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ISSN 2292-9754

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03.26.2018


हिन्दी साहित्य के पाठक कहाँ हैं?
भाग - २ के सम्बन्ध में प्रतिक्रिया
समीक्षा तैलंग

आदरणीय घई जी,

सादर नमस्कार, आज का अंक अभी देखा ही है। परिचर्चा का नया स्तम्भ देखकर बहुत खुशी हुई। इस स्तम्भ में मुझे शामिल करने के लिए आपका हृदय से आभार। हमेशा की तरह इस बार का संपादकीय बहुत ही उम्दा और रुचिकर है। बचपन के यादों की सौगात लेकर आया है। बहुत खुशी महसूस हुई, इसे पढ़कर।

आपकी सोच से मैं सौ प्रतिशत सहमत हूँ। साहित्य का बीजारोपण माँ अपने नन्हें-मुन्ने को कहानी सुनाकर ही कर देती है। हम देखते आ रहे रहे हैं कि साहित्य का विकास भित्तिचित्रों से हुआ है। वेद,  ऋचाओं का उल्लेख किया बिना अधूरे हैं। वहीं हमारा भारतीय साहित्य इन वेदों के बिना अधूरा है। ये उत्पत्ति है साहित्य की जिससे हम भारत के गौरवशाली व्यक्तित्व का बखान करने में सफल रहे हैं। विश्व पटल पर हिन्दी को स्थापित करने में इस साहित्य की अहम भूमिका रही है। उम्मीद करती हूँ कि अंग्रेज़ियत को हावी न होने देने वाले, हिन्दी साहित्य को आगे बढ़ाने का पुरज़ोर प्रयास करते रहेंगे। धन्यवाद व आभार।

  भवदीया,

समीक्षा तैलंग,
अबु धाबी(यू.ए.ई.)
snehal123ind@gmail.com


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