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ISSN 2292-9754

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01.29.2018


हिन्दी साहित्य के पाठक कहाँ हैं?
भाग - २ के सम्बन्ध में प्रतिक्रिया
भुवन पाण्डे

आदरणीय सुमन जी,

आपका संपादकीय पढ़ा। आपके विचारों में काफी कुछ अपने ही विचारों की प्रतिध्वनि लगी।

अपनी कुछ प्रतिक्रिया, अपने कुछ विचार साझा कर रहा हूँ :-

आज से क़रीब पंद्रह बीस वर्ष पहले तक हिंदी कॉमिक्स का बड़ा प्रचलन था। बच्चे बड़े लगाव के साथ इन्हें पढ़ते थे। तब खेलने के साथ मनोरंजन का ये एक बड़ा माध्यम थीं। तब बच्चों में चाचा चौधरी, पिंकी, मोटू-पतलू, आदि कई कॉमिक्स बच्चों में बड़ी प्रचलित थीं। साथ में कुछ बाल पत्रिकाएँ जैसे चंदामामा, चम्पक आदि भी थीं। इन सब का बच्चों में एक चुम्बकीय आकर्षण रहता था। तब के समय में टीवी, इन्टरनेट का उतना प्रसार नहीं था जिस कारण इन छोटी छोटी सी सचित्र कॉमिक्स ने बच्चों की मानसिक दुनिया में अपनी पूरी जगह बना रखी थी। शायद तब हिंदी साहित्य का बीजारोपण इन्हीं ने किया था नन्हें बाल मन में। तब की वो पीढ़ी।आज हिंदी साहित्य के पाठकों का एक बड़ा हिस्सा हैं। पर आज ये कॉमिक्स दुर्लभ ही कहीं दीखती हैं कहीं किसी बच्चे के पास। टीवी, मोबाइल और टेबलेट ने आज बाल मन में अपनी पूरी पकड़ जकड़ बना ली है। इनमें कार्टून और गेम्स के प्रति उनका रुझान इतना बढ़ गया है कि उन्हें किताबें नीरस और बोझिल सी लगती हैं। काफ़ी हद तक बड़े भी मोबाइल के मोह पाश का शिकार दीखते हैं। शायद वो भी रोज़ मर्रा की कश्मोकश में मनोरंजन के आसान व सुलभ साधन टीवी और मोबाइल की दुनिया में सिमटते जा रहे हैं। साहित्य के नाम पर छुट-पुट क़िस्से , चुटकुले, घटनाएँ आदि ही मोबाइल के ज़रिये रोज़ पढ़े लिखे जा रहे हैं। पर इसे साहित्य कहना ठीक ना होगा।

भारत और विश्व में पहले के मुकाबले हिंदी साहित्य का पठन बढ़ा नहीं तो घटा भी नहीं है, ख़ासतौर पर मध्यवर्गीय परिवारों में। आज मध्यवर्गीय पढ़े-लिखे परिवार आसानी से ऑनलाइन पुस्तकें मँगा पाते हैं – इन्टरनेट की दुनिया में उन्हें आसानी से नई पुस्तकों के विषय में जानकारी मिल जाती है। आजकल हिंदी में भारतीय मूल का बाल साहित्य (जैसे कि नेहरु बाल साहित्य) भी आसानी से उपलब्ध हो जाता है – इन्टरनेट की बदौलत। आजकल चर्चित साहित्य का हिंदी अनुवाद भी आसानी से इन्टरनेट पर ई-विक्रेताओं जैसे कि फ्लिप्कार्ट, अमेज़न इत्यादि के पास उपलब्ध हो जाता है। शहरों में हर वर्ष पुस्तक मेलों का आयोजन होता है जिनमें काफ़ी संख्या में पाठक हिस्सा लेते हैं। इसके अलावा इन्टरनेट पर ई-पुस्तकें पढ़ने का भी प्रचलन बढ़ा है। आजकल स्कूलों में अच्छे पुस्तकालय बनाने पर भी काफ़ी ज़ोर दिया जाता है – जो बच्चों में साहित्य के प्रति आकर्षण पैदा कर रहे हैं।

पर निम्न मध्यवर्गीय परिवारों में पहले भी और आज भी साहित्य के प्रति कम ही रुझान पनप पाया है – जिसका मुख्य कारण रहा है पूरी तरह से रोज़ी-रोटी की जद्दो ज़हद हैं डूबे रहना। उनके लिए स्कूली पुस्तकों के बाहर शायद ही कुछ है।

सादर,
भुवन पाण्डे


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