अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
01.23.2019


हिन्दी टाईपिंग रोमन या देवनागरी और वर्तनी
डॉ. प्रतिभा सक्सेना

आदरणीय सुमन जी,

नमस्ते,

आपका लिखा संपादकीय लेख पढ़ कर, मेरे मन की भी वही चिन्ता पुनः जाग उठी। मैंने अनेक कविताएँ और लेख भाषा के प्रति लोगों, और लेखकों की भी, उदासीनता के कारण आई हुईं विकृतियों के प्रति (सजग करते) लिखे हैं। दो रचनाएँ आपके सम्मुख प्रस्तुत कर रही हूँ।

शेष कुशल।

धन्यवाद सहित -

सादर,
प्रतिभा सक्सेना
pratibha_saksena@yahoo.com 

1. वर्ण-विकृतियाँ

(दुनिया की सर्वाधिक वैज्ञानिक लिपि देवनागरी का रूप किस प्रकार से हिन्दी-भाषियों द्वारा (लेखकों द्वारा भी) विकृत किया जा रहा है, इसका एक उदाहरण -

बावन आखर थे यहाँ, अब गायब हैं चार,
सुध लेवा कोई नहीं, कइस लोक-व्यवहार!
(ऋृ ,लृ, ॡ ,ष)
*
कुछ वर्णों का रूप तो दिया और में ढाल,
ष या श,ख जो कहो, एक रूप तत्काल।
(लषन को लखन और विष्णु को विश्णु कहते हैं )
*
श्र का रूप विकृत किया, जोड़ी और रकार,
अब कैसे उच्चरोगे, श पर दो-दो भार।
('श्रृंगार' कर दिया सिर्फ़ ृ का काम था - शृ)
*
ऋषि कर गए बन-गमन, हमें दे गये चिह्न,
लोग बिगाड़े दे रहे, बन कर परम प्रवीण !
(लोग गृह-घर- को ग्रह -आकाशीय पिण्ड- लिखते हैं)
*
क्या पा लोगे विद्व-जन, खो कर पञ्चम वर्ण,
ध्वनियों के उच्चार का अनुशासन कर भंग।
(पञ्चम वर्ण की जगह, अनुस्वार प्रयोग बड़ा गड़बड़ कर देता है)
*
उच्चारण होगा वही, मानो भले न मित्र,
जो सदियों से सिद्ध था, अब क्यों हुआ विचित्र!
*
अरे, ज़रा तुम देख लो, शासन का अभिमान,
रोल-गोल मुँह आ घुसा सिर पर टोपा तान!
(ऑ)
*
हुआ आक्रमण देश पर, चले नये व्यवहार,
गर-गर खर-खर कर रहे, अपने गले खखार।
(क़.ख़.ग़)
*
लुढ़के- रड़के दो जने, ड ढ गूमड़दार,
थोड़ा ढंग बदल गया, यही लोक-व्यवहार।
(ड़ और ढ़ हो गए)
*
ज फ भी तो छूत के ऐसे हुए शिकार,
ज़ोर दिखा कर फूल को 'फ़ूल' किया लाचार।
(ज़,फ़)
*
जो कुछ सिद्ध, विहित रहा, अब हो गया निषिद्ध
भाषा का दुर्भाग्य यह, रहा न शुद्ध-अशुद्ध।
*
यहाँ बेतुकी गलतियाँ, छूट न जाएँ मित्र,
देखें अगली पीढ़ियाँ, हँसी बनेगी नित्य!


2. भिक्षां देहि

(माँ-भारती अपने पुत्रों से भिक्षा माँग रही है: समय का फेर!)

रीत रहा शब्द कोश,
छीजता भंडार,
बाधित स्वर, विकल बोल
जीर्ण तार-तार।
भास्वरता धुंध घिरी,
दुर्बल पुकार।
नमित नयन आर्द्र विकल,
याचिता हो द्वार-
'देहि भिक्षां,
पुत्र, भिक्षां देहि!'
*
डूब रहा काल के प्रवाह में अनंत कोश,
शब्दों के साथ लुप्त होते
सामर्थ्य-बोध।
ज्ञान-अभिज्ञान युक्तिहीन,
अव्यक्त हो विलीन।
देखती अनिष्ट वाङ्मयी, शब्दहीन।
दारुण व्यथा पुकार -
'भिक्षां देहि, पुत्र!
देहि में भिक्षां'
*
अतुल सामर्थ्य विगत,
शेष बस ह्रास!
तेजस्विता की आग,
जमी हुई राख
गौरव और गरिमा उपहास
बीत रही जननी, तुम्हारी, मैं भारती,
खड़ी यहाँ व्याकुल हताश
बार-बार कर पुकार -
'देहि भिक्षां,
पुत्र, भिक्षां देहि'!
*
शब्द-कोश संचित ये
सदियों ने ढाले,
ऐसे न झिड़को, व्यवहार से निकालो.
काल का प्रवाह निगल जाएगा
अस्मिता के व्यंजक, अपार अर्थ, भाव दीप्त,
आदि से समाज-बिंब
जिसमें सँवारे।
मान-मूल्य सारे सँजोये, ये महाअर्घ
सिरधर, स्वीकारो!
रहे अक्षुण्ण कोश, भाष् हो अशेष -
देवि भारती पुकारे
'भिक्षां देहि!
पुत्र, देहि भिक्षां!'
*
फैलाये झोली, कोटि पुत्रों की माता,
देह दुर्बल, मलीन भारती निहार रही.
बार-बार करुण टेर -
'देहि भिक्षां,
पुत्र, भिक्षां देहि!'


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें