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ISSN 2292-9754

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03.30.2018


हिन्दी साहित्य के पाठक कहाँ हैं
अंजना वर्मा

आदरणीय सुमन जी,

आपका संपादकीय पढ़ा। कुछ समय पहले तेजेन्द्र शर्मा का यह प्रश्न फ़ेसबुक पर आया था कि हिंदी के पाठक कहाँ हैं? मैने फ़ेसबुक पर उसका जवाब दिया थाU।आपने इस प्रश्न को साहित्य कुंज में परिचर्चा के लिए उठाकर बहुत अच्छा किया। इस प्रश्न पर आज हिंदी के सभी रचनाकारों व पाठकों को सोचने और ठोस क़दम उठाने की ज़रूरत है।

हिंदी के संदर्भ में सबसे पहले तो यह देखें कि भारत में इसकी क्या स्थिति है? इस देश की 880 भाषाओं और 720 बोलियों की भीड़ में वैसे भी हिंदी खो जाती है। हिंदीभाषी क्षेत्रों में यह जितनी मजबूत दिखाई देती है, अहिंदीभाषी क्षेत्रों में इसकी स्थिति ठीक इसके विपरीत हो जाती है। सर्वजनसंपर्क भाषा के रूप में, हिंदीभाषी क्षेत्रों से आने वाले श्रमिकों और व्यापारियों के कारण यह फैल रही है, जो आम जनता की ज़रूरत है, जिसे रोका भी नहीं जा सकता। परंतु अभी भी हर जगह इसकी दाल नहीं गल रही। भारतीय संविधान में देवनागरी लिपि में लिखी हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया, जबकि सच्चाई यह है कि कार्यालयी भाषा के रूप में भी हिंदी का वर्चस्व स्वयं हिंदीभाषी क्षेत्रों में नहीं है। यहाँ अँग्रेज़ी भी क़दम से क़दम मिलाकर चल रही है। इसके अतिरिक्त उर्दू और अन्य भाषाएँ भी प्रयोग में हैं। महाराष्ट्र में कार्यालयी भाषा मराठी है तो तमिलनाडु में तमिल। अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड में राजकार्य की भाषा अँग्रेज़ी है। यह एक दु:खद सत्य है कि अपने ही देश में हिंदी प्रवासी है।

भारत में हिंदी बोलने वालों की संख्या बढ़ी है और बढ़ रही है, परंतु हिंदी साहित्य से प्रेम घट रहा है और आने वाले दिनों में और घटेगा। इसका कारण है अँग्रेज़ी के प्रति बढ़ता प्रेम। आज स्कूलों में शुरुआत ही अँग्रेज़ी से होती है और अच्छे स्कूलों में तो अँग्रेज़ी ही चलती है। हमारा विरोध किसी भाषा से नहीं है, परंतु जब कोई बाहरी भाषा अपनी भाषा पर हावी होने लगे तो सोचना पड़ता है।

आज हिंदी के पाठक अधिकतर हिंदीभाषी क्षेत्र के हैं और अब उनकी भी दूसरी पीढी हिंदी नहीं, अँग्रेज़ी बोल रही है।

भारत का सुखी व सुविधासंपन्न वर्ग अँग्रेज़ी का ही पाठक है और आम जनता भी उसी सम्मोहन में बँधी हुई अँग्रेज़ी के पीछे ही भाग रही है। अँग्रेज़ी की किताबें पढ़ना शान की बात समझी जाती है। ऐसी स्थिति में हिंदी की किताबें खरीदकर पढने वाला पाठक कहाँ है? विद्यार्थी पाठ्यक्रम की किताबें नहीं ख़रीदते, ख़ासकर हिंदी साहित्य की। हिंदी के वजूद पर ही ख़तरा मँडरा रहा है।

अंतरजाल पर पाठक ज़रूर हैं। बहुत सारी अंतरजाल पत्रिकाएँ पाठक बढ़ा रही हैं जो तसल्ली देने वाली बात है। पर फ़ेसबुकिये हिंदी को रोमन में लिखकर उसे नेस्तनाबूद करने में लगे हैं। देवनागरी लिपि भी ख़तरे में है। हमारी कई लिपियाँ मिट गईं। यह भी विलुप्त हो सकती है। व्हाट्सएप और फ़ेसबुक पर तो हिंदी का अपभ्रंश काल आ गया है। इस तरह साहित्य करनेवाले न तो हिंदी जानते हैं और न ही अँग्रेज़ी।

पर कुल मिलाकर हिंदी और इसके पाठकों की स्थिति संतोषजनक नहीं कही जाएगी। शुभकामनाओं के साथ,

अंजना वर्मा
कृष्णा टोला, मुजफ्फरपुर 842003
बिहार
anjanaverma03@gmail.com


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