसे समझेंगे? कुँवर और कुंदन। पाँच और पंचायत। अंगूर और अँगरखा। और भी अनेक उदाहरण दिये जा सकते हैं। अक्सर ड़ के लिए ण भी लिख देते हैं। वर्षों पूर्व (जब मैं भारत में थी) दूरदर्शन के एक कार्यक्रम में गाँव की महिलाओं को हिन्दी सिखाने वाली शिक्षिका ने एक प्रश्न के उत्तर में कहा था - “इसमें कोई फ़र्क़ नहीं है, चाहे चन्दरमा बिन्दी लगाओ या ख़ाली बिन्दी।” जैसे ये भी कोई माथे की बिन्दी हो, जिसे मनमानी आकृति दी जा सकती है। अच्छे उच्च शिक्षाप्राप्त जन भी अनुनासिक (ँ) के स्थान पर अनुस्वार (ं) का प्रयोग करते हैं। धीरे-धीरे चन्द्रबिन्दु ग़ायब हो रहा है।

हृस्व और दीर्घ की मात्राओं में भी कई बार अशुद्ध प्रयोग दिखता है। श और ष का अन्तर भी न जानने से त्रुटिपूर्ण प्रयोग हो जाता है।

महाराष्ट्र के लोग हमेशा ऋ को रू बोलते हैं। ऋ के स्थान पर र का प्रयोग प्रायःदिखता है - ऋतु को रितु और ऋचा को रिचा लिखते हैं। रोमन लिपि के कारण दक्षिण में लोग अंतिम व्यंजन में a लगाते हैं। फिर राम से रामा, अशोक का अशोका बन जाता है, जो स्त्रीलिंग रूप होते हैं।

आज कल “योग“ को रोमन में yoga लिखने के कारण सभी हिन्दी वाले भी “योगा“ ही बोलते और लिखते हैं। “योग” कहना अशुद्ध मानते हैं। “योगा“ शब्द कानों में बहुत खटकता है किन्तु वही प्रचलित हो गया है। महर्षि पतंजलि की आत्मा दुःखी होती होगी, किन्तु क्या किया जाए? हर व्यक्ति को कैसे समझाया जाए?आशा है कि आपका सम्पादकीय पढ़ने वाले जन इस बात पर ध्यान देंगे।

शुभकामनाओं सहित सादर,
शकुन्तला बहादुर, कैलिफ़ोर्निया
shakunbahadur@yahoo.com


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