Sahitya Kunj  - शकुन्तला - Shakuntala

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ISSN 2292-9754

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03.21.2016



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दिया डाल पग में पुन: प्रार्थना की।
लिय ग्लानि, ऋषि से क्षमा-याचना की।
"मुझे आज्ञा दें , बुलाते अमरपति",
विदा हेतु अविलम्ब अभ्यर्थना की॥

तुरंत हट गए ऋषि कमण्डल उठाया।
गमन हेतु तत्क्षण सबल पग बढ़ाया।
कहा मेनका ने, "कहाँ जा रहे प्रभु!"
दिया शान्त उत्तर, न रमणी को भाया।

न इस कन्या का कोई दोष।
सभी शिशु होते हैं निर्दोष।
दोष हम दोनों का अविवाद,"
वचन बोले राजर्षि सरोष॥

"प्रथम ले जाओ अपने साथ।
करो पालन इसका दिन-रात।
समस्या हल होगी अविलम्ब,
समय के होते लम्बे हाथ॥

निभाकर जननी का दायित्व।
मेनके! देकर इसे ममत्व।
बनाओ पूर्ण मानवी पुण्य,
भले ही दें न सको अमरत्त्व॥

किया है तुमने जघन्य पाप।
सहोगी तुम भीषण सन्ताप।
अगर पालन न किया निर्देश,
अप्सरे! दे दूँगा अभिशाप॥"

लिया जब कर में ऋषि ने आप।
नेत्र मूँद करने को जाप।
गिर पड़ी चरणों में करबद्ध,
"क्षमा कर दें मुझको निष्पाप॥

न दें भगवन्‌! मुझको अभिशाप।
करूँगी और न अधिक प्रलाप।
इसे ले जाती हूँ मैं साथ,"
उठाया शिशु अविलम्ब अपाप॥

मेनका ने की रंच न देर।
बालिका को आँचल से घेर।
उड़ चली तुरत स्वर्ग की ओर,
लिया कौशिक ने आनन फेर॥

इधर मुनि, मघवा का आंतक।
उधर ममता-पूरित था अंक।
सोचकर युगल पक्ष की बात,
न हो पाई मेनका निश्शंक॥

"मानव-सुता का किस प्रकार सदेह स्वर्ग प्रवेश हो।
किस भाँति पूर्ण प्रखर तपस्वी का कठिन आदेश हो।
वात्सल्य के इस प्रथम अनुभव का न दु:ख भी लेश हो,
कर्त्तव्य-पालन और ममता में न किंचत क्लेश हो॥"

देखा तपोवन मालिनी-तट पर तपस्वी कण्व का।
था नाम जहाँ न पाप का, था वास केवल पुण्य का।
अद्‌भुत हिमाचल-प्रांगण में शान्ति का अवतार-सा,
छल-छद्म कोलाहल-रहित-सा प्रकृति सुषमागार-सा॥

बसती जहाँ हर हृदय में सौहार्द्रता, सद्‌भावना।
नर-नारियाँ करते जहाँ आदर्श जीवन-साधना।
औदार्य-शुचिता-प्रेममय ऋषि कण्व करुणागार हैं,
आर्यत्त्व की, मनुजत्त्व की प्रतिमूiर्त्त ही साकार हैं॥

वातावरण सुन्दर सुखद
अति स्वस्थ है आरण्य का।
सोचा -- समर्पित कण्व को,
कर दूँ सुमन लावण्य का॥

यह सोच, आश्रम के निकट,
सरि मालिनी के तीर पर।
नवजात शिशु को छोड़,
मन में पीर, दृग में नीर भर॥

उड़ती हुई आकाश में,
पहुँची पुलक अमरावती।
स्वागत किया सुर-राज ने,
कर पुरस्कृत, कह यशवती॥

बोले - "अमर हो मेनका तुम,
मेदिनी-आकाश में।
उपमा बनोगी रूप की,
सौन्दर्य के इतिहास में॥
जब तक चलेगा नाम
विश्वामित्र का संसार में।
तुम भी रहोगी स्मरण सबको,
रूप-रति-श्रृंगार में॥
कोई पुरुष भू पर न, संयम-
दर्प, अब कर पाएगा।
कोई न रतिजित, नारिजित
औ’ कामजित्‌ कहलाएगा॥"

इधर सोचते रह-रह मन में,
मुनिवर विश्वामित्र।
हे भगवन्‌! क्यों दिखा रहे हो,
लीला परम वचित्र॥

अहंकार था मुझको निज
संयम पर, अगम अगाध।
किन्तु नहीं थी मन में मेरे,
कभी स्वर्ग की साध॥

अब न करूँगा कभी गर्व
संयम पर अपने भूल।
नारि प्रगति की परम प्रेरणा,
नारि पतन की मूल।

भोगवाद की मृग-मरीचिका,
सकल दु:खों का ब्याज।
आत्म-ज्ञान के पावन पथ पर,
गिरती बनकर गाज॥

भोगवाद इन्द्रिय विषयों का
विषमय विश्व विशाल।
देते असह्य वेदना जीवों
को, भोगों के व्याल॥

मुमुक्षुओं का ध्येय नहीं
ममता, माया का मोह।
भोगवाद है केवल सतत्‌
इन्द्रियों का विद्रोह॥

भोगवाद ऐसी पावक है,
जो न कभी हो शान्त।
जितना उदर भरो इसका, यह
उतनी रहे अशान्त॥

मार मार की बड़ी भयानक, रहो मार से दूर।
नहीं छोड़ता किसी जीव को, काम सदा अति क्रूर।

अनुशासन-पथ ही श्रेयस्कर, हर मनुष्य का मित्र।
योग-भ्रष्ट बन जाता जग में अपना स्वयं अमित्र॥"

हटा आवरण नेत्र से, हुआ दर्प का अन्त।
विश्वामित्र हुए विकल, यह क्या हुआ अनन्त!
यह क्या हुआ अनन्त, किस तरह मन समझाऊँ,
अपनी खोई ब्रह्म-सिद्धि कैसे पुनि पाऊँ।
बल-विवेक दे, बुद्धि से, हर अज्ञान घटा
प्रभो! तपस्या-भंग से बाधा काम हटा॥

देवराट शचिपति का समझे
हर षड्‌यन्त्र विचित्र।
दूर कर दिया मन्मथ मथ मन,
अन्तस्‌ हुआ पवित्र।
कर संकल्प अटूट चित में,
भूल विगत के चित्र।
हुए प्रचण्ड तपस्या रत,
पुनि पुनि विश्वामित्र॥


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