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ISSN 2292-9754

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10.08.2017


हिन्दी साहित्य के पाठक कहाँ हैं
समीक्षा तैलंग

 बहुत ही तार्किक प्रश्न! साहित्य के पाठक कहाँ हैं? मैं सोशल मीडिया पर कई सारे साहित्यिक ग्रुप की सदस्य हूँ। प्रतिदिन हज़ारों पोस्ट पढ़ने को मिलती हैं। कुछ बहुत ही बेहतरीन ढंग से अपने विचारों को लघुकथा, कविता, ग़ज़ल, शायरी, दोहे, हाइकु आदि आदि के माध्यम से लोगों के बीच रखते हैं। वहीं कई लोग अनर्गल प्रलाप भी करते हैं। उस मंच पर साहित्य पर होने वाले सभी प्रयोगों से साक्षात्कार हो जाता है। कई बार नाम बड़े और दर्शन छोटे भी हो जाते हैं। साहित्य के जाने-माने नाम भी इन मंचों से जुड़े हुए हैं।

मेरा ऐसा मानना है कि अच्छा लिखने के लिए खुली और तार्किक सोच का होना बहुत आवश्यक है। वह सोच जो एक आम आदमी के जहन में आसानी से घर कर जाए। ये तभी संभव होता है जब आप अपने विचारों को आसान शब्दों में प्रस्तुत करते हैं। जो लोग ये मानते हैं कि कठिन शब्दों का प्रयोग ही साहित्य है, इस मामले में मेरी सोच कुछ अलग हो जाती है। हम अक्सर देखते हैं की पुस्तकों की बजाए हिन्दी अख़बारों को लोग बड़े चाखव से पढ़ते हैं। कारण मुझे यही समझ में आता है कि आज भी भारत में वह आसानी से उपलब्ध हैं। साथ ही उसकी भाषा बड़ी ही सरल होती है जिसे पढ़ने में लोगों को आसानी होती है तथा दिमाग़ पर ज़्यादा ज़ोर डालने की भी आवश्यकता नहीं होती। पुस्तकों की भाषा शैली यदि सरल हो जाए तथा वह आसानी से उपलब्ध हो जाएँ तो पाठकों की संख्या में अवश्य ही इज़ाफ़ा हो सकेगा।

हिन्दी जानने वाला हर व्यक्ति कोई महारथ हासिल किये नहीं रहता। फिर उनसे यह उम्मीद करना कि वह हिन्दी के पुराने साहित्य को पढ़ने में रुचि लें, यह तर्कसंगत नहीं है। हाँ इस बात को कतई नकारा नहीं जा सकता कि आज का युवा साहित्य पढ़ने में रुचि नहीं दिखाता। और यदि दिखाता है तो अँग्रेज़ी साहित्य में उसका रुझान होता है। तो क्या आज हिन्दी की अच्छी किताबों का अभाव हो गया है?

कारण स्पष्ट है कि भारत में अँग्रेज़ी पढ़ने, बोलने वाला आज बिना ज्ञान का ज्ञानी बन बैठा है। यह एक आम धारणा होती है कि जब हम किसी भी वस्तु अथवा व्यक्ति अथवा कोई और, जिसे हम प्राधान्य देते हैं, लोग स्वयं ही उसकी ओर आकर्षित होते हैं। हालात ये हो गए हैं कि हम अपनी मूल भाषा से लगाव खोते जा रहे हैं। या यूँ कहें कि हिन्दी के मूर्धन्य कहलाने वाले भी अँग्रेज़ियत के गुलाम दिखते हैं। घर में सजी लाइब्ररी में हिन्दी अथवा अपनी किसी मातृभाषा में किताबें कम दिखती हैं, वहीं अँग्रेज़ी किताबों का बोलबाला होता है।

विश्व की किसी भी भाषा को सीखने में कोई बुराई नहीं है पर इसका यह अर्थ कदापि नहीं हम अपनी राष्ट्र भाषा को हेय दृष्टि से देखें अथवा उसका अपमान करें। क्यों भूल जाते हैं लोग कि बरगद, पीपल जैसे वृक्ष हज़ारों वर्षों तक यूँ ही नहीं तटस्थ खड़े रहते हैं, वह जितने ऊपर दिखाई देते हैं, उनकी जड़ें उतनी ही गहराई तक फैली होती हैं। और इसी कारण उन पर कोई प्राकृतिक आपदा का प्रभाव कम से कम होता है।

मैंने अक्सर यहाँ भी देखा है कि हमारे भारतीय, हिन्दी में बोलने से भी हिचकते हैं साथ ही वह यह बताने में भी अपनी तौहीन समझते हैं कि वह किस प्रदेश से हैं। ऐसी स्थिति में जब आप अपने देश, अपनी भाषा के प्रति ही ईमानदार नहीं हैं, कैसे आप अपने साहित्य को बचाने की बात कर सकते हैं? पर यहाँ के स्थायी लोग अपने समुदाय के लोगों में केवल अपनी ही मातृभाषा का प्रयोग करते हैं, और उन्हें ज़रा भी शर्म महसूस नहीं होती। मुझे यहाँ एक और बात बड़ी अच्छी लगी जो कि हमारे लिए प्रेरणास्पद भी है, यहाँ प्रत्येक वर्ष एक प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है जिसमें विश्व कि हज़ारों-लाखों पुस्तकों को शामिल किया जाता है। यह प्रतियोगिता युवाओं को पुस्तक पढ़ने हेतु आकर्षित करने के लिए की जाती है। जो सबसे अधिक पुस्तकें कम से कम समय में पढ़ता है उसे उचित पुरस्कार से पुरस्कृत भी किया जाता है।

बहरहाल, वर्तमान में साहित्य का सृजन ऐसा हो कि हिन्दी ही नहीं, अहिंदी भाषी भी उस ओर आकर्षित हों। हिन्दी भाषा का अधिक से अधिक प्रयोग करने पर ही यह संभव हो सकेगा। दोयम दर्जे पर रखने वाली हिन्दी को विश्व में सर्वोच्च स्थान प्राप्त करने के लिए हमें भरसक प्रयास करने होंगे। कुछ ज़्यादा पाने के लिए कभी-कभी अति-महत्वाकांक्षाओं का दमन भी करना पड़ता है। इस ओर खाली बहस ही नहीं कुछ ठोस क़दम उठाना अत्यंत आवश्यक है। केवल अवार्ड प्राप्त करने की होड़ में लगे लोगों को अपनी कूपमंडूक वृत्ति से बाहर निकलकर इस ओर ज़रूर ध्यान देना चाहिए। विदेशों में लोग अधिक सक्रिय दिखते हैं, हिन्दी को लेकर। पर भारत में नगाड़ा पीटने वालों की कमी नहीं है।

समीक्षा तैलंग
अबू धाबी (संयुक्त अरब अमीरात)
snehal123ind@gmail.com


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