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ISSN 2292-9754

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01.27.2018


हिन्दी साहित्य के पाठक कहाँ हैं?
भाग - २ के सम्बन्ध में प्रतिक्रिया
शंकर सिंह “सेन निलय”

आप द्वारा प्रस्तुत - "पारिवारिक वातावरण है जो कि साहित्यिक पाठक की नींव धरता है। उपहार में दी गयी पुस्तकें कभी भी व्यर्थ नहीं जातीं। बस यह ध्यान देना आवश्यक है कि पुस्तकें बच्चे की आयु के अनुसार हों। बच्चों का मनोरंजन केवल वीडियो गेम्स, टी.वी. तक ही सीमित न हो। बाल साहित्य भी उसके मनोरंजन का महत्वपूर्ण भाग होना चाहिए।"

उक्त चर्चा के अंश में बड़े ही सुंदर तरीके से जो साहित्य की महत्ता तथा स्वस्थ मनोरंजन/ज्ञान को अपनाने का अनुनय है; वो पूरी तरह से सहमति योग्य है। जैसा की मा० प्रधानमंत्री महोदय (श्री नरेन्द्र मोदी) जी का भी जनता से अनुरोध है कि वे किसी का भी स्वागत/शिष्टाचार बुक देकर करें। जो कहीं न कहीं इसके सकारात्मक परिणाम के साथ लोगों को इससे जुड़ने के लिये प्रेरित करता है। अगर इस बात को परम्परा से भी जोड़कर देखें तो, ये परम्परा भारतीय जनमानस में आदि काल से धर्म ग्रन्थ भेंट करने की रही है, जो कि ज्ञान एवं सृष्टि को जानने की अग्रणी साहित्य के रूप में सामने आता है।

हमें आज इस विलुप्त-सी परम्परा में, समाज उपयोगी अन्य साहित्य को जोड़कर इसे गतिशील करना होगा। हम धन्य हैं कि इस पठन कार्य के प्रचार-प्रसार में आप द्वारा महत्वपूर्ण भूमिका निभायी जा रही है। रही बात आपकी पश्चिमी विचार-धारा अधिक होने की....ये विचार-धारा हर किसी विभिन्न हो सकती है। हमें आपके विचार बड़े सु-योग्य लगे, जो किसी भी जगत की पुष्ट संस्कृति/साहित्य को बल प्रदान करती हैं।

पुनः आपका आभार!

धन्यवाद!
शंकर सिंह “सेन निलय”
लखनऊ
Singh35012@gmail.com


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